कृति आरके जैन
पाँच सितंबर को स्कूलों में सम्मान का शोर उठता है—दीवारों पर रंग चढ़ते हैं, हाथों में फूल आते हैं और मंच से शिक्षक की महिमा के पुल बाँधे जाते हैं। मगर तालियों के बीच एक सवाल अनसुना रह जाता है—यह शिक्षक दिवस है या हमारी एक दिन की औपचारिक कृतज्ञता? जिस शिक्षक को आज गुरु, मार्गदर्शक और राष्ट्रनिर्माता कहा जाता है, वही कल फाइलों, आदेशों, रजिस्टरों और परीक्षा परिणामों के बोझ तले फिर अकेला खड़ा होगा। फूल मुरझाएँगे, कार्ड फेंक दिए जाएँगे, तस्वीरें पुरानी पड़ जाएँगी; पर पहली घंटी के साथ उसकी जिम्मेदारियाँ फिर सामने होंगी। शिक्षक दिवस की असली सार्थकता तभी है, जब समारोह खत्म होने के बाद भी शिक्षक का सम्मान बना रहे।
कक्षा की चार दीवारों में अलग-अलग परिस्थितियों से जूझते बच्चे बैठे होते हैं—कोई भूखा है, कोई टूटे परिवार का बोझ ढो रहा है, कोई आर्थिक अभाव से सहमा है तो कोई मोबाइल के कारण एकाग्रता खो चुका है। किसी के पास किताब नहीं, किसी के घर पढ़ने की जगह या परिवार का सहयोग नहीं। फिर भी अपेक्षा है कि शिक्षक सबको समान परिणाम दे। यह वैसा है जैसे किसान को जमीन, पानी और मौसम की चिंता किए बिना भरपूर फसल देने को कहा जाए। बच्चे की परिस्थितियों और मनःस्थिति का हिसाब कोई नहीं रखता; परिणाम खराब होते ही सवाल शिक्षक पर आता है। समाज शिक्षक को मशीन मानता है—न थकने वाली, न परेशान होने वाली और न असफल होने वाली।
शिक्षक का अधिकांश श्रम कागज पर दर्ज नहीं होता। अपनी जेब से कॉपियाँ-किताबें खरीदना, गरीब बच्चे की फीस या परीक्षा-फॉर्म भरना, घर पर निःशुल्क पढ़ाना, अपने खाने का पैसा बचाकर जरूरतमंद विद्यार्थी की मदद करना—ये उसकी नौकरी की शर्तें नहीं हैं। बुखार हो या शरीर टूट रहा हो, कक्षा में खड़ा रहना पड़ता है; छुट्टी भी सवाल खड़े कर देती है। लेकिन परिणाम में दो अंक कम होते ही शिक्षक से जवाब माँगा जाता है। सम्मान का यह कैसा ढंग है—फूल भी उसी के लिए और दोष भी उसी के सिर? उसका असली श्रम रिपोर्टों में नहीं, बच्चे के आत्मविश्वास, टूटे विद्यार्थी की वापसी और गरीब बच्चे की तरक्की में दिखता है।
आज शिक्षक को पाठ के साथ बच्चे को भी समझना है। मोबाइल ने उसकी उँगलियों में पूरी दुनिया रख दी है, लेकिन हर सूचना ज्ञान नहीं। ध्यान कुछ सेकंड में भटकता है, तुलना बढ़ती है और घर-परिवार का दबाव बच्चों को बेचैन करता है। फिर भी शिक्षक से अपेक्षा है कि वह कक्षा संभाले, अनुशासन रखे, पाठ्यक्रम पूरा करे और हर बच्चे को टॉपर बनाए। उसे अध्यापक के साथ मित्र, काउंसलर, प्रेरक और कई बार माँ-बाप की भूमिका भी निभानी पड़ती है। चालीस अलग-अलग दिमागों को समझना आसान नहीं। अभिभावक परिणाम, स्कूल अनुशासन और व्यवस्था लक्ष्य चाहती है; इन अपेक्षाओं के बीच शिक्षक की थकान, परेशानी और निजी जिंदगी सबसे पहले छूट जाती है।
ईमानदारी का तकाजा है कि शिक्षक को देवता न माना जाए। हर शिक्षक आदर्श नहीं होता। कुछ लापरवाह हैं, कुछ जिम्मेदारी से बचते हैं और कुछ विद्यार्थियों के साथ अन्याय करते हैं। ऐसे मामलों में जवाबदेही होनी चाहिए। लेकिन कुछ खराब उदाहरणों के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को कटघरे में खड़ा करना भी गलत है। सवाल यह भी होना चाहिए कि शिक्षक को बेहतर बनाने के लिए व्यवस्था ने क्या किया? उसे कैसा प्रशिक्षण मिला? कक्षा में कितने बच्चे हैं? गैर-शैक्षणिक काम कितना है? संसाधन और पढ़ाने की स्वतंत्रता कितनी है? यदि शिक्षक का समय कागजी काम में जाए, कक्षा भीड़ से भरी हो और निर्णय ऊपर से आएँ, तो केवल परिणाम माँगना अपनी जिम्मेदारी से बचना है। अच्छी शिक्षा अच्छे शिक्षक और अच्छी व्यवस्था, दोनों से पैदा होती है।
शिक्षक दिवस पर फूलों से अधिक जरूरी वे सवाल हैं, जो शिक्षक का सच सामने लाएँ। क्या उसे समय पर वेतन, पर्याप्त शिक्षण सामग्री मिलती है? क्या वह हर बच्चे पर ध्यान दे सकता है या सरकारी कामों में कक्षा से बाहर भेज दिया जाता है? क्या उसकी समस्या सुनने वाला कोई है? सबसे जरूरी—क्या पाठ पूरा करना ही शिक्षा है? किसी बच्चे की आँखों में आँसू हों तो किताब बंद कर उसे सुनना जरूरी हो सकता है। उसका आत्मविश्वास लौटाना, असफलता के बाद खड़ा करना और उसे बेकार न महसूस होने देना—ये भी शिक्षा के परिणाम हैं। पाठ का एक पन्ना अधूरा रहना छोटी बात है; बच्चे का मन टूटना बड़ा नुकसान।
शिक्षक की मेहनत का सबसे बड़ा प्रतिफल मंचीय सम्मान नहीं, वर्षों बाद लौटकर आया विद्यार्थी है। जब वह कहता है—“आपने तब मेरा साथ नहीं छोड़ा, इसलिए मैं आगे बढ़ पाया”—तभी शिक्षक अपनी मेहनत का अर्थ समझता है। कोई याद करता है कि फीस न होने पर शिक्षक ने किताब दिलाई; कोई बताता है कि सबने असफल माना, तब शिक्षक ने संभावना देखी। यही पूँजी वेतन-पर्ची नहीं माप सकती। लेकिन शिक्षक को केवल भावनात्मक संतोष के भरोसे छोड़ना गलत है। उसे उचित वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल, कम गैर-शैक्षणिक बोझ, पर्याप्त संसाधन और अपनी बात कहने का अधिकार चाहिए। कृतज्ञता जरूरी है, वेतन का विकल्प नहीं।
जिस शिक्षक के हाथों में बच्चों का भविष्य है, उसकी थकान कौन समझता है? पाँच सितंबर की सच्ची गुरु-पूजा फूलों में नहीं, शिक्षक को मनुष्य मानने में है। उसकी समस्या सुनी जाए, गलती पर जवाबदेही और ईमानदार मेहनत पर भरोसा हो। शिक्षक को परीक्षा-परिणाम की मशीन मानना शिक्षा से अन्याय है। दबाव, अविश्वास और कागजी बोझ में जला शिक्षक भविष्य कैसे सँवारेगा? पाँच सितंबर की माला उतर जाती है, जिम्मेदारी नहीं। सवाल फूलों का नहीं, छह सितंबर के व्यवहार का है। पाँच सितंबर तारीख है; असली परीक्षा 364 दिनों में होती है। सच यही है—इस परीक्षा में हम अभी पूरे अंकों के हकदार नहीं हैं।





