तीन उपचुनावों ने सिखाए लोकतंत्र के तीन बड़े सबक

Three by-elections taught three major lessons of democracy

अजय कुमार बियानी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ अंतिम निर्णय किसी दल, नेता, प्रचार या सत्ता का नहीं, बल्कि जनता का होता है। चुनाव परिणाम केवल हार-जीत का आँकड़ा नहीं होते, वे जनभावना का आईना भी होते हैं। तीन राज्यों के हालिया उपचुनावों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत है। उसके फैसले में न अपील होती है और न ही पुनर्विचार। वह जब निर्णय सुनाती है तो राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं और वर्षों से अजेय माने जाने वाले दुर्ग भी ढह जाते हैं।

उपचुनावों को अक्सर छोटे चुनाव मान लिया जाता है, किंतु उनका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा होता है। वे सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए चेतावनी भी होते हैं और अवसर भी। इन परिणामों ने राजनीति को तीन महत्वपूर्ण सबक दिए हैं, जिन्हें समझना हर दल और हर जनप्रतिनिधि के लिए आवश्यक है।

पहला सबक है—अहंकार का अंत निश्चित है।

लोकतंत्र में कोई भी नेता, दल या गढ़ स्थायी नहीं होता। जनता किसी को सिर पर बिठाती है तो उतारना भी जानती है। जब जनप्रतिनिधि जनता से दूर होकर केवल प्रशंसकों और चाटुकारों के बीच रहने लगते हैं, तब उन्हें वास्तविक परिस्थितियों का आभास ही नहीं होता। उन्हें लगता है कि लोकप्रियता स्थायी है और चुनाव केवल औपचारिकता हैं। किंतु मतदान का दिन आते ही जनता अपनी चुप्पी को मतपत्र के माध्यम से उत्तर में बदल देती है।

इतिहास गवाह है कि राजनीति में सबसे बड़ी भूल जनता को हल्के में लेना होती है। किसी भी दल को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल संगठन, चेहरा या चुनाव चिह्न ही विजय की गारंटी है। उम्मीदवार की छवि, उसका व्यवहार और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। लोकतंत्र में कोई भी सीट किसी की पैतृक संपत्ति नहीं होती।

दूसरा सबक है—विकास और कार्य ही सबसे बड़ा प्रचार हैं।

आज का मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक है। वह केवल भाषणों और नारों से प्रभावित नहीं होता। वह अपने क्षेत्र की सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कानून व्यवस्था और जनसुविधाओं का मूल्यांकन करता है। उसे यह भी दिखाई देता है कि चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि उसके बीच कितनी बार आया और उसकी समस्याओं के समाधान के लिए कितना प्रयास किया।

राजनीतिक संवाद आवश्यक है, किंतु संवाद तभी सार्थक होता है जब उसके पीछे कार्य दिखाई दे। केवल आरोप-प्रत्यारोप, कटाक्ष और वाद-विवाद से जनता का विश्वास लंबे समय तक नहीं जीता जा सकता। मतदाता अब यह समझ चुका है कि भाषणों से जीवन नहीं बदलता, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से परिवर्तन आता है।

तीसरा सबक है—जनमत परिवर्तनशील है।

लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि जनता समय-समय पर अपना संदेश देती रहती है। उपचुनावों के परिणाम किसी बड़े चुनाव का अंतिम पूर्वानुमान नहीं होते, किंतु वे राजनीतिक वातावरण की दिशा अवश्य बताते हैं। वे यह संकेत देते हैं कि जनता क्या सोच रही है, किन मुद्दों को महत्व दे रही है और किन बातों से असंतुष्ट है।

इसी कारण राजनीतिक दलों के लिए ऐसे परिणाम आत्ममंथन का अवसर होते हैं। यदि वे इन्हें केवल संयोग मानकर अनदेखा कर दें तो भविष्य में बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। वहीं यदि वे जनता के संदेश को समझकर अपने व्यवहार, नीतियों और कार्यशैली में सुधार करें तो यही परिणाम उनके लिए नई ऊर्जा का स्रोत भी बन सकते हैं।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ मतदाता समय आने पर किसी भी स्थापित धारणा को बदल सकता है। वह न तो स्थायी रूप से किसी के पक्ष में होता है और न ही स्थायी रूप से किसी के विरोध में। उसका समर्थन कार्य, विश्वास और संवेदनशीलता पर आधारित होता है।

राजनीति का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनसेवा होना चाहिए। सत्ता साधन है, साध्य नहीं। जब यह अंतर भुला दिया जाता है, तब जनता अपने मत से स्मरण कराती है कि लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति उसी के पास है।

तीन राज्यों के इन उपचुनावों ने एक बार फिर यही संदेश दिया है कि लोकतंत्र में अंतिम विजय उसी की होती है जो जनता के बीच रहता है, उसके सुख-दुःख को समझता है और वादों से अधिक कार्यों पर विश्वास करता है। चुनावी जीत क्षणिक हो सकती है, किंतु जनता का विश्वास ही वह पूँजी है जो किसी भी जनप्रतिनिधि को लंबे समय तक सम्मान और स्वीकार्यता प्रदान करती है।

अंततः लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य यही है—जनता कभी गलत नहीं होती। वह देर से निर्णय ले सकती है, पर जब निर्णय देती है तो वही इतिहास बन जाता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसकी सबसे सुंदर पहचान।