थाली में छिपे जोखिम पहचानिए, खानपान की आदतें सुधारिए और हृदय को दीजिए स्वस्थ जीवन का उपहार
सत्य भूषण शर्मा
रसोई को भारतीय परिवारों में केवल भोजन बनाने का स्थान नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और संस्कारों की आधारशिला माना जाता है। माँ के हाथ का भोजन, घर में तैयार ताजी सब्जियाँ, दाल, रोटी और मौसमी फल हमारी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। किंतु बदलती दिनचर्या, स्वाद की बढ़ती चाहत और बाजार में उपलब्ध अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों ने हमारी थाली का स्वरूप बदल दिया है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि हम क्या खाते हैं, बल्कि यह भी है कि कितना खाते हैं, कैसे पकाते हैं और कितनी नियमितता से खाते हैं।
हृदय रोग आज दुनिया के सामने एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती हैं। इनके पीछे उम्र, आनुवंशिकता, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, शारीरिक निष्क्रियता, तंबाकू सेवन और खानपान सहित अनेक कारक काम करते हैं। भोजन की गलत आदतें इन जोखिमों को बढ़ा सकती हैं। अच्छी बात यह है कि रसोई में कुछ समझदारी भरे बदलाव करके हृदय स्वास्थ्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
स्वाद के नाम पर सेहत से समझौता क्यों?
भारतीय भोजन में मसालों का विशेष स्थान है। हल्दी, जीरा, धनिया, अदरक, लहसुन और काली मिर्च जैसे मसाले भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ अनेक उपयोगी पोषक एवं जैव सक्रिय तत्व भी प्रदान करते हैं। इसलिए सभी मसालों को हृदय के लिए हानिकारक मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब भोजन में अत्यधिक नमक, अधिक मात्रा में तेल-घी, बार-बार गर्म किया गया तेल, अतिरिक्त चीनी और अधिक संतृप्त वसा का सेवन नियमित आदत बन जाता है।
पहला जोखिम—अत्यधिक नमक: नमक का अधिक सेवन रक्तचाप बढ़ाने में योगदान दे सकता है। उच्च रक्तचाप हृदय रोग और स्ट्रोक का प्रमुख जोखिम कारक है। भोजन में ऊपर से नमक डालने, अचार-पापड़ का अधिक सेवन करने तथा नमकीन, चिप्स और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को नियमित रूप से खाने से शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों के लिए प्रतिदिन 2,000 मिलीग्राम से कम सोडियम, अर्थात पाँच ग्राम से कम नमक की सलाह देता है। इसमें भोजन में पहले से मौजूद नमक भी शामिल है।
दूसरा जोखिम—अधिक तेल और घी: तेल या घी की अत्यधिक मात्रा भोजन की ऊर्जा बढ़ाती है। घी, मक्खन, वसायुक्त मांस और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों में संतृप्त वसा अधिक हो सकती है, जो रक्त में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने में योगदान देती है। दूसरी ओर, सरसों, मूँगफली, तिल और अन्य वनस्पति स्रोतों से प्राप्त असंतृप्त वसा का उचित मात्रा में उपयोग बेहतर विकल्प हो सकता है। किसी भी तेल को बार-बार गर्म करके इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
तीसरा जोखिम—अतिरिक्त चीनी: मीठे पेय, शरबत, मिठाइयाँ, बिस्कुट और मीठे पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन वजन बढ़ने, मधुमेह और अन्य चयापचय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। इन समस्याओं का संबंध हृदय रोगों से भी है। प्राकृतिक रूप से फल में मौजूद शर्करा और उसमें मौजूद फाइबर को चीनी मिलाकर बनाए गए पेय के समान नहीं समझना चाहिए।
चौथा जोखिम—तला-भुना और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन: समोसे, पकौड़े, फ्रेंच फ्राइज, नमकीन और फास्ट फूड का बार-बार सेवन कैलोरी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा बढ़ा सकता है। विशेष चिंता उन खाद्य पदार्थों को लेकर है, जिनमें ट्रांस फैट या अधिक संतृप्त वसा मौजूद हो। ऐसे भोजन को रोजमर्रा की आदत बनाने के बजाय सीमित अवसरों तक रखना बेहतर है।
पाँचवाँ जोखिम—मैदा और रिफाइंड अनाज की अधिकता: मैदे से बने बेकरी उत्पाद, सफेद ब्रेड, नूडल्स और अन्य परिष्कृत अनाज यदि साबुत अनाज, दालों, सब्जियों और फलों की जगह लेने लगें, तो आहार में फाइबर की कमी हो सकती है। साबुत गेहूँ, जौ, ओट्स, दलिया और अन्य साबुत अनाज संतुलित आहार के उपयोगी घटक हैं।
रसोई की दस आदतें, जिन पर ध्यान देना जरूरी
हृदय की सुरक्षा के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ को दोष देने के बजाय अपनी संपूर्ण भोजन-शैली की समीक्षा करना आवश्यक है। विशेष रूप से इन दस आदतों में सुधार उपयोगी हो सकता है—
भोजन में आवश्यकता से अधिक नमक डालना।
तेल और घी का अनियंत्रित इस्तेमाल करना।
चीनी, मिठाइयों और मीठे पेय का अधिक सेवन करना।
तले हुए खाद्य पदार्थों को नियमित भोजन का हिस्सा बना लेना।
ट्रांस फैट और अधिक संतृप्त वसा वाले खाद्य पदार्थों का बार-बार सेवन करना।
अचार, पापड़, चिप्स और नमकीन जैसे अधिक सोडियम वाले खाद्य पदार्थ अधिक खाना।
साबुत अनाज की जगह मैदे और अत्यधिक परिष्कृत अनाज पर निर्भर रहना।
दालों, फलियों, हरी सब्जियों और फलों की मात्रा कम रखना।
भोजन की मात्रा, कैलोरी और बार-बार कुछ खाते रहने की आदत पर नियंत्रण न रखना।
असंतुलित भोजन के साथ शारीरिक निष्क्रियता और अनियमित दिनचर्या को बनाए रखना।
यह समझना जरूरी है कि इन सभी वस्तुओं का प्रभाव उनकी मात्रा, गुणवत्ता, सेवन की आवृत्ति और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। मसाले, तेल या किसी एक खाद्य पदार्थ को अपने आप हृदय रोग का कारण मान लेना उचित नहीं है।
हृदय के अनुकूल भोजन कैसा हो?
स्वस्थ भोजन का अर्थ बेस्वाद भोजन नहीं है। भारतीय रसोई में उपलब्ध अनेक सामान्य खाद्य पदार्थों से पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन तैयार किया जा सकता है। दालें, चना, राजमा, विभिन्न फलियाँ, मौसमी सब्जियाँ, फल, साबुत अनाज, सीमित मात्रा में मेवे और उचित मात्रा में उपयोग किए गए वनस्पति तेल संतुलित भोजन का हिस्सा बन सकते हैं।
सब्जियों में विविधता रखें। दाल और अन्य प्रोटीन स्रोतों को भोजन में स्थान दें। साबुत अनाज को प्राथमिकता दें तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। तेल की मात्रा नापकर इस्तेमाल करना, नमक धीरे-धीरे कम करना और मीठे पेय के स्थान पर सादा पानी चुनना छोटे लेकिन उपयोगी कदम हैं।
इसी प्रकार, भोजन की मात्रा पर ध्यान देना भी जरूरी है। स्वस्थ खाद्य पदार्थ भी आवश्यकता से बहुत अधिक मात्रा में खाए जाएँ, तो कुल कैलोरी बढ़ सकती है। इसलिए संतुलन, विविधता और नियमितता को खानपान का मूल मंत्र बनाना चाहिए।
भोजन के साथ जीवनशैली भी है जरूरी
केवल रसोई में बदलाव करना पर्याप्त नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तंबाकू से दूरी, तनाव का प्रबंधन और वजन पर नियंत्रण भी हृदय स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण आधार हैं। सामान्यतः वयस्कों को सप्ताह में कम-से-कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखना चाहिए, अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार इसमें बदलाव किया जा सकता है।
समय-समय पर रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की जाँच भी महत्वपूर्ण है। जिन लोगों को पहले से हृदय रोग, मधुमेह, गुर्दे की बीमारी या उच्च रक्तचाप है, उन्हें अपने चिकित्सक और आहार विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार भोजन में बदलाव करना चाहिए। दवाएँ बंद करके केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।
हृदयाघात के संभावित संकेतों—जैसे सीने में दबाव या दर्द, साँस लेने में परेशानी, ठंडा पसीना, मतली अथवा हाथ, पीठ या जबड़े में असहजता—को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षणों में तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेना आवश्यक है।
निष्कर्ष: बदलाव थाली से शुरू कीजिए
हृदय की सेहत किसी एक दिन के परहेज या किसी चमत्कारी खाद्य पदार्थ से सुरक्षित नहीं होती। यह हमारी प्रतिदिन की आदतों का परिणाम है। रसोई में नमक और तेल की मात्रा पर नियंत्रण, अतिरिक्त चीनी से दूरी, साबुत अनाज और पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता तथा नियमित शारीरिक गतिविधि—ये सभी मिलकर स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव बनाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवार स्वाद और स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित करें। बच्चों को बचपन से पौष्टिक भोजन की आदत सिखाएँ और बुजुर्गों के खानपान में उनकी चिकित्सकीय आवश्यकताओं का ध्यान रखें।
याद रखिए, हृदय की सुरक्षा का रास्ता किसी महँगी दवा या विशेष खाद्य पदार्थ से ही नहीं, बल्कि रोज की थाली में लिए गए समझदारी भरे निर्णयों से भी होकर गुजरता है। रसोई की छोटी-छोटी सावधानियाँ जीवन की बड़ी खुशियों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।





