ग्रामीण स्तर पर शिक्षा के विकल्प सीमित हैं

Educational options at the rural level are limited

अलवीरा

गांवों में जब बच्चे अपने भविष्य की बात करते हैं तो उनके सपनों में कोई बहुत असाधारण चीज नहीं होती। शहरी बच्चों की तरह ही वहां भी कोई शिक्षक बनना चाहता है, कोई डॉक्टर, कोई पुलिस अधिकारी, कोई इंजीनियर तो कोई ऐसा काम करना चाहता है जिससे वह अपने परिवार और गांव का नाम रोशन कर सके। उनकी आंखों में भी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा है। लेकिन उनके सपनों और हकीकत के बीच व्यवस्था की एक लंबी दीवार खड़ी है। गांवों में भी स्कूल है, बच्चे स्कूल जाते हैं, परीक्षाएं देते हैं और 12वीं भी कर लेते हैं.

लेकिन सवाल इसके बाद शुरू होता है। जिस विषय में वे पढ़ना चाहते हैं, वह आसपास के कॉलेज में नहीं मिलता। जिस कॉलेज में वह विषय है, वह दूर शहर में है। जहां रहकर पढ़ाई करने का खर्च परिवार नहीं उठा सकता। तब एक बच्चे के लिए उच्च शिक्षा का सपना धीरे-धीरे सिर्फ किसी कॉलेज में दाखिला लेने तक सीमित हो जाता है और इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पीछे लड़कियां खड़ी नज़र आती हैं।

भारत में स्कूलों की संख्या कम नहीं है। यूडीआईएसई प्लस की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 14,71,891 स्कूल थे। राजस्थान में इनकी संख्या 1,07,757 थी। राजस्थान के राज्य स्कूल रिपोर्ट कार्ड के अनुसार इनमें 66,026 सरकारी और 21,938 निजी स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित थे। यानी ग्रामीण राजस्थान में स्कूलों की मौजूदगी बड़ी संख्या में है, लेकिन केवल स्कूल की इमारत का होना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होना एक ही बात नहीं है। देश में 2023-24 में कुल 9,807,600 शिक्षक और लगभग 24.80 करोड़ विद्यार्थी थे तथा राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 25 था।

राजस्थान में 77,57,45 शिक्षक और लगभग 1.68 करोड़ विद्यार्थी दर्ज किए गए और विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 22 रहा। देखने में यह अनुपात बहुत खराब नहीं लगता, लेकिन गांव के बच्चे की असली समस्या औसत अनुपात से कहीं आगे है। सवाल यह है कि उसके स्कूल में गणित का शिक्षक है या नहीं? विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षक नियमित आते हैं या नहीं? अंग्रेजी या दूसरे जरूरी विषयों के लिए शिक्षक उपलब्ध है या नहीं? एक स्कूल में शिक्षक मौजूद होने और हर विषय के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध होने के बीच का अंतर ही ग्रामीण बच्चे की शिक्षा की गुणवत्ता तय करता है। यूडीआईएसई प्लस की 2023-24 की रिपोर्ट बताती है कि देश में 1,10,971 स्कूल ऐसे थे जहां केवल एक शिक्षक थे। राजस्थान में ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 7,688 थी।

बुनियादी ढांचे की तस्वीर भी इसी अंतर को सामने लाती है। शिक्षा का मतलब केवल कक्षा, ब्लैकबोर्ड और किताब नहीं है। आज का विद्यार्थी पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कंप्यूटर, इंटरनेट और ऐसे शिक्षण वातावरण का भी हकदार है जिसमें वह अपने गांव से बाहर की दुनिया को समझ सके। लेकिन जब किसी ग्रामीण स्कूल में किसी विषय का शिक्षक नहीं है या प्रयोगशाला और डिजिटल साधनों का उपयोग सीमित है, तो बच्चा पाठ्यक्रम तो पूरा कर लेता है, लेकिन अपनी क्षमता का विस्तार नहीं कर पाता।

यही वह बिंदु है जहां शहर और गांव के बच्चों के बीच अवसर के अंतर को बढ़ा देता है। उच्च शिक्षा की तरफ बढ़ते हुए यह दूरी और अधिक साफ दिखाई देने लगती है। आल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार देश में करीब 48,246 कॉलेज दर्ज हैं। इनमें राजस्थान में चार हज़ार से अधिक हैं. जिनमें 53.8 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित थे। उसी प्रोफाइल में राजस्थान का उच्च शिक्षा में कुल सकल नामांकन अनुपात 24.1 प्रतिशत और लड़कियों का 23.9 प्रतिशत से अधिक था।

लेकिन कॉलेजों की संख्या और ग्रामीण विद्यार्थियों की वास्तविक पहुंच को एक ही चीज मान लेना ठीक नहीं होगा। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए सवाल यह नहीं है कि राज्य में कितने कॉलेज हैं, बल्कि यह है कि मेरे गांव से कितनी दूरी पर मेरे पसंद का विषय पढ़ाने वाला कॉलेज है। यही कारण है कि 12वीं पास कर लेना ग्रामीण बच्चे की शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि एक और कठिन परीक्षा की शुरुआत बन जाता है। मान लीजिए किसी लड़की ने मेहनत करके 12वीं की परीक्षा पास कर ली। वह स्नातक में किसी खास विषय को पढ़ना चाहती है लेकिन उसके नजदीकी कॉलेज में वह विषय नहीं है। दूसरे शहर में कॉलेज है, लेकिन वहां कमरा, भोजन, यात्रा, किताबें और फीस का खर्च अलग है। परिवार की आय सीमित है तो माता-पिता अक्सर यह तय करते हैं कि बेटा बाहर जाकर पढ़ सकता है, लेकिन बेटी के लिए यह खर्च संभव नहीं।

यहां आर्थिक स्थिति और लड़की होना एक-दूसरे से अलग समस्याएं नहीं रह जातीं। लड़की के सामने विकल्प अपने आप छोटे होते जाते हैं। वह मनपसंद विषय छोड़ सकती है, कम पसंद का विषय चुन सकती है, पढ़ाई रोक सकती है या केवल इसलिए कॉलेज में दाखिला ले सकती है क्योंकि वही कॉलेज परिवार की पहुंच में है। देश के स्तर पर भी ग्रामीण और शहरी पहुंच के बीच ऐसे अंतर स्पष्ट दिखाई देते हैं। दरअसल, जब हम ग्रामीण शिक्षा ढांचे की बात करते हैं तो केवल स्कूल या कॉलेज की बिल्डिंग ही नहीं आती है बल्कि उसमें कई फैक्टर जुड़ जाते हैं. विशेषकर लड़कियों की जब बात करते हैं हैं तो इस परिदृश्य में परिवार की आर्थिक कमजोरी, गांव में सीमित शैक्षणिक विकल्प, परिवहन की कमी और लड़कियों पर परिवार की अलग अपेक्षाएं एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

आज भी हमारे समाज में लड़कों के लिए बाहर जाकर पढ़ना परिवार के भविष्य में निवेश माना जाता है, लेकिन लड़की के लिए वही खर्च अतिरिक्त बोझ की तरह देखा जाता है। जब गांव के आसपास उच्च शिक्षा के पर्याप्त विकल्प नहीं होते, छात्रावास नहीं होते और सुरक्षित एवं सस्ती यात्रा की व्यवस्था नहीं होती, तो परिवार की पुरानी सोच और आर्थिक सीमाएं मिलकर लड़की की पढ़ाई का रास्ता और भी अधिक संकरा कर देती है। इसलिए केवल यह कहना कि लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए, समस्या का पूरा उत्तर नहीं है। जिस रास्ते पर उन्हें चलना है, वह रास्ता और विकल्प भी उनके लिए मौजूद होनी चाहिए।