एन जी भट्ट
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव अब निर्णायक दौर में पहुंच गए हैं। पहले चरण के मतदान के बाद 11 सितंबर को दूसरे और अंतिम चरण में प्रदेश के 147 नगरीय निकायों में 4,774 वार्डों के लिए मतदान होगा। करीब 87.60 लाख मतदाता 18,266 प्रत्याशियों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करेंगे। छह नगर निगमों सहित बड़े शहरों के चुनाव होने के कारण इस चरण को पहले चरण से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व का माना जा रहा है।
पहले चरण में 162 निकायों के 5,393 वार्डों के लिए हुए मतदान में 57.52 लाख मतदाताओं में से 76.41 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। यह आंकड़ा बताता है कि स्थानीय मुद्दों को लेकर शहरी मतदाताओं में खासा उत्साह है। अरनोद में 91.98 प्रतिशत मतदान इसका उदाहरण है, जबकि कुछ निकायों में मतदान 70 प्रतिशत से नीचे भी रहा।
दूसरे चरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर और उदयपुर सहित छह नगर निगम शामिल हैं। इसके अलावा अनेक नगर परिषद और नगरपालिकाओं में भी मतदान होगा। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस चरण में अपना राजनीतिक अभियान पूरी ताकत से चलाया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जयपुर में रोड शो कर पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस ने स्थानीय समस्याओं, महंगाई, सफाई, सड़कों, पानी और नगर निकायों के कामकाज को प्रमुख मुद्दा बनाया है।
इन चुनावों को केवल पार्षद चुनने की प्रक्रिया मानना राजनीतिक तस्वीर को अधूरा देखना होगा। नगर निकाय सीधे नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े हैं। सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, पेयजल, पार्क, अतिक्रमण और शहरी नियोजन जैसे मुद्दे मतदाता के सामने प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए बड़े नेताओं के प्रचार के बावजूद अंतिम फैसला स्थानीय प्रत्याशी की छवि और उसके क्षेत्र में पकड़ पर भी निर्भर करेगा।
पहले चरण में कुछ स्थानों पर झड़प, कथित फर्जी मतदान और ईवीएम संबंधी शिकायतें भी सामने आईं। ऐसे घटनाक्रम दूसरे चरण में प्रशासन और राजनीतिक दलों के लिए अतिरिक्त चुनौती हैं। चुनाव की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होगी।
राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव भाजपा सरकार के लिए स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की परीक्षा है, तो कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और जनाधार को परखने का अवसर। हालांकि निकाय चुनावों के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव का जनादेश मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इनसे दोनों दलों की जमीनी ताकत, संगठनात्मक सक्रियता और शहरी मतदाताओं की प्राथमिकताओं के संकेत जरूर मिलेंगे।
14 सितंबर को दोनों चरणों की मतगणना होगी। इसके बाद 21 सितंबर को निकाय प्रमुखों और 22 सितंबर को उपाध्यक्षों के चुनाव होंगे। इस तरह 11 सितंबर का मतदान केवल पार्षदों के चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में शहरों की स्थानीय सत्ता के राजनीतिक समीकरण भी तय करेगा।





