अशोक भाटिया
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 की ऐतिहासिक सफलता ने वैश्विक राजनीति में बहुध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ दक्षिण एशिया में भारत की केंद्रीय भूमिका को एक बार फिर रेखांकित किया है। जहां एक ओर दुनिया की महाशक्तियां और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं भारत की कूटनीतिक साख को स्वीकार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश के राजनीतिक गलियारों से आ रही प्रतिक्रियाएं हैरान करने वाली हैं। बांग्लादेश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान का इस वैश्विक महामंच से दूरी बनाना और उसके बाद ढाका के नीति-निर्माताओं द्वारा दिए जा रहे तीखे बयान यह साफ दर्शाते हैं कि देश वर्तमान में घरेलू राजनीति के तुष्टीकरण और कूटनीतिक अदूरदर्शिता के जाल में फंस चुका है। भारत की बढ़ती वैश्विक साख के बीच बांग्लादेश का यह रुख न केवल उसके अपने आर्थिक हितों के खिलाफ है, बल्कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से भी एक आत्मघाती कदम है।
इस पूरे विवाद की जड़ें किसी गंभीर भू-राजनीतिक संकट में नहीं, बल्कि कूटनीतिक प्रोटोकॉल को लेकर पैदा की गई एक कृत्रिम और अनावश्यक नाराजगी में छिपी हैं। भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को ‘बिम्सटेक के वर्तमान अध्यक्ष’ के रूप में गरिमामय आमंत्रण भेजा था। कूटनीतिक शिष्टाचार के तहत यह एक बेहद महत्वपूर्ण सम्मान था, क्योंकि इसके जरिए पूरे बिम्सटेक क्षेत्र की आवाज को उठाने का जिम्मा बांग्लादेश के हाथों में सौंपा जा रहा था। इसके अतिरिक्त, नई दिल्ली ने तारिक रहमान को एक स्वतंत्र द्विपक्षीय भारत यात्रा का न्योता भी अलग से दिया था ताकि दोनों देशों के आपसी मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो सके। इसके बावजूद, ढाका ने इसे एक अहंकार का मुद्दा बनाया और यह तर्क देते हुए सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया कि उन्हें स्वतंत्र रूप से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर आमंत्रित नहीं किया गया।
बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर का यह बयान कि “हम हर समय नाश्ते, लंच और डिनर के दौरान सिर्फ भारत के बारे में ही नहीं सोच सकते, हमें इससे आगे निकलना होगा,” उनकी प्रशासनिक परिपक्वता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक जिम्मेदार राष्ट्र के कूटनीतिक प्रतिनिधि की ओर से ऐसी सतही और आक्रामक भाषा का उपयोग यह दिखाता है कि बांग्लादेश की मौजूदा सरकार भारत विरोध की भावना को अपनी विदेश नीति का मुख्य आधार बनाने की कोशिश कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि महज एक प्रोटोकॉल विवाद के कारण ब्रिक्स जैसे शक्तिशाली मंच से दूरी बनाकर बांग्लादेश ने एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक अवसर गंवा दिया है। आज के दौर में ब्रिक्स केवल कुछ देशों का समूह नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और जनसंख्या के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला महामंच बन चुका है। बांग्लादेश जैसे विकासशील और आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे देश के लिए ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक से रियायती दरों पर कर्ज हासिल करने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने का यह एक स्वर्णिम अवसर था, जिसे ढाका ने अपनी राजनीतिक सनक की भेंट चढ़ा दिया।
बांग्लादेश की यह कूटनीतिक छटपटाहट सिर्फ ब्रिक्स सम्मेलन के बहिष्कार तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर अब दोनों देशों के द्विपक्षीय और व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ता दिख रहा है। बांग्लादेश की संसद में हाल ही में हुई बहस के दौरान भारत के साथ रिश्तों को लेकर जो तल्खी देखी गई, वह बेहद चिंताजनक है। सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के मुख्य व्हिप नूरुल इस्लाम मोनी ने संसद में आधिकारिक तौर पर एलान किया कि उनकी सरकार भारत के साथ पूर्ववर्ती शेख हसीना सरकार के दौरान हुए सभी 101 समझौतों और सहमति पत्र की समीक्षा कर रही है। इस बहस के दौरान बांग्लादेशी सांसदों ने भारत पर ‘असममित संधियों’ का आरोप लगाया। यह पूरी बहस तथ्यों पर आधारित होने के बजाय राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित नजर आई, जिसका एकमात्र उद्देश्य बांग्लादेश की जनता का ध्यान वहां के आंतरिक आर्थिक संकट, कानून-व्यवस्था की बदहाली और चरमराती बैंकिंग व्यवस्था से भटकाना है।
यदि हम भारत-बांग्लादेश व्यापार के वास्तविक आंकड़ों और कूटनीतिक धरातल पर नजर डालें, तो बांग्लादेश का यह रुख आर्थिक रूप से पूरी तरह तर्कहीन दिखाई देता है। भारत वर्तमान में एशिया में बांग्लादेश का सबसे बड़ा और वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 13 से 14 अरब डॉलर का है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बांग्लादेश अपनी कपड़ा मिलों के लिए आवश्यक कच्चे माल, जैसे कपास, सूत और मशीनरी के लिए बहुत बड़े पैमाने पर भारत पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए भारतीय चावल, प्याज, दालों और गेहूं के आयात पर आश्रित है। यदि ढाका इन 101 समझौतों की समीक्षा के नाम पर व्यापारिक अड़चनें पैदा करता है, तो इसका सीधा असर बांग्लादेश के घरेलू बाजारों पर पड़ेगा और वहां महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जिसे संभालना मौजूदा सरकार के लिए असंभव हो जाएगा।
संसद में हुई बहस में जिन समझौतों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया, वे दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और परिवहन गलियारों से जुड़े हैं। पूर्ववर्ती समझौतों के तहत भारत को बांग्लादेश के चट्टोग्राम (चटगांव) और मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल की अनुमति मिली थी, जिससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक माल पहुंचाना आसान और सस्ता हो गया था। इसके बदले में बांग्लादेश को पारगमन शुल्क के रूप में एक बड़ी आर्थिक मदद मिल रही थी। इसके अलावा, भारत ने बांग्लादेश को अपने क्षेत्र से होते हुए नेपाल और भूटान के साथ व्यापार करने के लिए ‘विद्युत ग्रिड साझाकरण’ और पारगमन की सुविधा दी है। संसद में इन समझौतों को ‘संप्रभुता पर हमला’ बताना ढाका की संकीर्ण सोच को दर्शाता है। आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में कनेक्टिविटी कोई गुलामी नहीं, बल्कि आर्थिक समृद्धि का जरिया है। यूरोप और आसियान देश इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भी बांग्लादेश का भारत-विरोध उसके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। वर्तमान में भारत, बांग्लादेश को लगभग 1160 मेगावाट बिजली की आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ ही, भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन (IBFPL) के जरिए भारत के नुमालीगढ़ रिफाइनरी से बांग्लादेश के दिनाजपुर तक बेहद कम लागत पर डीजल भेजा जा रहा है। बांग्लादेश इस समय खुद गंभीर विदेशी मुद्रा संकट और बिजली कटौती से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में भारत के साथ ऊर्जा समझौतों की समीक्षा करने या उनमें कड़वाहट पैदा करने का सीधा मतलब है कि बांग्लादेश अपने उद्योगों को ठप करने और अपनी जनता को अंधेरे में धकेलने की तैयारी कर रहा है। कूटनीतिक समझौतों को रद्द करना आसान होता है, लेकिन उनके विकल्प रातों-रात तैयार नहीं किए जा सकते।
भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो नई दिल्ली ने हमेशा अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) की नीति का ईमानदारी से पालन किया है। भारत ने बांग्लादेश की संप्रभुता का सदैव सम्मान किया है और 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर आज तक उसके विकास में एक सच्चे मित्र की भूमिका निभाई है। भारत द्वारा दी गई रियायती ऋण रेखा के तहत बांग्लादेश में दर्जनों बुनियादी ढांचा परियोजनाएं चल रही हैं। लेकिन यदि ढाका की मौजूदा हुकूमत इस सद्भावना को भारत की मजबूरी समझने की भूल कर रही है, या चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव में आकर भारत को आंख दिखाने की कोशिश कर रही है, तो यह उसकी बहुत बड़ी रणनीतिक भूल साबित होगी। भौगोलिक रूप से तीन तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरे होने के कारण बांग्लादेश के लिए भारत से विमुख होकर शांतिपूर्ण प्रगति करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि बांग्लादेश अपनी इस कूटनीतिक शून्यता को भरने के लिए उन ताकतों की ओर देख रहा है, जो कर्ज के जाल में फंसाने के लिए कुख्यात हैं। दक्षिण एशिया में श्रीलंका और पाकिस्तान का हश्र पूरी दुनिया के सामने है। भारत विरोध की राजनीति में अंधा होकर ढाका खुद को एक ऐसे चक्रव्यूह में धकेल रहा है, जहां से निकलना उसके लिए भविष्य में कठिन हो जाएगा। ब्रिक्स की अभूतपूर्व सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारत को वैश्विक मंचों पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और न ही भारत विरोधी कूटनीति से कोई देश अपना भला कर सकता है। समय रहते यदि बांग्लादेश की सरकार ने अपनी इस आत्मघाती विदेश नीति और संसद में जारी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी पर लगाम नहीं लगाई, तो वह वैश्विक मंच पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगा। कूटनीति भावनाओं, नारों या घरेलू राजनीति के तुष्टीकरण से नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से सोचे गए राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक दूरदर्शिता से संचालित होती है—और वर्तमान में बांग्लादेश इसी दूरदर्शिता के गंभीर अभाव से जूझ रहा है।





