एआई से जुड़े नीतिगत एल्गोरिदम का बढ़ा जोर

The growing emphasis on AI-related policy algorithms

प्रेम प्रकाश

क्या आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालयों की डिग्रियां अपना महत्व खो देंगी? कुछ समय पहले तक यह सवाल अतिशयोक्ति लगता था, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने शिक्षा और रोजगार की दुनिया का समीकरण बदल दिया है। इंटरनेट ने ज्ञान तक पहुंच आसान बनाई थी, लेकिन एआई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, पढ़ाने के तरीके और भविष्य की कौशल आवश्यकताओं को तेजी से बदल रहा है। डिग्री की जगह अब कौशल, निरंतर सीखने की क्षमता और तकनीक के साथ काम करने की दक्षता केंद्र में आ रही है। इक्कीसवीं सदी में शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा पुनर्गठन शायद एआई ही कर रहा है।

2030 तक 17 करोड़ नई नौकरियां

लंबे समय तक विश्वविद्यालयों का उद्देश्य विषयगत ज्ञान देना और डिग्री प्रदान करना था, लेकिन एआई के दौर में यह मॉडल तेजी से बदल रहा है। WEF की Future of Jobs Report 2025 के अनुसार 2030 तक वैश्विक स्तर पर 17 करोड़ नई नौकरियां सृजित होंगी, जबकि लगभग 9.2 करोड़ नौकरियां समाप्त होंगी। यानी शुद्ध रूप से लगभग 7.8 करोड़ नए रोजगार जुड़ेंगे। साथ ही 2030 तक लगभग 59 प्रतिशत कार्यबल को नए कौशल सीखने या अपने कौशल को अद्यतन करने की आवश्यकता होगी। स्पष्ट है कि भविष्य में सबसे बड़ी योग्यता डिग्री नहीं, बल्कि निरंतर सीखने की क्षमता होगी।

इसी बदलाव को देखते हुए हार्वर्ड, एमआईटी, स्टैनफोर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसे दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रमों का पुनर्गठन कर रहे हैं। यह भी कि एआई अब केवल कंप्यूटर विज्ञान का विषय नहीं रह गया है। चिकित्सा, कानून, प्रबंधन, पत्रकारिता और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में भी एआई, डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और एआई एथिक्स को शामिल किया जा रहा है, ताकि हर पेशेवर अपने क्षेत्र में एआई का प्रभावी उपयोग कर सके।

कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों की बढ़ी लोकप्रियता

इसके साथ ही सीखने की संस्कृति भी बदल रही है। चार वर्ष की डिग्री अब करियर की अंतिम तैयारी नहीं मानी जाती। उसकी जगह माइक्रो-क्रेडेंशियल्स, प्रोफेशनल सर्टिफिकेट और अल्पकालिक कौशल-आधारित पाठ्यक्रम तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। शिक्षा अब एक बार हासिल की जाने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली सतत प्रक्रिया बनती जा रही है।

रोजगार बाजार भी तेजी से बदल रहा है। LinkedIn की Work Change Report के अनुसार 2030 तक अधिकांश नौकरियों में आवश्यक लगभग 70 प्रतिशत कौशल बदल जाएंगे, जबकि पिछले दो वर्षों में एआई से जुड़े करीब 13 लाख नए रोजगार सामने आए हैं। अब केवल तकनीकी विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि विपणन, वित्त, मानव संसाधन और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के पेशेवरों के लिए भी एआई साक्षरता एक आवश्यक कौशल बनती जा रही है।

अपस्किलिंग और रीस्किलिंग

इसीलिए दुनिया भर की कंपनियां भर्ती के मानदंड बदल रही हैं। डिग्री अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ व्यावहारिक कौशल, समस्या-समाधान की क्षमता और नई तकनीकों के प्रभावी उपयोग को अधिक महत्व दिया जा रहा है। विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि 2030 तक अधिकांश नियोक्ता बड़े पैमाने पर अपस्किलिंग और रीस्किलिंग कार्यक्रम चलाएंगे। स्पष्ट है कि एआई के युग में सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ किसी डिग्री से नहीं, बल्कि लगातार सीखते रहने की क्षमता से मिलेगा।

एआई के क्षेत्र में बढ़ते राज्य

इस बदलाव की आहट अब राज्यों की नीतियों में भी दिखाई दे रही है। कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य एआई के लिए निवेश, रिसर्च, इनोवेशन और स्किल डेवलपमेंट का इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं। खासतौर पर बिहार इस दिशा में नीतिगत पहल के साथ तेजी से आगे बढ़ता हुआ नई संभावनाओं वाले अहम राज्यों में अपनी जगह बना रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मार्गदर्शन में राज्य एआई को केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि निवेश, नवाचार, स्किल डेवलपमेंट और रोजगार के नए अवसरों के रूप में देख रहा है। एआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, विश्वविद्यालयों में नए पाठ्यक्रम और टेक कंपनियों के साथ साझेदारी जैसी पहलें इसी दिशा का संकेत हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि इन पहलों का मकसद एआई तकनीक को अपनाने के साथ बिहार के युवाओं को भविष्य की नौकरियों के लिए तैयार करना भी है। आने वाले समय में राज्यों की प्रतिस्पर्धा इस बात से भी तय होगी कि वे एआई को स्थानीय अर्थव्यवस्था, युवाओं के कौशल और रोजगार की नई संभावनाओं में कितनी तेजी से बदल पाते हैं।

स्किल्स-फर्स्ट हायरिंग का चलन

भारत के लिए यह बदलाव चुनौती भी है और अवसर भी। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश तभी आर्थिक शक्ति बनेगा, जब हमारी शिक्षा व्यवस्था एआई युग के अनुरूप स्वयं को बदले। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, IndiaAI Mission तथा विद्यालयी और उच्च शिक्षा में एआई साक्षरता बढ़ाने की पहलें इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। सरकारी आकलन है कि 2027 तक देश को 12.5 लाख से अधिक एआई पेशेवरों की आवश्यकता होगी।

यही कारण है कि उद्योग जगत भी भर्ती के पुराने पैमाने बदल रहा है। स्किल्स-फर्स्ट हायरिंग का चलन बढ़ रहा है, जहां डिग्री के साथ व्यावहारिक कौशल, समस्या-समाधान की क्षमता और एआई साक्षरता को अधिक महत्व दिया जा रहा है। ऐसे में विश्वविद्यालयों को भी स्थिर पाठ्यक्रमों से आगे बढ़कर उद्योग-समर्थित, लचीले और नियमित रूप से अद्यतन होने वाले पाठ्यक्रम विकसित करने होंगे।

साफ है कि भविष्य केवल तकनीक का नहीं, मानवीय क्षमताओं का भी होगा। एआई सूचना और विश्लेषण दे सकता है, पर रचनात्मकता, नैतिक विवेक, नेतृत्व, सहानुभूति और आलोचनात्मक सोच मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत हैं। इसलिए भविष्य का विश्वविद्यालय केवल एआई का उपयोग करना नहीं, बल्कि उसके साथ बेहतर निर्णय लेना सिखाएगा।

डिग्री नहीं, कौशल से बनेगी बात

दरअसल, एआई का सबसे बड़ा असर नौकरियों पर नहीं, शिक्षा की सोच पर पड़ रहा है। अब किसी विश्वविद्यालय की पहचान उसकी इमारतों या रैंकिंग से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि वह अपने छात्रों को बदलती दुनिया के लिए कितना तैयार कर पाता है। इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी डिग्री किसी संस्थान की नहीं, बल्कि निरंतर सीखते रहने की क्षमता होगी। भारत यदि इस बदलाव को समय रहते समझ लेता है, तो उसकी सबसे बड़ी ताकत केवल युवा आबादी नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे सक्षम और भविष्य के लिए तैयार कार्यबल होगी।