संजय सक्सेना
संयुक्त राष्ट्र की गिरती विश्वसनीयता और उसके दोहरे मापदंड आज वैश्विक राजनीति की सबसे तीखी बहसों में गिने जाते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह संस्था ताकतवर देशों के दबाव में फैसले लेती है और कमजोर पड़ोसी के सवालों पर चुप हो जाती है। भारत के लिए यह शिकायत नई नहीं है। नई दिल्ली का मानना है कि जब भी देश के आंतरिक मामलों की बात आती है, यूएन के कुछ निकाय पूरी तस्वीर देखे बिना टिप्पणी करने में देर नहीं लगाते। ताजा विवाद विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट को लेकर है, जिस पर भारत ने बेहद सख्त जवाब दिया है।रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर बोलने वाले युवाओं को प्रताड़ना और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति के 81वें सत्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उनके मुताबिक ये आरोप गुमनाम और अपुष्ट सूचनाओं पर टिके हैं। भारत का तर्क सीधा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश के बारे में व्यापक और नकारात्मक निष्कर्ष केवल अज्ञात स्रोतों के भरोसे नहीं निकाले जा सकते। सवाल पद्धति का है: जिस रिपोर्ट के स्रोत ही सार्वजनिक न हों, उसकी जांच कैसे होगी और उस पर भरोसा कैसे किया जाए?
भारत सरकार की नजर में यह कोई अकेली घटना नहीं है। उसका कहना है कि बीते वर्षों में कई मौकों पर यूएन से जुड़े निकायों ने भारत के संप्रभु और संवैधानिक मामलों में दखल दिया। सबसे बड़ा उदाहरण नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का है। कानून पारित होने के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर की। भारत के विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि सीएए आंतरिक मामला है और संसद के संप्रभु अधिकार क्षेत्र में आता है। किसी विदेशी निकाय का इस पर कोई अधिकार नहीं बनता। किसी भी देश की न्यायपालिका और विधायिका के कामकाज में बाहरी संस्था का इस तरह उतरना कूटनीतिक मर्यादा के लिहाज से असामान्य माना गया।तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चले किसान आंदोलन के दौरान भी यही सिलसिला दिखा। कई विशेष प्रतिवेदकों ने आंदोलनकारियों के पक्ष में बयान दिए और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सरकारी कोशिशों पर सवाल उठाए। भारत का जवाब था कि उसके पास जीवंत लोकतंत्र है, जहां विवाद सुलझाने के लिए संसदीय, न्यायिक और संवाद के पर्याप्त रास्ते खुले हैं। इसलिए बाहरी संस्थाओं को उपदेश देने की जरूरत नहीं है। सरकार का यह भी कहना रहा कि हिंसा और देश-विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून-सम्मत कदम उठाना हर लोकतांत्रिक सरकार का अधिकार और दायित्व है।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद टकराव और तीखा हुआ। यूएन के कुछ मानवाधिकार विशेषज्ञों ने संचार माध्यमों पर लगी पाबंदियों और एहतियाती गिरफ्तारियों पर चिंता जताई। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में आक्रामक जवाब देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। अनुच्छेद 370 पर फैसला पूरी तरह भारत का आंतरिक संवैधानिक मामला है। नई दिल्ली का सबसे बड़ा तर्क यह रहा कि सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद कश्मीर में मासूम नागरिकों के मानवाधिकारों का असली हनन करता है। उस पर संस्थाएं प्रायः खामोश रहती हैं, जबकि शांति और विकास के लिए उठाए गए कदमों पर सवाल खड़े किए जाते हैं।यही चयनात्मकता भारत की सबसे बड़ी शिकायत है। दुनिया के कई हिस्सों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, कट्टरपंथ पनपता है और आतंकवाद के वैश्विक नेटवर्क सक्रिय रहते हैं। वहां संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया अक्सर औपचारिक बयानों से आगे नहीं बढ़ पाती। भारत जैसे लोकतांत्रिक और पारदर्शी देश में हर घटना पर उसकी सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। भारत का आरोप है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के नाम पर चलने वाले कुछ संगठनों, खासकर विदेशी फंडिंग पर निर्भर एनजीओ की अपुष्ट रिपोर्टें बिना ठोस जांच के आधिकारिक दस्तावेजों में जगह पा जाती हैं।
हाल में दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों की हिरासत पर ओएचसीएचआर ने चिंता जताई। भारत ने इसे पूरी तरह अनुचित बताते हुए कहा कि यह संस्था की चरम चयनात्मकता दिखाती है। सरकार के अनुसार कानून तोड़ने वालों के खिलाफ एजेंसियों की कार्रवाई को मानवाधिकार के चश्मे से देखना गलत है। इसी कड़ी में 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के आरोप में यूएपीए के तहत बंद उमर खालिद की लंबी न्यायिक हिरासत का मामला भी आता है। बताया जाता है कि संयुक्त राष्ट्र के मनमानी हिरासत पर कार्य समूह ने इसे मनमाना ठहराते हुए रिहाई, मुआवजे और जांच की मांग की। सीएए विरोध के दौरान सिलीगुड़ी कॉरिडोर, यानी चिकन नेक, को काटकर पूर्वोत्तर को अलग करने की साजिश के आरोपी शरजील इमाम के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय मंचों की सक्रियता दिखी। भारत में ऐसी कार्रवाइयों को अदालतों की निगरानी वाली कानूनी प्रक्रिया माना जाता है, जबकि आलोचक इसे असहमति के दमन के रूप में देखते हैं। भारत का पक्ष है कि आरोपों की सच्चाई तय करना अदालतों का काम है, बाहरी संस्थाओं का नहीं।अफजल गुरु का मामला भी इसी बहस में बार-बार लौटता है। 2001 के संसद हमले के दोषी को लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 2013 में फांसी दी गई। तब यूएन से जुड़े मानवाधिकार विशेषज्ञों और प्रतिवेदकों ने आपत्ति जताई और निष्पक्ष सुनवाई तथा कानूनी प्रतिनिधित्व पर सaवाल उठाए। भारत का रुख रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय तक चली पारदर्शी प्रक्रिया पर ऐसे सवाल देश की न्यायपालिका की साख पर अनावश्यक टिप्पणी हैं। भारत का संदेश साफ है। उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और जीवंत मीडिया नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में सक्षम हैं, और वे बाहरी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं हैं। जीना रोमेरो की रिपोर्ट पर कड़ा रुख इसी आत्मविश्वास का नतीजा है। असली सवाल यूएन के सामने है: अगर उसे अपनी साख बचानी है, तो उसे सत्यापित तथ्यों, पारदर्शी स्रोतों और बिना भेदभाव के पैमानों पर लौटना होगा। वरना हर नई रिपोर्ट उसकी विश्वसनीयता का एक और इम्तिहान बनकर रह जाएगी।





