होली दहन: बुराई पर अच्छाई की विजय और सामाजिक चेतना का पर्व

Holika Dahan: The triumph of good over evil and a festival of social consciousness

एडवोकेट जयदेव राठी

होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि वह आत्मचिंतन, सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का पर्व भी है। धुलेंडी से एक दिन पूर्व होने वाला होली दहन इसी गहरे सांस्कृतिक और दार्शनिक भाव का प्रतिनिधित्व करता है। यह परंपरा सदियों से समाज को यह याद दिलाती आ रही है कि बुराई चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसका अंत तय है और सत्य अंततः विजयी होता है। आज जब समाज अनेक स्तरों पर असमंजस, तनाव और वैचारिक टकराव से गुजर रहा है, तब होली दहन का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

होली दहन की जड़ें भारतीय पौराणिक चेतना में गहराई तक समाई हुई हैं। यह कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि मानव प्रवृत्तियों और सत्ता के अहंकार का प्रतीकात्मक चित्रण है। अत्याचार और दमन की प्रवृत्ति जब अपने चरम पर पहुंचती है, तब उसका विनाश निश्चित हो जाता है—यही इस परंपरा का मूल भाव है। भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की कथा सत्ता और सत्य के संघर्ष को रेखांकित करती

होली दहन का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सामूहिकता है।

होलिका दहन केवल एक कहानी का नाट्य प्रदर्शन नहीं है। यह पर्व हमारी सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। गांवों में होलिका दहन की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। लोग मिलकर लकड़ियां एकत्र करते हैं, होलिका की प्रतिमा बनाते हैं और उत्साह के साथ पर्व की प्रतीक्षा करते हैं। पूर्णिमा की रात परिवार के सभी सदस्य एकत्र होकर होलिका की परिक्रमा करते हैं, नई फसल की बालियां अग्नि को अर्पित करते हैं और आने वाले वर्ष की समृद्धि की कामना करते हैं।

होलिका की अग्नि में पुरानी वस्तुएं, नकारात्मक विचार और बुरी आदतें जलाने की परंपरा एक गहरे मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। अग्नि शुद्धिकरण का प्रतीक है। जब हम होलिका दहन के समय उसकी परिक्रमा करते हैं, तो मानसिक रूप से हम अपने भीतर की नकारात्मकता को भस्म करने का संकल्प लेते हैं। यही इस पर्व की वास्तविक आध्यात्मिक शक्ति है जो इसे महज एक उत्सव से ऊपर उठाकर एक जीवन-दर्शन बना देती है। होली दहन अपने आप में सामाजिक एकता का प्रतीक है। जाति, वर्ग, आयु और विचारधाराओं के भेद को कुछ समय के लिए पीछे छोड़कर समाज एक साझा संकल्प के साथ खड़ा होता है। आज जब समाज में विभाजन की रेखाएं गहरी होती जा रही हैं, तब यह सामूहिक अनुभव हमें याद दिलाता है कि हमारी सांस्कृतिक शक्ति एकता में निहित है।

परंपरागत रूप से होली दहन के समय लोग अग्नि में नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक दहन करते हैं। यह रस्म बाहरी कम और आंतरिक अधिक है। प्रश्न यह नहीं है कि अग्नि में क्या डाला गया, बल्कि यह है कि मन से क्या त्यागा गया। ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, असहिष्णुता और हिंसा—ये सभी आधुनिक समाज की गंभीर समस्याएं हैं। यदि होली दहन केवल लकड़ियों और प्रतीकों तक सीमित रह जाए और हमारे व्यवहार में कोई परिवर्तन न आए, तो यह परंपरा खोखली बनकर रह जाएगी।

आधुनिक समय में होली दहन का सामाजिक संदर्भ और भी व्यापक हो गया है। आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ते हुए मानसिक तनाव, अकेलेपन और असंतोष से घिरा हुआ है। ऐसे में होली दहन एक अवसर देता है रुकने का, सोचने का और आत्ममंथन करने का। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल उपभोग का नाम नहीं, बल्कि संतुलन और संवेदना का भी नाम है। अग्नि का स्वरूप यहां विनाशकारी नहीं, बल्कि शुद्धिकारी है—जो पुरानी, जड़ हो चुकी प्रवृत्तियों को भस्म कर नई ऊर्जा का मार्ग प्रशस्त करती है।

होली दहन का संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध सामाजिक कुरीतियों से भी है। दहेज, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, नशाखोरी और हिंसा जैसी समस्याएं आज भी समाज में व्याप्त हैं। यदि होली दहन के अवसर पर समाज इन बुराइयों के विरुद्ध सामूहिक संकल्प ले, तो यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है। इतिहास गवाह है कि सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत अक्सर सांस्कृतिक चेतना से ही होती है।

भारत की लोक परंपराओं में होली दहन का विशेष स्थान है। विभिन्न क्षेत्रों में इससे जुड़े लोकगीत, हास्य-व्यंग्य और सामाजिक टिप्पणियां इसे जीवंत बनाती हैं। इन लोक अभिव्यक्तियों में समाज की पीड़ा, उसकी उम्मीदें और उसकी चेतावनियां छिपी होती हैं। यही कारण है कि होली दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का मंच भी बन जाता है। यह संवाद समाज को आईना दिखाने का काम करता है।

होली दहन का सार बाहरी अग्नि में नहीं, बल्कि आंतरिक प्रकाश में है। यह पर्व हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने भीतर किन बुराइयों को ढो रहे हैं और उन्हें छोड़ने का साहस कब करेंगे। जब अग्नि के चारों ओर परिक्रमा की जाती है, तब वह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन की परिक्रमा का प्रतीक बन जाती है—जहां हम अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य पर एक साथ विचार करते हैं।

यदि होली दहन हमें अधिक सहिष्णु, अधिक संवेदनशील और अधिक जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देता है, तभी इसका वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा। अन्यथा यह भीड़, शोर और औपचारिकता में सिमटकर रह जाएगा। आज आवश्यकता है कि हम इस परंपरा को केवल निभाएं नहीं, बल्कि समझें और जिएं। बुराई के दहन और अच्छाई के संरक्षण का यह पर्व तभी सार्थक होगा, जब उसकी लौ हमारे आचरण में भी जलती रहे। यही होली दहन की सच्ची आत्मा है और यही उसकी सबसे बड़ी सामाजिक उपयोगिता।