महेन्द्र तिवारी
श्रावण मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें एक साधारण सा धागा प्रेम, विश्वास, सम्मान और आजीवन साथ निभाने के संकल्प का प्रतीक बन जाता है। यह त्योहार केवल भाई और बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी संबंधों का उत्सव है जिनकी नींव अपनत्व और संरक्षण पर टिकी होती है। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त से आरंभ होकर 28 अगस्त की प्रातः तक रहेगी, इसलिए उदय तिथि के आधार पर मुख्य पर्व 28 अगस्त को ही मान्य है।
भारतीय सभ्यता में रक्षाबंधन का इतिहास हजारों वर्षों पुराना माना जाता है। वैदिक काल में यज्ञों के दौरान पुरोहित राजा और यजमान की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधते थे। उस समय यह धागा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संकटों से रक्षा और मंगलकामना का प्रतीक था। धीरे-धीरे यही परंपरा पारिवारिक जीवन में आई और भाई बहन के पवित्र संबंध से जुड़ गई। आज भी अनेक स्थानों पर सैनिकों, गुरुओं, वृक्षों और नदियों को राखी बाँधने की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि रक्षाबंधन का अर्थ केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि संरक्षण और संवेदनशीलता का विस्तार है।
रक्षाबंधन की सबसे लोकप्रिय पौराणिक कथा माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। कथा के अनुसार भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए वचन के कारण सुतल लोक में रहने लगे। भगवान को वापस वैकुण्ठ लाने के लिए माता लक्ष्मी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा और उन्हें अपना भाई स्वीकार किया। भाई के प्रेम से अभिभूत होकर राजा बलि ने बहन को इच्छित वरदान दिया और भगवान विष्णु को वैकुण्ठ लौटने की अनुमति दी। यह कथा बताती है कि राखी का धागा अधिकार से अधिक आत्मीयता और विश्वास का प्रतीक है।
महाभारत में भी रक्षाबंधन की भावना अनेक रूपों में दिखाई देती है। जब श्रीकृष्ण की उँगली से रक्त निकला तो द्रौपदी ने बिना किसी संकोच के अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। बदले में श्रीकृष्ण ने जीवन भर उनकी रक्षा का संकल्प निभाया। यद्यपि यह घटना पारंपरिक राखी नहीं थी, फिर भी भारतीय जनमानस ने इसे रक्षा सूत्र की सर्वोच्च भावना के रूप में स्वीकार किया है। इसी प्रकार यम और यमुना की कथा में बहन के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे अमर प्रेम और हर वर्ष मिलने का वरदान दिया। इन कथाओं का सार यही है कि रक्षा का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और साथ निभाने की प्रतिज्ञा है।
भारतीय परिवार व्यवस्था में रक्षाबंधन का विशेष सामाजिक महत्व भी है। विवाह के बाद जब बेटी अपने मायके आती है तो यह पर्व उसके लिए बचपन की स्मृतियों को फिर से जीवित कर देता है। घर का आँगन, माता पिता का स्नेह, भाई बहनों की हँसी और मिलकर भोजन करने की परंपरा परिवार को फिर से एक सूत्र में बाँध देती है। बदलते समय में भले ही लोग विभिन्न नगरों और देशों में रहने लगे हों, लेकिन रक्षाबंधन के अवसर पर डाक, संदेश और चित्र संवाद के माध्यम से भी रिश्तों की गर्माहट बनी रहती है। यह पर्व दूरी को नहीं, दिलों को महत्व देता है।
आज की आधुनिक जीवनशैली में रक्षाबंधन का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले बहनें अपने हाथों से सूती या रेशमी धागों की राखी बनाती थीं। अब कलात्मक राखियाँ, पर्यावरण हितैषी राखियाँ और बीज युक्त राखियाँ भी लोकप्रिय हो रही हैं, जिन्हें बाद में मिट्टी में बोया जा सकता है। अनेक विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं ने प्लास्टिक मुक्त राखी अभियान चलाकर इस पर्व को प्रकृति संरक्षण से भी जोड़ दिया है। इससे यह संदेश मिलता है कि जिस प्रकार हम अपने प्रियजनों की रक्षा का संकल्प लेते हैं, उसी प्रकार धरती और पर्यावरण की रक्षा भी हमारा कर्तव्य है।
रक्षाबंधन केवल बहन की रक्षा का वचन नहीं है। वर्तमान समाज में इसकी व्याख्या कहीं अधिक व्यापक हो गई है। आज बहनें भी अपने भाइयों के सुख, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनके साथ हर कठिनाई में खड़ी रहती हैं। यह रिश्ता समानता, परस्पर सहयोग और सम्मान पर आधारित है। इसलिए रक्षाबंधन स्त्री और पुरुष के बीच किसी एक पक्ष की निर्भरता का नहीं, बल्कि साझी जिम्मेदारी का पर्व है। यही कारण है कि अनेक परिवारों में बहनें बहनों को और भाई भाइयों को भी राखी बाँधते हैं, जिससे प्रेम और सद्भाव का संदेश और अधिक व्यापक हो जाता है।
इस वर्ष रक्षाबंधन को लेकर लोगों में तिथि और ग्रहण को लेकर कुछ भ्रम भी रहा। पंचांगों के अनुसार पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को आरंभ होकर 28 अगस्त की प्रातः समाप्त होगी, इसलिए मुख्य पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भद्रा काल में राखी बाँधना वर्जित माना जाता है, इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद प्रातः का समय विशेष शुभ माना गया है। उपलब्ध पंचांगों के अनुसार सूर्योदय से लगभग 9:48 बजे तक राखी बाँधना उत्तम रहेगा।
28 अगस्त 2026 को आंशिक चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है, जिससे अनेक लोगों के मन में सूतक और पूजा को लेकर प्रश्न उत्पन्न हुए। उपलब्ध खगोलीय और पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए भारत में सूतक प्रभावी नहीं माना गया है। यही कारण है कि सामान्य रूप से रक्षाबंधन की पूजा, राखी बाँधना और स्नान दान के सभी धार्मिक कार्य संपन्न किए जा सकेंगे।
रक्षाबंधन की पूजा विधि अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। प्रातः स्नान के बाद पूजा की थाली में रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और रक्षा सूत्र रखा जाता है। भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाया जाता है। बहन उसके मस्तक पर तिलक लगाकर आरती उतारती है, दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती है और उसकी दीर्घायु तथा समृद्धि की कामना करती है। इसके बाद मिठाई खिलाकर आशीर्वाद लिया जाता है और भाई स्नेहपूर्वक उपहार देकर बहन के सम्मान और साथ का संकल्प व्यक्त करता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु धागा नहीं, बल्कि उसमें समाहित प्रेम की भावना होती है।
भारतीय इतिहास में रक्षाबंधन ने कई प्रेरक प्रसंग भी रचे हैं। मध्यकाल में राजपूत रानियाँ पड़ोसी राजाओं को राखी भेजकर सुरक्षा और सम्मान का संबंध स्थापित करती थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंगाल विभाजन के विरोध में रक्षाबंधन को सामाजिक एकता का प्रतीक बनाया। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों से एक दूसरे को राखी बाँधकर भाईचारे का संदेश देने का आह्वान किया। इस प्रकार रक्षाबंधन केवल धार्मिक पर्व नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का भी माध्यम बन गया।
वर्तमान समय में जब परिवार छोटे होते जा रहे हैं और रिश्तों में संवाद कम होता दिखाई देता है, तब रक्षाबंधन हमें रुककर अपने संबंधों को सहेजने की प्रेरणा देता है। महँगे उपहारों से अधिक मूल्यवान वह समय है जो भाई बहन एक दूसरे के साथ बिताते हैं। एक स्नेहिल आलिंगन, बचपन की यादें, माता पिता के साथ बैठकर भोजन करना और मन की बात साझा करना ही इस पर्व की सबसे बड़ी संपत्ति है। यही कारण है कि रक्षाबंधन हर वर्ष हमें याद दिलाता है कि जीवन की सबसे मजबूत डोर किसी धातु या संपत्ति की नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास की होती है।
राखी का यह पावन धागा हमें यह भी सिखाता है कि रक्षा का अर्थ केवल किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा नहीं, बल्कि परिवार, समाज, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। जब हर व्यक्ति दूसरे के सम्मान, अधिकार और सुख की चिंता करेगा, तभी रक्षाबंधन का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा। श्रावण पूर्णिमा का यह पर्व इसलिए केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य भावना का उत्सव है जो कहती है कि प्रेम से बँधे रिश्ते ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।





