अशोक भाटिया
लोकतंत्र की आत्मा कहाँ बसती है? पाँच साल में एक बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने वाली उँगलियों में, या सड़कों पर नारे लगाती भीड़ में? यह सवाल आज भारत के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। हाल ही में राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर, संसद मार्ग और विशेष रूप से आकाशवाणी भवन के भीतर व बाहर जो दृश्य दिखाई दिए हैं, वे इसी बुनियादी द्वंद्व को रेखांकित करते हैं। एक तरफ विपक्षी दलों और युवा आंदोलनों का सड़कों पर उतरना है, तो दूसरी तरफ निर्वाचित सरकार का यह दृढ़ विश्वास है कि देश की नीतियों और संवैधानिक संस्थाओं का संचालन सड़क के दबाव से नहीं, बल्कि संसद की संप्रभुता से होना चाहिए।
हालिया दिनों में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूचियों में बदलावों को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी सांसदों का मार्च और आकाशवाणी भवन के परिसर में जबरन घुसकर किया गया 8 घंटे से अधिक लंबा धरना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक असंतोष अब प्रशासनिक सीमाओं को लांघ रहा है। लेकिन यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है: क्या करोड़ों नागरिकों द्वारा दिए गए स्पष्ट चुनावी बहुमत और संवैधानिक प्रक्रिया को कुछ नेताओं के इस तरह के अवांछित सड़क प्रदर्शनों के आगे झुकाया जा सकता है? सरकार और संवैधानिक व्यवस्था के नजरिए से देखें तो इसका उत्तर पूरी तरह से ‘ना’ में होना चाहिए, क्योंकि यदि सड़क या किसी सरकारी कार्यालय के भीतर का फैसला ही अंतिम होने लगा, तो फिर मतपेटियों और लोकतांत्रिक जनादेश का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की स्थिरता उसकी संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर निर्भर करती है। भारत निर्वाचन आयोग एक ऐसी ही संवैधानिक संस्था है, जिसकी साख पर वैश्विक स्तर पर भरोसा किया जाता है। वर्तमान में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जो विरोध हो रहा है, उसे सरकार और कानूनविदों का एक बड़ा वर्ग संस्थाओं को कमजोर करने के सोचे-समझे प्रयास के रूप में देखता है। हाल ही में देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने एक संयुक्त बयान में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि संवैधानिक संस्थाओं पर बिना किसी पुख्ता सबूत के ‘वोटों की चोरी’ जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इन पूर्व न्यायाधीशों का स्पष्ट रूप से मानना है कि आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी संस्था की साख को पूरी तरह से धूमिल करना लोकतंत्र के हित में नहीं है।
लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, और भारत का संविधान अपने नागरिकों को शांतिपूर्ण असंतोष व्यक्त करने की पूरी आजादी देता है। लेकिन जब यह असंतोष एक निर्वाचित सरकार के नीतिगत फैसलों और विधायी बहुमत को जबरन पलटने का माध्यम बनने की कोशिश करता है, तो यह ‘भीड़तंत्र’ का रूप ले लेता है। चुनावी बहुमत का मतलब केवल संख्या बल नहीं होता; यह देश की करोड़ों की आबादी के उस सामूहिक विश्वास का प्रतिनिधित्व करता है, जो उन्होंने एक निश्चित नीति, विचारधारा और नेतृत्व में व्यक्त किया है।
जब कुछ प्रदर्शनकारी किसी राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करते हैं, या राजधानी की कानून-व्यवस्था को संकट में डालते हैं, तो वे उस मूक बहुमत के अधिकारों का हनन कर रहे होते हैं, जिसने शांतिपूर्वक अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करके एक सरकार चुनी है। किसी भी चुनी हुई सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी देश में कानून का शासन बनाए रखना और देश की आर्थिक व सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करना है। यदि सरकार हर छोटे-बड़े आंदोलन या प्रतीकात्मक घेराव के दबाव में अपने निर्णयों को वापस लेने लगे, तो यह उस जनादेश के साथ विश्वासघात होगा जो उसे पूरे देश से मिला है। सड़कों का दबाव अक्सर क्षेत्रीय या वर्ग-विशेष के हितों से प्रेरित होता है, जबकि चुनावी बहुमत पूरे राष्ट्र की व्यापक आकांक्षाओं का प्रतीक होता है। इसलिए, जनादेश का मान सर्वोपरि होना ही चाहिए।
बीते कुछ समय में भारत ने कई ऐसे आंदोलन देखे हैं, जहाँ सरकार को जनहित और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने कदमों को पीछे खींचना पड़ा या संशोधनों को स्वीकार करना पड़ा। उदाहरण के लिए, परीक्षा लीक मामले के बाद भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण सरकार ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए कड़े कदम उठाए और नए कानून (सार्वजनिक परीक्षा अनुचित साधनों की रोकथाम संशोधन अधिनियम, 2026 को पारित किया। लेकिन इस प्रकार के उदाहरणों को एक सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। नीतिगत बदलाव और प्रशासनिक सुधार एक सतत प्रक्रिया हैं, जिन्हें ठंडे दिमाग से, विशेषज्ञों की राय और संसद के भीतर गहन बहस के बाद लागू किया जाना चाहिए।
सड़कों पर या संवेदनशील सरकारी परिसरों (जैसे हाल ही में आकाशवाणी भवन का परिसर) में होने वाले संग्राम अक्सर भावनाओं, राजनीतिक एजेंडे और तात्कालिक आक्रोश से संचालित होते हैं। ऐसे माहौल में दूरगामी और जटिल सुधारों पर तार्किक चर्चा असंभव हो जाती है। यदि कोई सरकार सड़क के दबाव में आकर हर बार अपने कदम पीछे खींचने लगेगी, तो देश में ‘नीतिगत पंगुता’ की स्थिति पैदा हो जाएगी। कोई भी बड़ा या कड़ा सुधार, जो तात्कालिक रूप से कड़वा लेकिन दीर्घकालिक रूप से देश के हित में हो, कभी लागू नहीं किया जा सकेगा। विदेशी निवेशक और वैश्विक एजेंसियां भी ऐसे देशों से दूरी बनाती हैं जहाँ की नीतियां संसद के बजाय सड़कों की भीड़ तय करती हो। शासन में स्थिरता और निरंतरता के लिए यह आवश्यक है कि सड़कों के संग्राम को एक सीमा से आगे चुनावी बहुमत को प्रभावित करने की अनुमति न दी जाए।
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानजनक होती है। विपक्ष को सरकार की कमियों को उजागर करने और जनता की आवाज बनने का पूरा अधिकार है। लेकिन हालिया घटनाओं में यह देखा गया है कि विपक्ष संसद के भीतर रचनात्मक बहस और विधायी प्रक्रियाओं में भाग लेने के बजाय सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन और संवेदनशील सरकारी इमारतों में जबरन प्रवेश करने को अधिक प्राथमिकता दे रहा है। जब विपक्षी सांसद संसद भवन से मार्च निकालकर सीधे संवैधानिक संस्थाओं के मुख्यालयों या राष्ट्रीय महत्व के कार्यालयों (जैसे आकाशवाणी भवन) का घेराव करने निकलते हैं, तो वे स्वयं उस विधायी व्यवस्था को कमतर आंक रहे होते हैं जिसके वे हिस्से हैं ।
भारत के पास एक बेहद मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिका है। जब मतदाता सूची पुनरीक्षण का मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गया, तो न्यायालय ने स्पष्ट रूप से इस पर कानूनी प्रक्रिया के तहत विचार करने की बात कही। जब देश की सबसे बड़ी अदालत किसी मामले की समीक्षा कर रही हो, तब भी इस तरह से प्रशासनिक अवरोध पैदा करना और अराजकता का माहौल बनाना राजनीतिक अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं है । विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार को झुकाने की जिद में वे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को ही कमजोर कर रहे हैं। चुनाव में मिली हार या राजनीतिक जमीन वापस पाने का रास्ता जनता के बीच जाकर उनका विश्वास जीतना है, न कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था को बंधक बनाना या उस पर अवैध कब्ज़ा करने की कोशिश करना।
‘जनादेश का मान या सड़कों पर संग्राम’—यह कोई ऐसा द्वंद्व नहीं है जिसका समाधान किसी एक को पूरी तरह से मिटाकर किया जा सके। लोकतंत्र में विरोध का अपना स्थान है, लेकिन वह स्थान हमेशा संविधान और कानून के दायरे के भीतर होना चाहिए। सड़कों पर होने वाले आंदोलन या इस प्रकार के तीखे राजनीतिक प्रदर्शन सरकार को सचेत करने वाले ‘अलार्म’ की तरह काम कर सकते हैं, लेकिन वे स्टीयरिंग व्हील नहीं बन सकते जो देश की दिशा तय करे। देश चलाने का अधिकार केवल और केवल उसी के पास होना चाहिए जिसे भारत की जनता ने वोट की ताकत से वह जिम्मेदारी सौंपी है।
आज के बदले हुए हालातों में, जब देश आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है, हमें आंतरिक स्थिरता की सबसे ज्यादा जरूरत है। किसी भी आंदोलन, राजनीतिक दल या व्यक्तिगत एजेंडे को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह चुनावी बहुमत को सड़क के संग्राम या अवैध धरनों से झुका दे। अंततः, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवैधानिक सर्वोच्चता में है। सरकार का यह दायित्व है कि वह कानून के शासन को अक्षुण्ण रखे और जनता द्वारा दिए गए प्रचंड जनादेश का मान करते हुए देश को विकास के पथ पर आगे ले जाए, बिना किसी अनुचित और असंवैधानिक दबाव के आगे झुके।





