लोकतंत्र की शुचिता और चुनावी सुधार: आयोग की देर से जागी चेतना

Sanctity of democracy and electoral reforms: Commission's late awakening

अशोक भाटिया

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘एक वोट’ की कीमत सरकार बनाने और गिराने से कहीं अधिक, एक आम नागरिक की संप्रभुता और देश के प्रति उसकी हिस्सेदारी का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रतीक है। यही कारण है कि जब भी मतदाता सूचियों की पारदर्शिता या उसमें होने वाले किसी भी प्रकार के प्रशासनिक हेरफेर की बात सामने आती है, तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल ढांचे पर ही सवाल खड़े होने लगते हैं। पिछले लंबे समय से देश के विपक्षी दल भारत निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, विशेषकर ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ के नाम पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने को लेकर सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक आंदोलनरत थे। इस चौतरफा राजनीतिक दबाव, राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों और देश की शीर्ष अदालत की कड़ी कानूनी जांच के बाद आखिरकार चुनाव आयोग बैकफुट पर आने और अपनी गलतियों में सुधार करने के लिए राजी हुआ है। आयोग द्वारा आगामी ‘स्पेशल समरी रिवीजन’ 2027 की प्रक्रिया में चार बड़े संरचनात्मक बदलावों की घोषणा करना और विपक्षी दलों से बातचीत के लिए मेज पर आना, लोकतांत्रिक दबाव की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के अन्य घटकों ने इस कदम को “टू लिटिल, टू लेट” यानी बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम करार देकर यह साफ कर दिया है कि चुनावी शुचिता की यह लड़ाई अभी थमी नहीं है। इस पूरे विवाद की जड़ें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान अपनाई गई उस विवादित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ प्रक्रिया में छिपी हैं, जिसके तहत विपक्ष का आरोप है कि देश भर में लगभग 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम बिना किसी उचित नोटिस, जमीनी सत्यापन या पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया के मतदाता सूची से अचानक हटा दिए गए। लोकतंत्र के इतिहास में यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे किसी भी तकनीकी त्रुटि, लिपिकीय चूक या सामान्य प्रशासनिक लापरवाही का नाम देकर खारिज नहीं किया जा सकता। विपक्ष का यह आरोप बेहद गंभीर और विचारणीय है कि जानबूझकर एक खास राजनीतिक रणनीति के तहत उन मतदाताओं को निशाना बनाया गया जो सत्तापक्ष के प्रति असहमति का रुख रखते हैं या जिनकी राजनीतिक निष्ठाएं शासन के अनुकूल नहीं हैं।

जब इतनी बड़ी संख्या में नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन प्रशासनिक फाइलों और सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम के पीछे छिपकर किया जाने लगे, तो विपक्षी दलों का आक्रोशित होना और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर अड़ जाना पूरी तरह स्वाभाविक हो जाता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा देश भर में किए गए उग्र प्रदर्शनों ने आयोग को यह अहसास करा दिया कि बंद कमरों में बैठकर और राजनीतिक दलों के बड़े प्रतिनिधिमंडलों से मिलने से इनकार करके जनता के भरोसे को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। लोकतांत्रिक संस्थाओं का यह अड़ियल रवैया ही देश में संस्थागत संकट को जन्म देता है, जहां जनता का भरोसा अपनी ही चुनी हुई व्यवस्था से उठने लगता है। इस पूरे घटनाक्रम में देश की न्यायपालिका, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक रही है। विपक्ष द्वारा दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जब देश के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अन्य कानूनी विशेषज्ञों ने न्यायालय के समक्ष यह अकाट्य तथ्य रखा कि नागरिकों को बिना किसी सुनवाई का अवसर दिए, बिना किसी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन किए उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है, तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर अत्यंत सख्त रुख अपनाया। अक्टूबर महीने के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग से सीधे जवाब तलब किए जाने और इस पूरी प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठाए जाने के बाद ही आयोग के भीतर प्रशासनिक हलचल तेज हुई। न्यायपालिका की यह सक्रियता एक बार फिर साबित करती है कि जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी निष्पक्षता खोने लगती हैं या किसी एक विचारधारा के दबाव में काम करने का भ्रम पैदा करती हैं, तब संविधान के असली रक्षक के रूप में देश की शीर्ष अदालत को ही आगे आना पड़ता है। अदालत की इस सख्त निगरानी और लगातार बढ़ते जन-आक्रोश का ही नतीजा है कि चुनाव आयोग ने अपने अड़ियल रुख को छोड़ते हुए वार्ता और सुधार का रास्ता चुना है।

आयोग द्वारा घोषित किए गए चार बड़े सुधार और 17 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होने वाली ‘स्पेशल समरी रिवीजन’ 2027 की समयसीमा—जिसके तहत 12 नवंबर 2026 को ड्राफ्ट रोल और 4 जनवरी 2027 को अंतिम मतदाता सूची जारी की जानी है—सैद्धांतिक रूप से एक सकारात्मक कदम लग सकती है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस कदम की सार्थकता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या आयोग वाकई स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करने की अपनी खोई हुई साख को वापस पा सकता है। विपक्ष की यह मांग पूरी तरह न्यायसंगत है कि समूची मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया का एक स्वतंत्र न्यायिक या उच्च-स्तरीय तकनीकी ऑडिट कराया जाना चाहिए। जब तक एक-एक कटे हुए नाम की सत्यता की जांच नहीं हो जाती और यह सुनिश्चित नहीं कर लिया जाता कि भविष्य में सॉफ्टवेयर या मानवीय त्रुटि के नाम पर किसी भी वैध नागरिक का नाम सूची से बाहर नहीं होगा, तब तक किसी भी नए सुधार को केवल एक राजनीतिक ‘डैमेज कंट्रोल’ की कवायद ही माना जाएगा। निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसका ‘इकबाल’ और आम जनता का उस पर अटूट विश्वास होता है। टी.एन. शेषन जैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के दौर में इस संस्था ने जो स्वायत्तता और धमक अर्जित की थी, हालिया वर्षों में उस पर गंभीर आंच आई है। पक्षपात के आरोपों, सत्तापक्ष की रैलियों और बयानों पर नरमी तथा विपक्ष की शिकायतों पर अत्यधिक कड़ाई के आरोपों ने आयोग की छवि को एक ‘कमजोर अंपायर’ जैसी बना दिया है। ऐसे में, यदि आयोग अब सुधारों के लिए तैयार हुआ है, तो उसे केवल नियमों में मामूली फेरबदल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी कार्यशैली में पूर्ण पारदर्शिता लानी होगी। विपक्षी दलों के साथ बैठकों को केवल औपचारिकता न बनाकर उनके द्वारा उठाए गए तकनीकी और जमीनी मुद्दों का ठोस समाधान खोजना होगा।

यह समझना आवश्यक है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी जीवंत लोकतंत्र की रीढ़ होते हैं। यदि चुनाव की पहली सीढ़ी—यानी मतदाता सूची—ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो उसके बाद आने वाले किसी भी जनादेश पर सवाल उठना लाजिमी है। चुनाव आयोग का यह झुकाव इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामूहिक जन-दबाव और कानूनी संघर्ष के सामने बड़ी से बड़ी संस्थाओं को भी जवाबदेह बनना पड़ता है। एक फ्रीलांस पत्रकार के रूप में निष्पक्षता से विचार किया जाए तो यह संकट केवल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है, बल्कि देश के हर उस नागरिक का है जो यह मानता है कि लोकतंत्र में उसकी आवाज का मूल्य है। आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि तकनीकी विकास और डिजिटल अभियानों के नाम पर आम ग्रामीण या आर्थिक रूप से पिछड़े मतदाता को उसकी अज्ञानता के कारण व्यवस्था से बाहर न कर दिया जाए, क्योंकि अक्सर देखा गया है कि डिजिटल सुधारों की सबसे पहली गाज समाज के सबसे हाशिए पर खड़े व्यक्ति पर ही गिरती है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि कोई सरकारी मशीनरी अपनी मर्जी से नागरिकों को उनके मूलभूत अधिकारों से बेदखल कर दे।

अंततः, निर्वाचन आयोग का यह कदम सुधार की केवल शुरुआत है, मंजिल नहीं। जब तक देश का आखिरी मतदाता यह महसूस नहीं करता कि उसका वोट पूरी तरह सुरक्षित है और कोई भी प्रशासनिक मशीनरी उसकी जानकारी के बिना उसे मतदाता सूची से बाहर नहीं कर सकती, तब तक भारतीय लोकतंत्र की शुचिता का दावा अधूरा ही रहेगा। विपक्ष का यह रुख कि वे इस लड़ाई को तार्किक अंत तक ले जाएंगे, यह दर्शाता है कि आगामी दिनों में राजनीतिक और कानूनी मोर्चे पर चुनावी सुधारों को लेकर बहस और तेज होने वाली है। आयोग को अब केवल कागजी आश्वासनों और शब्दों से आगे बढ़कर धरातल पर अपनी निष्पक्षता सिद्ध करनी होगी, क्योंकि लोकतंत्र में संस्थाएं केवल संवैधानिक अनुच्छेदों से नहीं, बल्कि जन-विश्वास और नैतिक आचरण से जीवित रहती हैं। यदि आयोग इस ऐतिहासिक मोड़ पर अपनी साख बचाने में विफल रहता है, तो यह केवल एक संस्था की विफलता नहीं होगी, बल्कि यह पूरे भारतीय गणतंत्र के भविष्य के लिए एक अत्यंत चिंताजनक और आत्मघाती संकेत होगा।