समकालीन जीवन की नब्ज़ पर उँगली रखती लघुकथाएँ

Short stories that touch the pulse of contemporary life

  • पुस्तक: अपेक्षित मौन और अन्य लघुकथाएँ
  • लेखक: सन्दीप तोमर
  • विधा: लघुकथा
  • प्रकाशन: स्पर्श प्रकाशन
  • प्रकाशन वर्ष: 2026
  • मूल्य: 250/-

समीक्षक: पूजा अग्निहोत्री

‘अपेक्षित मौन और अन्य लघुकथाएँ’ समकालीन हिंदी लघुकथा-साहित्य में एक उल्लेखनीय हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। सन्दीप तोमर का यह संग्रह केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक यथार्थ, विडंबनाओं, मानवीय संबंधों की दरारों और समय की विखंडित चेतना का रचनात्मक दस्तावेज है। लेखक अपने आसपास घट रही साधारण प्रतीत होने वाली घटनाओं में छिपे असाधारण अर्थों को पहचानते हैं और उन्हें लघुकथा की संक्षिप्त संरचना में इस प्रकार गढ़ते हैं कि वे पाठक के भीतर देर तक गूँजती रहती हैं।

संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसकी कथावस्तु की विविधता और सामाजिक सरोकारों की व्यापकता है। ‘संस्कार’ में वृद्ध पिता के प्रति व्यवहार और सामाजिक औपचारिकता के बीच का द्वंद्व अत्यंत मार्मिक ढंग से उभरता है। जब पात्र की आँखों में आए आँसुओं को “धुंधला दिखाई देना” कहकर टाल दिया जाता है, तो वह दृश्य मात्र भावुकता नहीं, बल्कि संवेदनहीन होते समाज का रूपक बन जाता है। ‘सफलता’ में डिग्री और कौशल के बीच का अंतर जिस सूक्ष्म व्यंग्य के साथ उद्घाटित होता है, वह शिक्षा-प्रणाली की खोखली संरचना पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। गुरु और शिष्य के संवाद आत्मालोचन की स्थिति निर्मित करते हैं और पाठक को सोचने पर विवश करते हैं कि वास्तविक सफलता का मानदंड क्या है।

कॉरपोरेट जीवन पर केंद्रित ‘अनुभव’ में एचआर अधिकारी का एक साधारण-सा वाक्य—“डेट्स गुड”—पूरी व्यवस्था की अमानवीयता को उजागर कर देता है। नौकरी समाप्त करने की सूचना जिस सहजता से दी जाती है, वही आधुनिक दफ्तरों की संवेदनशून्यता का प्रमाण बन जाती है। लेखक यहाँ भाषण नहीं देता; केवल दो-तीन संवादों के माध्यम से पूरी कॉरपोरेट संस्कृति का चेहरा सामने रख देता है। इसी प्रकार ‘काबिलियत’ में प्रकाशक और लेखक के बीच वार्तालाप साहित्यिक बाजारवाद की प्रवृत्ति को रेखांकित करता है, जहाँ रचना की गुणवत्ता से अधिक उसकी बिक्री की संभावना महत्त्वपूर्ण हो उठती है। ‘खबर की खबर’ में मीडिया की सनसनीप्रियता को इस तरह चित्रित किया गया है कि घटना गौण और प्रस्तुति प्रधान हो जाती है; छोटी-सी सूचना को ‘ब्रेकिंग’ बनाकर परोसने की मानसिकता पत्रकारिता की नैतिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

वर्गीय असमानता ‘वाजिब कीमत’ में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने आती है। श्रम करने वाले व्यक्ति की मेहनत की कीमत पर मोलभाव करने वाले लोग जब विलासिता पर बिना हिचक खर्च करते हैं, तो कहानी वर्ग-चेतना की विडंबना को उजागर कर देती है। ‘मोची बनाम देशप्रेम’ में खोखली देशभक्ति और वास्तविक श्रम के बीच का विरोध तीखे व्यंग्य के साथ उपस्थित है। मोची का श्रम ठोस और उपयोगी है, किंतु सम्मान का पात्र वह नहीं, बल्कि ऊँची आवाज़ में भाषण देने वाला व्यक्ति बन जाता है। ‘राजा, प्रजा और धनिक’ को राजनीतिक रूपक की तरह पढ़ा जा सकता है, जहाँ धर्म, सत्ता और पूँजी का गठजोड़ लोकतांत्रिक संरचना को विस्थापित करता दिखाई देता है।

संवाद इस संग्रह का अत्यंत सशक्त शिल्प-तत्त्व है। ‘अनुभव’, ‘काबिलियत’, ‘चरित्र’ और ‘खबर की खबर’ जैसी लघुकथाएँ लगभग पूर्णतः संवाद-आधारित हैं। ‘चरित्र’ में प्रेमी का “तुम समझती क्यों नहीं?” कहना केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और भावनात्मक नियंत्रण की प्रवृत्ति को उजागर करता है। संवादों की यही संक्षिप्तता और अर्थगर्भिता पात्रों को जीवंत बनाती है। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी शब्दों—जैसे HR, जॉब, ट्रांजेक्शन—का प्रयोग समय-सत्य को विश्वसनीय बनाता है और कथ्य को समकालीन संदर्भ प्रदान करता है।

भाषा-शैली की दृष्टि से सन्दीप तोमर सरल, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय भाषा का प्रयोग करते हैं। वे अलंकारिक आडंबर या कृत्रिम बौद्धिकता में नहीं उलझते। बोलचाल की हिंदी, मुहावरेदार अभिव्यक्ति और व्यंग्य की अंतर्धारा मिलकर एक संतुलित शैली रचती है। ‘वाजिब कीमत’ में बिना तीखे शब्दों के वर्गीय विडंबना उद्घाटित हो जाती है, तो ‘मोची बनाम देशप्रेम’ में आक्रोश है, पर वह नारेबाज़ी में नहीं बदलता। मार्मिक प्रसंगों में भाषा संयमित रहती है और व्यंग्यात्मक प्रसंगों में तीक्ष्ण, किंतु संतुलित।

कथा-विन्यास की दृष्टि से अधिकांश लघुकथाएँ संक्षिप्तता, तीक्ष्णता और मारक अंत की कसौटी पर खरी उतरती हैं। लेखक सामान्यतः स्थिति-निर्माण से आरंभ कर टकराव या विडंबना की ओर बढ़ता है और अंत में ऐसा बिंदु रचता है जो पाठक को भीतर तक छू जाए। ‘चोर’ में नायक की आशंका अंततः आत्मदर्शन में बदल जाती है और पाठक समझता है कि असली चोरी बाहर नहीं, भीतर घटित हो रही थी। ‘बटवारा’ में पशुओं के माध्यम से मनुष्यों की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति का रूपक रचा गया है, जो अंत में तीखा व्यंग्य छोड़ जाता है। कुछ रचनाएँ आकार में थोड़ी विस्तृत होकर कहानी की सीमा को छूती प्रतीत होती हैं, पर उनका कथ्य उन्हें संतुलित कर देता है।

शीर्षक ‘अपेक्षित मौन’ पूरे संग्रह की वैचारिक पृष्ठभूमि को अर्थ देता है। यह मौन केवल चुप्पी नहीं, बल्कि वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अन्याय देखता है, विडंबना समझता है, पर बोलने और न बोलने के बीच अटका रहता है। कई कथाओं में पात्रों का मौन विवशता भी है, प्रतिरोध भी और आत्ममंथन की भूमि भी। यही मौन पाठक के भीतर प्रश्नों की प्रतिध्वनि पैदा करता है।

निस्संदेह कहीं-कहीं कथ्य संकेत की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष हो जाता है, पर ये सीमाएँ संग्रह की समग्र प्रभावशीलता को कम नहीं करतीं। समग्रतः ‘अपेक्षित मौन और अन्य लघुकथाएँ’ समकालीन हिंदी लघुकथा-साहित्य में एक सार्थक और विचारोत्तेजक योगदान है। सन्दीप तोमर ने अपने समय की विसंगतियों को ईमानदारी से दर्ज करते हुए मानवीय संवेदना की लौ को बचाए रखने का प्रयास किया है। ये लघुकथाएँ पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर सोचने के लिए विवश करती हैं—और शायद यही वह ‘अपेक्षित मौन’ है, जहाँ से नई चेतना का आरंभ होता है।