स्थानीय निकाय चुनाव के बाद होगी गांवों की सरकारों के लिए मशक्कत

Intense effort for village-level governments to follow local body elections

एन जी भट्ट

राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। शहरी निकायों में चुनावी तस्वीर साफ होने के बाद अब सियासी दलों और जनप्रतिनिधियों की नजर गांवों की सरकार पर टिकेगी। नगर निकाय चुनाव केवल स्थानीय सत्ता के समीकरण तय नहीं करेंगे, बल्कि इनके परिणाम आगामी पंचायत चुनावों की रणनीति और राजनीतिक माहौल को भी प्रभावित करेंगे। यही वजह है कि स्थानीय निकाय चुनाव के बाद गांवों की सरकार बनाने की मशक्कत किसी बड़े राजनीतिक अभियान से कम नहीं होगी।

राज्य में 309 नगरीय निकायों के चुनाव में 10,245 पार्षद पदों के लिए मुकाबला हो रहा है। नगरीय निकाय चुनावों में मतदान से पहले कुल 77 पार्षद निर्विरोध निर्वाचित हों गए हैं। निर्विरोध निर्वाचित पार्षदों में भाजपा के 44 कांग्रेस के 16 और निर्दलीय 17 पार्षद शामिल हैं । राजस्थान में नगर निकायों के लिए दो चरणों में 9 एवं 11 सितंबर को मतदान होगा और इसके बाद 14 सितंबर को मतगणना के बाद निकायों में बहुमत जुटाने और बोर्ड बनाने की कवायद शुरू होगी। 21 सितंबर को महापौर/सभापति/अध्यक्ष तथा 22 सितंबर को उपमहापौर/उपसभापति/उपाध्यक्ष का चुनाव होगा। राजस्थान में 10 निगम, 47 नगर परिषद और 252 नगर पालिकाए है । नगर निकायो के चुनावों के उपरान्त राजनीतिक दलों के सामने अगली बड़ी चुनौती पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव होंगे। गांवों में सरपंच, पंचायत समिति और जिला परिषद स्तर पर राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना प्रदेश की राजनीति में हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है।

राजस्थान में इस बार 14,403 ग्राम पंचायतें, 457 पंचायत समितियां और 41 जिला परिषदें चुनाव होंगें हैं। rajy की 14,403 ग्राम पंचायतों में 1,30,282 वार्ड हैं, जबकि 457 पंचायत समितियों में 8,221 और 41 जिला परिषदों में 1,403 वार्ड हैं। इस बार एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव मतपत्र से, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के चुनाव ईवीएम से कराने की तैयारी है।

प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार पंचायत चुनाव की प्रक्रिया 23 सितंबर से शुरू होकर 15 नवंबर 2026 तक पूरी करने का प्रस्ताव है। पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्यों के चुनाव चार चरणों में 13, 23, 29 अक्टूबर और 3 नवंबर को प्रस्तावित हैं। इसके बाद प्रधान और जिला प्रमुख के चुनाव 14 नवंबर, जबकि उपप्रधान और उपप्रमुख के चुनाव 15 नवंबर को प्रस्तावित हैं। यानी राजस्थान में इस बार 14,403 गांवों की सरकार चुनने के साथ-साथ 41 जिला प्रमुख और 457 प्रधान चुने जाएंगे। यानी प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कुल 1,54,907 पदों के लिए चुनाव होने है।यही वजह है कि नगरीय निकाय चुनाव के बाद राजस्थान की राजनीति का पूरा फोकस गांवों की ओर मुड़ना तय है।

राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव की तैयारियों के बीच आरक्षण लॉटरी की नई तारीखें तय कर दी गई हैं। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार प्रधान, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्यों के लिए आरक्षण लॉटरी 17 सितंबर 2026 को निकाली जाएगी, जबकि सरपंच और वार्ड पंच पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी 18 सितंबर 2026 को होगी।17 सितंबर को जिला स्तर पर लॉटरी ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के संशोधित कार्यक्रम के मुताबिक 17 सितंबर को जिला स्तर पर आरक्षण प्रक्रिया आयोजित होगी। इसमें प्रमुख रूप से
जिला परिषद सदस्य,पंचायत समिति सदस्य
और प्रधान पद के लिए आरक्षण और लॉटरी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।इसके अगले दिन यानी 18 सितंबर को उपखंड स्तर पर सरपंच और वार्ड पंच पदों की आरक्षण लॉटरी निकाली जाएगी। इसके बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि संबंधित ग्राम पंचायतों और वार्डों में कौन-सी सीट सामान्य, महिला, एससी, एसटी या अन्य आरक्षित वर्गों के लिए निर्धारित होगी। आरक्षण लॉटरी की प्रक्रिया पहले अगस्त में प्रस्तावित थी, लेकिन इसे स्थगित कर संशोधित कार्यक्रम जारी किया गया। अब 17 और 18 सितंबर को प्रदेशभर में पंचायत चुनाव से जुड़े राजनीतिक और स्थानीय समीकरण काफी हद तक साफ हो जाएंगे।सरपंच, वार्ड पंच, पंचायत समिति और जिला परिषद चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे दावेदारों के लिए आरक्षण लॉटरी बेहद अहम है। सीट की श्रेणी तय होने के बाद ही कई क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों की तस्वीर स्पष्ट होगी।इसके चलते गांवों से लेकर पंचायत समितियों और जिला परिषद स्तर तक 17-18 सितंबर की आरक्षण प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों और संभावित प्रत्याशियों की नजर रहेगी।

गांवों की सरकार का चुनाव शहरी चुनावों से कई मायनों में अलग होता है। यहां राजनीतिक दलों के चिन्ह और बड़े नेताओं की लोकप्रियता से अधिक स्थानीय रिश्ते, जातीय-सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और गांव के विकास से जुड़े मुद्दे प्रभावी होते हैं। एक पंचायत में किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता पूरे चुनाव का रुख बदल सकती है। इसलिए विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तुलना में पंचायत चुनावों की रणनीति कहीं अधिक सूक्ष्म और जमीनी होती है।

राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरे तलाशने की होगी। शहरों में पार्टी संगठन के सहारे चुनावी प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन गांवों में संगठन के साथ व्यक्तिगत नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में निकाय चुनाव के परिणाम दलों को यह संकेत भी देंगे कि किन क्षेत्रों में उनका संगठन मजबूत है और कहां उसे नए सिरे से सक्रिय करने की आवश्यकता है।

पंचायत चुनावों का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण विकास है। सड़क, पेयजल, सिंचाई, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और रोजगार जैसे मुद्दे ग्रामीण मतदाताओं के लिए सीधे जीवन से जुड़े हैं। मानसून की स्थिति और खरीफ फसलों पर पड़ा असर भी ग्रामीण राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। किसान और ग्रामीण मतदाता यह देखेंगे कि स्थानीय सरकार उनके रोजमर्रा के सवालों को कितनी प्राथमिकता देती है।

इसके अलावा महिला प्रतिनिधित्व, युवा भागीदारी और आरक्षण के कारण पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों का सामाजिक आधार भी व्यापक होगा। आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद अनेक गांवों में संभावित उम्मीदवार अभी से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने लगेंगे। राजनीतिक दलों को भी स्थानीय समीकरणों के अनुसार अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी।

इस लिहाज से स्थानीय निकाय चुनाव केवल शहरों की सत्ता का चुनाव नहीं हैं। इनके परिणाम राजस्थान की आगामी ग्रामीण राजनीति के लिए संकेतक साबित होंगे। कौन-सा दल कहां मजबूत हुआ, किस सामाजिक समूह का रुझान किस ओर रहा और स्थानीय नेतृत्व ने कितना प्रभाव छोड़ा—इन सभी सवालों के जवाब पंचायत चुनाव की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

अंततः गांवों की सरकार बनाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल चुनाव जीतने का सवाल नहीं, बल्कि लंबे समय तक जमीनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती है। निकाय चुनाव की धूल बैठते ही राजनीतिक दलों को गांवों की ओर कूच करना होगा। इसीलिए कहा जा सकता है कि स्थानीय निकाय चुनाव के बाद असली मशक्कत राजस्थान की गांवों की सरकारों के लिए शुरू होगी।