
राजनेताओं और नौकरशाहों का अशोभनीय आचरण
प्रमोद भार्गव
मध्य-प्रदेश में नौकरशाहों और राजनेताओं के बीच निरंतर टकराव सामने आ रहा है। चंबल के अंचल में आने वाले जिले भिंड में भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह और कलेक्टर संजीव श्रीवास्ताव आपस में ऐसे भिड़े कि परस्पर मारपीट की नौबत आ गई। कलेक्टर ने विधायक की ओर अंगुली उठाई तो विधायक ने मुक्का तान दिया। यह नजारा कलेक्टर बंगले के बाहर द्वार पर देखने में आया। बाद में यहीं धारना षुरू हो गया। दरअसल इस झगड़े में मुद्दा तो खाद संकट बनाया गया लेकिन कलेक्टर और विधायक के बीच जो तू-तू मैं-मैं दिखी, उसमें दोनों का ही कदाचरण सामने आया। कलेक्टर श्रीवास्तव ने तल्ख लहजे में कहा, ‘औकात में रहकर बात करो।‘‘ विधायक भड़कते हुए बोले, ‘‘औकात किसे बता रहे हो, तू हमें नहीं जानता।‘‘ कलेक्टर ने प्रतिउत्तर दिया, ‘रेत चोरी नहीं चलने दूंगा।‘ विधायक ने पलटकर कहा, ‘सबसे बड़ा चोर तो तू हैं।‘ विधायक कुशवाह पर 2012 में तत्कालीन एसपी जयदेवन ए को थप्पड़ मारने का आरोप भी लगा था। तब होली पर्व के दौरान षराबबंदी के बावजूद षराब बिकने की शिकायत पर पुलिस द्वारा की गई छापेमारी के चलते विवाद हुआ था। हैरानी की बात है कि इस मामले में घटना के चार दिन बाद भी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं की गई है।
निर्वाचित जनप्रतिनिधि और जिले के प्रशासनिक मुखिया के बीच इस तरह का दुराचरण समाज में बढ़ती अनैतिकता का प्रतीक हैं। लोकतंत्र में ऐसा व्यवहार न तो होना चाहिए और न ही इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। यह तब और निंदनीय है, जब एक-दूसरे पर लगाए आरोपों से साफ हुआ कि असली जड़ अनैतिक महत्वाकांक्षा में निहीत है। मप्र में जन प्रतिनिधि और आला अधिकारियों के बीच ऐसे घटनाक्रम आए दिन देखने में आ रहे हैं। अवचेतन में पैठ बनाए बैठी यह अकड़ तब और उग्र होती है, जब सरकार दंडात्मक कार्यवाही को टालने का काम करती है। ऐसे ही हालातों से निपटने की दृश्टि से कई नेता कलेक्टर का ‘पदनाम‘ बदलने की पैरवी करते रहे हैं। लेकिन सरकार के मुखिया बन जाने के बावजूद कर नहीं पाते। यह सही है कि जिला प्रमुख के ‘कलेक्टर‘ नाम से वह अर्थ और ध्वनि नहीं निकलते हैं, जो उनकी कार्यशैली और कार्य क्षेत्र का हिस्सा हैं। कलेक्टर का सामान्य अर्थ, संग्राहक, संग्रहकर्ता, संकलनकर्ता, एकत्रित करने वाला अथवा कर उगाहने वाला होता है। जबकि हमारे यहां पदनाम का दायित्व जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक दायित्व से जुड़ा है। इसलिए कलेक्टर को डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट अर्थाथ जिला दण्डाधिकारी भी कहा जाता है। कलेक्टर को जिलाधिकारी अथवा जिलाधीश के पदनामों से भी जाना जाता है, किंतु कलेक्टर पदनाम इतना प्रचलित और प्रभावशील हो गया है कि जो भी आईएस बनते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा गौरव का अनुभव कलेक्टर बनने या कलेक्टर कहलाने में ही होता है। बहरहाल केवल पदनाम बदलने भर से कोई क्रांति आने वाली नहीं है, इस बीमार प्रशासनिक तंत्र को दुरुस्त करने के लिए इनकी सेवा-शर्तों को नए सिरे से परिभाशित करने की जरूरत है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि बीते दो दशकों के भीतर षासन-प्रशासन के स्तर पर कार्यशैली की गुणवत्ता में बहुत गिरावट आई है और हर क्षेत्र में प्रशानिक निरंकुशता बढ़ी है। शासन यानी सरकार का काम जन-हितैषी व चतुर्मुखी विकास संबंधी ठोस नीतियां बनाना है। स्वीकृत परियोजना के अनुरूप क्रियान्वयन का दायित्व प्रशासनिक अधिकारियों का होता है, जिनमें कलेक्टर जिला प्रमुख होने के साथ अधिकतम अधिकारों से संपन्न भी होता है। इसलिए 95 प्रतिशत कार्यों का संबंध ऐसे उचित क्रियान्वयन से है, जो पूरी तरह नागरिक सेवा के अधिकारियों के हाथ होता है। सच्चाई तो यह भी है कि विधायिका की बजाय अधिकांश नई नीतियों और नए कानूनों के निर्माण में भी अहम भूमिका इन्हीं अधिकारियों की रहती है। इसलिए ज्यादातर कानून इस तरह से परिभाषित किए जाते हैं कि उनमें अंतिम निर्णय का अधिकार अंततः अधिकारी के ही हाथ में रहे। पंचायती राज, सूचना का अधिकार कानून और उपभोक्ता अदालतों से जनता का मोहभंग हो जाना यही प्रमुख वजह है। जब शिक्षा-तंत्र पर निगरानी की पहल का दायित्व पंचायतों को सौंपने की बात उठी थी, तब शिक्षकों ने बौद्धिक दंभ दिखाते हुए कहा था कि एक निरक्षर सरपंच उन पर निगरानी कैसे कर सकता है ? यह प्रश्न अपनी जगह तार्किक हो सकता है, लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में गौरतलब है कि शिक्षक रोजाना विद्यालय आता है अथवा नहीं ? आता भी है तो वह मटरगश्ती करता है या कुछ पढ़ाता भी है ?
इसकी तस्दीक करने का संबंध निगरानीकर्ता के पढ़े-लिखे होने से कतई नहीं है। आज सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण पढ़ाई से बड़ा सवाल शिक्षक का विद्यालय में उपस्थित नहीं होना है। अब भला शिक्षक की उपस्थिति की तस्दीक करने में निरक्षरता कहां बाधा बनती है ? यहां यह भी गौरतलब है कि एक अनपढ़ व्यक्ति का व्यावहारिक ज्ञान, पढ़े-लिखे से भी कहीं ज्यादा हो सकता है।
कलेक्टर हो या कोई अन्य लोकसेवक उसकी गुणवत्ता का मापदण्ड, उसकी दक्षता, ईमानदारी, कार्यक्षमता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता से होती है। नीतियों व कार्यों पर यदि ठीक से अमल नहीं होता है तो गुणवत्ता ध्वस्त हो जाती है। प्रत्येक राज्य सरकार अनेक श्रेश्ठ नीतियां गरीब, वंचित और किसानों के हित में बनाती है, लेकिन प्रशासनिक अकुशलता और भ्रश्टाचार के चलते परिणाम के स्तर पर अमल दोशपूर्ण रहता है। यही वजह रही कि मध्य-प्रदेश में क्लर्क से लेकर आईएस तक जिन अधिकारियों के यहां लोकायुक्त पुलिस ने छापे डाले हैं, उनके यहां से करोड़ों की चल-अचल संपत्तियां बरामद हुई हैं। रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद ये लोकसेवक धनबल व अपनी पहुंच के जरिए बेदाग बच निकलते हैं। इनका बच निकलना इसलिए भी आसान होता है, क्योंकि बचाव के पक्ष में अनेक कानून और अनुमोदन की कड़ियां हैं। किसी नौकरशाह को गिरफ्त में लेने से पहले इन कड़ियों से पार पाना टेढ़ी खीर होता है। बावजूद कोई भी संवेदनशील सरकार इतना तो कर ही सकती है कि भ्रश्टाचार के मामले में पकड़े गए और तकनीकी आधार के बूते छूटे लोकसेवकों को प्रशासनिक दायित्व से मुक्त रखे।
षायद इसीलिए महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद रखी थी, उसने हमें गुलाम बना दिया है। मेरा यह दृढ़ मत है कि अंग्रेजी शिक्षा जिस तरह से दी गई है, उसने अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों को स्वत्वहीन बना दिया है। भारतीय विद्यार्थियों के दिमाग पर बहुत जोर डाला है और हमें नकलची बना दिया है।‘ दरअसल फिरंगी हुक्मरानों ने अपनी इच्छानुसार शिक्षा पद्धति लागू करके एक साथ दो लक्ष्यों की पूर्ति की थी। एक ओर तो उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की कायमी के लिए प्रशासक गढ़े, दूसरी ओर जनता में एक ऐसा वर्ग तैयार किया, जो षासकों की भाशा अंग्रेजी समझता हो और उनके सांस्कृतिक मूल्यों का भी हिमायती हो। जब यह वर्ग पाश्चात्य मूल्यों का पोशक हो गया तो मैकाले ने अंग्रेजी को बढ़ावा देने और औपनिवेशिक सेवा के पदो ंके लिए नीति पर अमल षुरू कर दिया। इस हेतु अंग्रेजी पढ़ने के लिए छात्रवृत्तियां दीं और मुफ्त में लंदन की सैर भी कराई गईं। नतीजतन पश्चिमी रौब-रुतबे में ढल चुका विद्यार्थी पारंपरिक उद्योग-धंधे, षरीरिक श्रम और अनपढ़ व ग्रामीण समुदाय से कटता चला गया। वर्तमान में विडंबना है कि लोकसेवकों को प्रशिक्षित करते समय, मामले को टालने, नकारने, उलझाने और लंबित करने का पाठ पढ़ाया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश प्रशासनिक तंत्र पहले हालातों को अनियंत्रित होते रहने की छूट देता है और जब हालात काबू से बाहर हो जाते हैं, तब कहीं जाकर उन्हें काबू में लेने की कोशिश करता है। अतिक्रमणों के निर्माण और फिर उन्हें तोड़ने में नौकरशाहों की यही प्रकृति देखने में आती है। चुनांचे, अन्याय हर कहीं न्याय के लिए चुनौती होता है। इसलिए प्रजातंत्र में न्याय को संरक्षित करने का दारोमदार लोकसेवकों पर है। दो लोकसेवकों ने अंगुली और मुक्का दिखाकर फिलहाल लोकतंत्र को सहमा दिया है। इन दोनों का यह आचरण नागरिक सेवा के विपरीत है।ै