हिन्दी संवाद की भाषा, विवाद की नहीं

Hindi is a language of dialogue, not of dispute

सुरेश हिंदुस्तानी

देश में भाषा के नाम पर उत्तर और दक्षिण के राज्यों में भेद पैदा करने का दुस्साहस लम्बे समय से चल रहा है। इसमें तथ्यात्मक पहलू यह है कि ऐसा खेल राजनीति के संरक्षण में होता है। दक्षिण के राज्यों में हिन्दी के प्रति जिस प्रकार से अलगाव के बीज बोने की कवायद की जाती है, उसे प्रथम दृष्टि में एक दूसरे को लड़ाने की योजना का हिस्सा ही मानना चाहिए, क्योंकि सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा भारत एक है। इस संस्कृति को बनाने में भारतीय भाषाओं का योगदान भी प्रमुख है। भारत की सभी भाषाएं हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं। चाहे वह बड़े भूभाग में बोले जाने वाली हो या फिर किसी राज्य की भाषा ही क्यों न हो। सब महत्वपूर्ण हैं।

अभी हाल ही में हिंदी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को सीधे शब्दों में कहा है कि हिंदी के प्रति सोच को बदलना चाहिए। इसके निहितार्थ यही हैं कि हिन्दी देश के बहुत बड़े क्षेत्र में बोली जाती है। इसलिए दक्षिण के राज्यों में इसके प्रति सकारात्मक भाव होना चाहिए। वैसे भी आम जनमानस में यह भाव दिखाई भी देता है।

भारत की पहचान उसकी भाषायी विविधता में है। यहां भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनानुभव, संस्कृति और संवेदना की वाहक है। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल तक बदलती बोलियां और भाषाएं भारत की आत्मा को अनेक स्वरों में व्यक्त करती हैं। यही बहुस्वरता हमारी विशिष्टता है। इसलिए किसी एक भारतीय भाषा का विस्तार दूसरी भाषा के लिए संकुचन नहीं, बल्कि पूरे भारतीय भाषायी संसार का विस्तार है। हिन्दी इसी व्यापक भाषायी परिवार की एक सशक्त कड़ी है। उसका स्वभाव संवाद का है। वह जहां पहुंचती है, वहां केवल शब्द नहीं ले जाती, लोगों से जुड़ने का एक सहज माध्यम भी बनाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग जब अपनी-अपनी मातृभाषाओं के साथ हिन्दी के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो उनके बीच दूरी घटती है और परिचय बढ़ता है। एकात्म भाव का जागरण होता है।

हिन्दी की व्यापकता का आधार केवल उसका भाषायी भूगोल नहीं है। रोजगार, शिक्षा, व्यापार, पर्यटन, सिनेमा, साहित्य और संचार के अनेक माध्यमों ने उसे देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया है। दक्षिण भारत में भी हिन्दी समझने और बोलने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है। वहां हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन के लिए वर्षों से संस्थाएं सक्रिय रही हैं। अनेक विद्यार्थी हिन्दी सीखते हैं, साहित्य पढ़ते हैं और देश के दूसरे हिस्सों के लोगों से संवाद में उसका उपयोग करते हैं। यह अपनी भाषा में जड़ें मजबूत रखते हुए दूसरी भारतीय भाषाओं से परिचित होना दृष्टि को विस्तृत करता है। एक भाषा हमें अपनी मिट्टी से जोड़ती है, दूसरी हमें दूसरे प्रदेश की मिट्टी की गंध समझने का अवसर देती है। अनेक भाषाओं का ज्ञान अनेक संसारों से परिचय है। भारत में हिन्दी के प्रति आत्मीयता रखने वाले समाजों ने कभी तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, मराठी या असमिया जैसी भाषाओं के अस्तित्व को चुनौती नहीं माना। दक्षिण की भाषाएं उत्तर के लिए उतनी ही अपनी हैं, जितनी उत्तर की भाषाएं दक्षिण के लिए। तुलसी, कबीर और प्रेमचंद को पढ़ने वाला पाठक जब सुब्रमण्यम भारती, तिरुवल्लुवर या कुवेम्पु की रचनाओं तक पहुंचता है, तो वह भारत को थोड़ा और गहराई से जानता है। इसीलिए भाषा को अवसर की तरह देखना आवश्यक है। किसी बच्चे को हिन्दी सीखने का अवसर मिलता है तो उसके सामने देश के एक बड़े भूभाग, व्यापक साहित्य और असंख्य लोगों से जुड़ने का एक और द्वार खुलता है। इसी प्रकार हिन्दीभाषी समाज जब तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम के शब्द सीखता है, तो भारत की सांस्कृतिक समृद्धि उसके लिए और विस्तृत हो जाती है।

हम यह भली भांति जानते हैं कि भारत के दक्षिणी राज्यों में कई बार हिन्दी के कार्यक्रम सफलता पूर्वक हुए हैं। शिक्षा संस्थानों में भी हिन्दी के प्रति अनुराग बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि अन्य भाषाओं के उपेक्षा का भाव है। राजनीतिक दल इसे हिन्दी थोपने के रूप में प्रचारित करके जनता को केवल भ्रमित करने का काम करते हैं। शिक्षा संस्थानों में बच्चों के सामने जितनी अधिक भाषाओं और ज्ञान के द्वार खुलेंगे, उनका संसार उतना ही विस्तृत होगा। इस सकारात्मक अभियान को जब मजबूत दिशा मिलेगी, तो स्वाभाविक रूप से भारत का शक्तिशाली स्वरूप सामने आएगा। हिन्दी को लेकर भी यही दृष्टि होनी चाहिए।

भारत की भाषाएं एक ही सांस्कृतिक चेतना की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। एक भाषा का समृद्ध होना दूसरी भाषा के लिए खतरा नहीं, अनेक भाषाओं का साथ-साथ समृद्ध होना भारत की सामूहिक शक्ति है। आज जब संचार के साधनों ने देश को पहले से कहीं अधिक निकट ला दिया है, तब भाषा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। देश के एक कोने में बैठा व्यक्ति दूसरे कोने में रहने वाले व्यक्ति से सहज संवाद कर सके, उसके विचार समझ सके, उसकी संस्कृति को जान सके, यही भाषायी समृद्धि का वास्तविक उद्देश्य है। हिन्दी इस संवाद में एक सेतु की भूमिका निभा सकती है, लेकिन उस सेतु की सुंदरता तभी है जब उसके दोनों ओर भारत की अपनी विविध भाषाएं सुरक्षित, सम्मानित और जीवंत रहें।

भारत को एक-दूसरे को समझने की संस्कृति की आवश्यकता है। हमारी भाषायी विविधता उस संस्कृति की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। हिन्दी उस विविधता में अपना स्वर जोड़ती है और दूसरी भारतीय भाषाएं उसके स्वर को और समृद्ध करती हैं। इसलिए हिन्दी को लेकर दृष्टि संवाद की होनी चाहिए, विवाद की नहीं। हिन्दी जितनी अधिक भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही अधिक भारतीय बनेगी। और भारत जितनी भाषाओं में स्वयं को अभिव्यक्त करेगा, उसकी आत्मा उतनी ही समृद्ध सुनाई देगी। हिन्दी संवाद की भाषा है और भारत की विविध भाषाएं उस संवाद का विस्तार हैं। यही विविधता भारत की शक्ति है, यही उसकी पहचान और यही उसकी सांस्कृतिक सुंदरता है।