अशोक भाटिया
संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ने एक बार फिर उस कड़वी और भयावह हकीकत को हमारे सामने ला खड़ा किया है, जिससे हम लगातार अपनी आँखें मूँदने की कोशिश करते रहे हैं। मुंबई, कोलकाता और ढाका जैसे दक्षिण एशिया के सबसे जीवंत, आर्थिक रूप से समृद्ध और घनी आबादी वाले महानगरों के समुद्र में समा जाने की चेतावनी अब किसी हॉलीवुड विज्ञान-कथा (साइंस-फिक्शन) का हिस्सा नहीं रह गई है, बल्कि यह हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही एक ऐसी आसन्न त्रासदी है जिसकी पटकथा हमने खुद लिखी है। सोशल मीडिया और सनसनीखेज खबरों के इस दौर में भले ही इन शहरों के रातों-रात पानी में डूब जाने की अफवाहें उड़ाई जा रही हों, लेकिन इस अतिशयोक्ति के पीछे छिपा वास्तविक सच किसी महाविनाश से कम नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी के अनुसार, दक्षिण एशिया के इन निचले डेल्टा क्षेत्रों में रहने वाले लगभग डेढ़ करोड़ लोग आने वाले दशकों में हमेशा के लिए बेघर हो सकते हैं। यह केवल कुछ शहरों के भूगोल के बदलने का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता, अर्थव्यवस्था और हमारी संप्रभुता के अस्तित्व पर एक ऐसा प्रहार है, जिसकी भरपाई आने वाली कई सदियाँ भी नहीं कर पाएँगी।
इस संकट की जड़ें केवल समुद्र के बढ़ते जलस्तर में नहीं हैं, बल्कि आधुनिक विकास के उस अंधे मॉडल में हैं जिसने प्रकृति को हमेशा अपनी दासी समझा है। भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई का उदाहरण हमारे सामने है। सात टापुओं को आपस में जोड़कर और समंदर को पाटकर खड़ी की गई यह अट्टालिकाएँ आज अपने ही बोझ से दबी जा रही हैं। कंक्रीट के इस जंगल ने जमीन के भीतर की उन नसों को सुखा दिया है जो पानी को सोखती थीं। भूजल के अंधाधुंध दोहन के कारण मुंबई की जमीन हर साल कुछ मिलीमीटर नीचे धंस रही है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘लैंड सबसिडेंस’ कहा जाता है। एक तरफ ऊपर से बढ़ता समंदर और दूसरी तरफ नीचे धंसती जमीन—मुंबई आज प्रकृति के दोहरे शिकंजे में है। हर साल मानसून में मुंबई की सड़कों पर दिखने वाला समंदर दरअसल प्रकृति का वह उग्र रूप है जो हमें याद दिलाता है कि जिसे हम विकास कह रहे हैं, वह दरअसल विनाश का एक धीमा जहर है।
दूसरी ओर, कोलकाता और ढाका की स्थिति और भी अधिक संवेदनशील और भौगोलिक रूप से चिंताजनक है। ये दोनों ही महानगर दुनिया के सबसे बड़े गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्टा के मुहाने पर बसे हैं। समुद्र तल से नाममात्र की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण, बंगाल की खाड़ी में होने वाली मामूली हलचल भी इन शहरों के अंतःकरण को हिलाकर रख देती है। जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवातों की आवृत्ति और उनकी तीव्रता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अम्फान, यास और रेमल जैसे चक्रवातों ने हाल के वर्षों में जो तबाही मचाई है, वह केवल एक झांकी थी। समुद्र का खारा पानी अब केवल तटीय इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह नदियों के रास्ते इन महानगरों के मीठे पानी के स्रोतों और कृषि योग्य भूमि को नष्ट कर रहा है। ढाका, जो कभी अपनी मलमल और नदियों के लिए जाना जाता था, आज दुनिया के सबसे प्रदूषित और जलवायु रूप से संवेदनशील शहरों में से एक बन चुका है। बांग्लादेश के ग्रामीण इलाकों से हर साल लाखों लोग जलवायु शरणार्थी (क्लाइमेट रिफ्यूजी) बनकर ढाका की झुग्गियों में पनाह ले रहे हैं, जिससे इस शहर का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक समुद्र का जलस्तर अब तक की सबसे तेज गति से बढ़ रहा है। ग्लेशियरों का पिघलना और गर्म होते महासागरों के पानी का फैलाव कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसे हम रातों-रात रोक सकें। इस संकट का सबसे क्रूर पहलू यह है कि जिन देशों और आम नागरिकों ने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में सबसे कम योगदान दिया है, वे ही इस त्रासदी की पहली कतार में खड़े हैं। मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वाला मजदूर, सुंदरवन के द्वीपों पर खेती करने वाला किसान या ढाका की फैक्ट्रियों में काम करने वाला आम नागरिक—ये वे लोग हैं जिनके पास इस आपदा से बचने के लिए कोई एयर-कंडीशनर कमरा या किसी ऊंचे पहाड़ पर बना दूसरा घर नहीं है। जब समंदर का पानी बस्तियों में घुसेगा, तो यह अमीर और गरीब की खाई को पाटते हुए सबको अपनी चपेट में लेगा, लेकिन सबसे पहले और सबसे बुरी तरह वही कुचला जाएगा जो आर्थिक रूप से कमजोर है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट को केवल एक चेतावनी मानकर फाइलों में बंद कर देना सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल होगी। यह समय वैश्विक नेताओं के लिए खोखले वादों और जलवायु सम्मेलनों में लंबी-चौड़ी घोषणाएँ करने का नहीं, बल्कि जमीन पर सख्त और ठोस कार्रवाई करने का है। हमें यह समझना होगा कि पारंपरिक इंजीनियरिंग के तरीके, जैसे कि केवल तटीय दीवारें खड़ी कर देना या ड्रेनेज सिस्टम को थोड़ा साफ कर देना, अब इस महासंकट का समाधान नहीं कर सकते। हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने की कला को दोबारा सीखना होगा। तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव (सदाबहार वन) की रक्षा करना हमारा सबसे पहला रक्षा कवच होना चाहिए। मैंग्रोव के जंगल केवल पेड़ नहीं हैं, बल्कि वे समंदर की उग्र लहरों की गति को थामने वाले प्रकृति के अपने सैनिक हैं। दुर्भाग्य से, शहरीकरण और रिसॉर्ट्स बनाने के नाम पर हमने इन प्राकृतिक दीवारों को खुद ही ढहा दिया है।
इसके साथ ही, शहरी नियोजन (टाउन प्लानिंग) के सिद्धांतों में एक क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि ‘स्पंज सिटी’ (Sponge City) जैसी अवधारणाओं को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए, जहाँ कंक्रीट की जगह ऐसी सतहें बनाई जाती हैं जो बारिश के पानी को सोख सकें और उसे वापस जमीन के भीतर भेज सकें। मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) को पुनर्जीवित करना होगा, जिन्हें भू-माफियाओं ने लालच की वेदी पर चढ़ा दिया है। यह आर्द्रभूमियाँ शहरों के ‘फेफड़े और गुर्दे’ की तरह काम करती हैं, जो न सिर्फ बाढ़ के पानी को रोकती हैं बल्कि पर्यावरण का संतुलन भी बनाए रखती हैं।
इस वैश्विक संकट का एक और अत्यंत संवेदनशील पहलू है, जिसका जिक्र करने से अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच कतराते रहे हैं—और वह है ‘जलवायु शरणार्थियों’ का पुनर्वास। यदि संयुक्त राष्ट्र की भविष्यवाणी सच होती है और डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित होते हैं, तो दक्षिण एशिया में एक अभूतपूर्व मानवीय संकट पैदा हो जाएगा। यह संकट केवल सीमाओं के भीतर का नहीं रहेगा, बल्कि यह दो देशों के बीच के राजनीतिक और सामाजिक संबंधों को भी तनावपूर्ण बना देगा। भारत और बांग्लादेश के बीच पहले से ही प्रवास एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। ऐसे में यदि ढाका या सुंदरवन का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न होता है, तो आबादी का जो पलायन होगा, उसे संभाल पाना किसी भी सरकार के लिए अकेले संभव नहीं होगा। इसलिए, इस मुद्दे पर एक क्षेत्रीय और वैश्विक पुनर्वास नीति का होना अनिवार्य है, जिसमें विकसित देशों को आर्थिक और नैतिक जिम्मेदारी उठानी होगी, क्योंकि वैश्विक पर्यावरण को बिगाड़ने में सबसे बड़ा हाथ उन्हीं का रहा है।
अंततः, मुंबई, कोलकाता और ढाका के पानी में डूबने के समाचार केवल वैज्ञानिक डेटा या डराने वाली सुर्खियाँ नहीं हैं। ये हमारी सोई हुई सामूहिक चेतना को जगाने के लिए प्रकृति का अंतिम अल्टीमेटम हैं। समंदर का बढ़ता जलस्तर दरअसल हमारी आधुनिक जीवनशैली, हमारे बेलगाम लालच और हमारी राजनीतिक उदासीनता का बढ़ता हुआ पैमाना है। यदि हम आज भी नहीं संभले, तो इतिहास हमें एक ऐसी कायर सभ्यता के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी आने वाली पीढ़ियों को डूबने के लिए एक जलती हुई धरती और एक उफनता हुआ समंदर सौंप दिया। यह समय राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर, राष्ट्रीय सीमाओं के बंधनों को तोड़कर, अपनी धरती और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक महा-अभियान शुरू करने का है। समंदर की लहरें किसी की संप्रभुता या पहचान नहीं देखतीं, वे सिर्फ अपने रास्ते में आने वाली हर उस चीज को निगल जाती हैं जिसने प्रकृति के नियमों का अनादर किया हो। फैसला हमारा है कि हम डूबते जहाजों के मूक दर्शक बने रहना चाहते हैं या अपनी आने वाली नस्लों के लिए एक सुरक्षित किनारा तैयार करना चाहते हैं।





