त्योहारों के बीच सियासी टकराव: व्यापारी क्यों बन रहे हैं आंदोलन के मोहरे?

Political conflict amid festivals: Why are businessmen becoming pawns of the movement?

सौरभ वार्ष्णेय

देश में त्योहारों का मौसम बाजारों में रौनक, कारोबार में तेजी और आम लोगों के चेहरों पर खुशियां लेकर आता है। दीपावली और अन्य त्योहारों के दौरान व्यापारी वर्ग पूरे साल की कमाई के एक बड़े हिस्से की उम्मीद करता है। दुकानदारों से लेकर छोटे कारोबारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और कर्मचारियों तक, लाखों लोगों की आजीविका इन दिनों के कारोबार पर निर्भर रहती है। ऐसे समय में यदि राजनीतिक आंदोलन, चुनावी रैलियां और विरोध-प्रदर्शन बाजारों तथा व्यापारिक गतिविधियों को प्रभावित करने लगें, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर इस टकराव की कीमत व्यापारी वर्ग ही क्यों चुकाए?

एक नवंबर को प्रस्तावित चुनावी रैली और राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रहे राजनीतिक विरोध के बीच व्यापारिक संगठनों की ओर से त्योहारों के मद्देनजर उठाई जा रही मांगों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को नई दिशा दे दी है। एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की जवाबदेही का सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ व्यापारी वर्ग चाहता है कि त्योहारों के समय उसका कारोबार बाधित न हो। इस परिस्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दलों को अपने आंदोलन की रणनीति तय करते समय आम नागरिकों और व्यापारियों के हितों को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए?

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना विपक्ष का अधिकार है। सरकार से सवाल पूछना, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग करना और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। यदि विपक्ष को चुनाव आयोग के कामकाज पर आपत्ति है, तो उसे तथ्य, दस्तावेज और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ जुटाने या राजनीतिक संदेश देने से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखना आवश्यक है कि उस आंदोलन का आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। त्योहारों के दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही, माल की आपूर्ति, यातायात और दुकानों के संचालन में व्यवधान छोटे व्यापारियों के लिए गंभीर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।

बड़े कारोबारी कुछ समय का नुकसान सहन कर सकते हैं, लेकिन छोटे दुकानदार, दैनिक आय पर निर्भर विक्रेता और सीमित पूंजी से कारोबार करने वाले व्यापारी हर दिन की कमाई पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में व्यापारिक संगठनों की मांग को केवल राजनीतिक विरोध के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि आंदोलन को लेकर राजनीतिक गतिरोध बढ़ रहा है, तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को संवाद का रास्ता तलाशना चाहिए। हालांकि, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण आवश्यक हैं कि सरकार ने जानबूझकर ऐसा राजनीतिक पेच खड़ा किया है, जिससे आंदोलन समाप्त हो जाए या विपक्ष दबाव में आ जाए। राजनीति में आरोप प्रत्यारोप आम हैं, लेकिन लोकतंत्र में किसी भी आरोप की विश्वसनीयता तथ्यों से तय होती है। सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष की शिकायतों का जवाब दे, चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाली आशंकाओं को दूर करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि के कारण आम नागरिकों के अधिकारों तथा आजीविका पर अनावश्यक असर न पड़े।

इसी तरह विपक्ष को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसका आंदोलन किन ठोस मांगों पर आधारित है, उसकी समय-सीमा क्या है और आम लोगों को कम से कम परेशानी पहुंचाते हुए उसे कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।

चुनाव आयोग के शीर्ष पदाधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए और उनकी मांग पूरी होने पर आंदोलन समाप्त हो सकता है, राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण विषय है। यदि विपक्ष का दावा है कि चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं, तो उसे अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। वहीं, चुनाव आयोग को भी अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना चाहिए। लेकिन किसी संवैधानिक पदाधिकारी का इस्तीफा मांगना और उसे तत्काल स्वीकार कराना दो अलग अलग बातें हैं। चुनाव आयोग के प्रमुख का पद किसी राजनीतिक दल की इच्छा से संचालित नहीं हो सकता। उनकी नियुक्ति, कार्यकाल और पद से हटाने की प्रक्रिया कानून तथा संविधान के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होती है। इसलिए यह कहना कि केवल इस्तीफा होते ही तीस सेकंड में आंदोलन समाप्त हो जाएगा, राजनीतिक वक्तव्य तो हो सकता है, लेकिन इसे समस्या के समाधान की गारंटी नहीं माना जा सकता।

यदि वास्तविक उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बहाल करना है, तो समाधान पारदर्शी जांच, तथ्यों के सार्वजनिक स्पष्टीकरण और संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन में तलाशना होगा। केवल इस्तीफे की मांग पर अड़े रहना या बिना जवाब दिए मांग को खारिज कर देना, दोनों ही स्थितियां राजनीतिक गतिरोध को बढ़ा सकती हैं। व्यापारी किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। वे देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। बाजारों में काम करने वाले लाखों लोगों के सामने किराया, बिजली बिल, कर्मचारियों का वेतन, माल की खरीद और बैंक की किस्तों जैसी जिम्मेदारियां होती हैं। त्योहारों के समय बिक्री प्रभावित होने का नुकसान केवल दुकान के मालिक को नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे परिवार और कर्मचारियों को भी उठाना पड़ता है।इसलिए व्यापारिक संगठनों की मांगों को गंभीरता से सुनना सरकार और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है। यदि रैली या आंदोलन के लिए स्थान, समय और मार्ग में बदलाव करके व्यापारिक गतिविधियों को सुरक्षित रखा जा सकता है, तो ऐसा करने में किसी पक्ष को राजनीतिक हार नहीं माननी चाहिए।सरकार को कानून-व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं का संतुलन बनाए रखना चाहिए। विपक्ष को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार इस्तेमाल करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी रणनीति से आम लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो। प्रशासन को भी निष्पक्ष भूमिका निभाते हुए यातायात, सुरक्षा और बाजारों के संचालन के लिए स्पष्ट व्यवस्था करनी चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल व्यापारियों को अपने पक्ष में खड़ा करने के बजाय उनकी समस्याओं का समाधान करें। व्यापारिक संगठनों को भी अपनी मांगें स्पष्ट रूप से सामने रखनी चाहिए और राजनीतिक विवादों में किसी एक पक्ष का औजार बनने से बचना चाहिए। एक नवंबर की रैली और आंदोलन को लेकर यदि कोई विवाद है, तो संबंधित पक्षों के बीच तत्काल बातचीत होनी चाहिए। रैली के समय और स्थान का ऐसा निर्धारण किया जा सकता है, जिससे विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार भी सुरक्षित रहे और त्योहारों का कारोबार भी प्रभावित न हो। इसके साथ ही चुनाव आयोग से जुड़े सवालों पर तथ्यों के आधार पर सार्वजनिक संवाद होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी विपक्ष का जिम्मेदार आचरण भी है। विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन जनता के हितों की रक्षा करना उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी भी है। इसी प्रकार सरकार को भी आलोचना को दबाने के बजाय उसका उत्तर देना चाहिए। लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि राजनीतिक संघर्ष के बीच भी जनता के हित सर्वोपरि रहें।