राजेश जैन
दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को बदल दिया है। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही। गत डेढ़ दशक में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में टैबलेट, लैपटॉप, स्मार्ट क्लासरूम और ऑनलाइन कंटेंट को आधुनिक शिक्षा का पर्याय मान लिया गया। यह माना गया कि अगर बच्चों को बचपन से ही डिजिटल माध्यमों से पढ़ाया जाएगा तो वे भविष्य की टेक्नोलॉजी आधारित दुनिया के लिए बेहतर तैयार होंगे।
लेकिन अब एक दिलचस्प मोड़ सामने आ रहा है। जिस डिजिटल शिक्षा मॉडल को दुनिया भविष्य मान रही थी, वही मॉडल अब कई देशों में पुनर्मूल्यांकन के दौर से गुजर रहा है। दुनिया की सबसे अधिक डिजिटल शिक्षा प्रणालियों में गिने जाने वाले स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश फिर से किताब, कागज और पेन की ओर लौट रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन और टैबलेट के उपयोग को सीमित या प्रतिबंधित किया जा रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सामने आए शोध, अनुभव और सीखने के परिणामों ने शिक्षा नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर किया है।
डिजिटल शिक्षा का स्वर्ण युग
करीब 15 साल पहले दुनिया के कई विकसित देशों ने शिक्षा के डिजिटल भविष्य की परिकल्पना की। इस सोच के पीछे कई तर्क थे। पहला, तकनीक से पढ़ाई को अधिक रोचक और इंटरैक्टिव बनाया जा सकता है। दूसरा, इंटरनेट के माध्यम से बच्चों को वैश्विक ज्ञान तक तुरंत पहुंच मिल सकती है। तीसरा, डिजिटल उपकरणों के जरिए शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत यानी पर्सनलाइज लर्निंग बनाया जा सकता है।
स्वीडन उन देशों में था जिसने सबसे पहले स्कूलों में डिजिटल माध्यमों को बड़े पैमाने पर अपनाया। 2009 के आसपास वहां के स्कूलों में टैबलेट और कंप्यूटर को पाठ्यपुस्तकों का विकल्प बनाने की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे कई स्कूलों में किताबों की जगह डिजिटल उपकरणों ने ले ली। स्मार्ट बोर्ड, ऑनलाइन सामग्री और डिजिटल असाइनमेंट को आधुनिक शिक्षा का प्रतीक माना जाने लगा।
फिनलैंड, जो अपनी शिक्षा प्रणाली के लिए दुनिया में सबसे अधिक प्रशंसित देशों में से एक है, वहां भी स्कूलों में डिजिटल उपकरणों को बड़े उत्साह के साथ अपनाया गया। कई जगह छात्रों को मुफ्त लैपटॉप दिए गए और पढ़ाई का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया गया। उस समय यह मॉडल इतना आकर्षक लगा कि दुनिया के कई देशों ने इसे अपनाने की कोशिश की। भारत में भी डिजिटल क्लासरूम और स्मार्ट एजुकेशन जैसे शब्द शिक्षा सुधार के प्रमुख नारे बन गए।
जब डिजिटल मॉडल पर उठने लगे सवाल
लगभग एक दशक तक डिजिटल शिक्षा के प्रयोग के बाद कुछ समस्याएं धीरे-धीरे सामने आने लगीं। शिक्षकों, अभिभावकों और शोधकर्ताओं ने पाया कि तकनीक ने पढ़ाई को आसान तो बनाया है, लेकिन कई बुनियादी कौशल कमजोर भी कर दिए हैं।
स्वीडन में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि स्क्रीन पर पढ़ने वाले छात्रों की एकाग्रता और गहराई से समझने की क्षमता कम हो रही है। चौथी कक्षा के छात्रों की पढ़ने की क्षमता का आकलन करने वाले अंतरराष्ट्रीय अध्ययन प्रोग्रेस इन इंटरनेशनल रीडिंग लिटरेसी स्टडी में 2016 और 2021 के बीच स्वीडन के बच्चों के पढ़ने के स्कोर में गिरावट दर्ज की गई।
शिक्षाविदों ने देखा कि जब बच्चे टैबलेट या लैपटॉप पर पढ़ते हैं तो उनका ध्यान जल्दी भटकता है। एक क्लिक में गेम, सोशल मीडिया या अन्य वेबसाइटों तक पहुंच उन्हें पढ़ाई से दूर कर देती है। डिजिटल उपकरण पढ़ाई के साथ-साथ मनोरंजन का भी माध्यम हैं, इसलिए उनमें विचलन की संभावना अधिक होती है।
फिनलैंड के शिक्षकों ने भी यही अनुभव साझा किया। कई शिक्षकों ने बताया कि डिजिटल उपकरणों के कारण छात्रों का ध्यान बार-बार भटक जाता है। बच्चे असाइनमेंट जल्दी खत्म कर लेते हैं ताकि वे गेम खेल सकें या सोशल मीडिया पर जा सकें।
स्क्रीन का मन और मस्तिष्क पर प्रभाव
डिजिटल शिक्षा पर सवाल उठने के पीछे सबसे बड़ा कारण बच्चों के मस्तिष्क और व्यवहार पर स्क्रीन के प्रभाव को लेकर बढ़ती चिंता है।
नॉर्वे और अमेरिका के कई शोध बताते हैं कि जब बच्चे हाथ से लिखते हैं तो उनके मस्तिष्क के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं। अक्षर बनाने की प्रक्रिया, उंगलियों का दबाव और लिखावट की संरचना दिमाग में मजबूत स्मृति चिन्ह (मेमोरी ट्रेस) बनाते हैं।
इसके विपरीत, कीबोर्ड पर टाइपिंग अपेक्षाकृत एक यांत्रिक प्रक्रिया है। इसमें मस्तिष्क जानकारी को उतनी गहराई से प्रोसेस नहीं करता। यही कारण है कि हाथ से नोट्स लिखने वाले छात्र विषयों को अधिक गहराई से समझते हैं।
इसके अलावा लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर तनाव, नींद की समस्या और मानसिक बेचैनी भी बढ़ने की आशंका रहती है। फिनलैंड के कुछ अध्ययन बताते हैं कि किशोर औसतन प्रतिदिन लगभग छह घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंताजनक है।
स्क्रीन एडिक्शन की समस्या
डिजिटल शिक्षा का एक अनपेक्षित परिणाम स्क्रीन एडिक्शन के रूप में सामने आया है। जब बच्चे बहुत कम उम्र से ही टैबलेट और स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने लगते हैं तो वे डिजिटल उपकरणों पर अधिक निर्भर हो जाते हैं।
कई शिक्षकों का कहना है कि डिजिटल उपकरणों के कारण बच्चे निष्क्रिय उपभोक्ता बनते जा रहे हैं। वे जानकारी को तेजी से स्क्रॉल करते हैं, लेकिन उसे गहराई से समझने की क्षमता कम हो रही है। किताब पढ़ना एक धीमी और ध्यान केंद्रित करने वाली प्रक्रिया है, जबकि स्क्रीन पर पढ़ना अक्सर सतही अनुभव बन जाता है।
यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, नीदरलैंड्स और अमेरिका के कई राज्यों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन के उपयोग को सीमित किया जा रहा है। फ्रांस ने तो स्कूलों में डिजिटल डिटॉक्स की नीति अपनाई है, जिसके तहत छोटे बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखने पर जोर दिया जा रहा है।
स्वीडन की नीति में बड़ा नीति बदलाव
इन अनुभवों के आधार पर स्वीडन ने अपनी शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने स्कूलों में फिर से मुद्रित पाठ्यपुस्तकों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। इसके लिए सरकार ने करोड़ों यूरो का निवेश किया है ताकि हर छात्र तक किताबें पहुंचाई जा सकें। स्वीडन की शिक्षा मंत्री लोटा एडहोम का स्पष्ट मानना है कि छात्रों के लिए फिजिकल बुक्स बहुत महत्वपूर्ण हैं। सरकार छह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए डिजिटल टूल्स के उपयोग को समाप्त करने की योजना पर भी विचार कर रही है। अब स्वीडन के कई स्कूलों में फिर से शांत पठन समय, हस्तलेखन अभ्यास और पारंपरिक बोर्ड आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तकनीक का विरोध नहीं, संतुलन की खोज
यह समझना जरूरी है कि यह बदलाव तकनीक के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं है। अधिकांश शिक्षाविद यह मानते हैं कि तकनीक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। असल बहस तकनीक के उपयोग की सीमा और संतुलन को लेकर है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल उपकरणों का उपयोग तभी लाभकारी होता है जब वे शिक्षण को पूरक बनाएं, उसका स्थान न लें। यूनेस्को की एक रिपोर्ट भी यही चेतावनी देती है कि शिक्षा में तकनीक का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि वह शिक्षक-केंद्रित शिक्षा का विकल्प न बन जाए। तकनीक एक साधन है, लक्ष्य नहीं।
हाइब्रिड मॉडल: शिक्षा का नया रास्ता
आज कई विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि शिक्षा का भविष्य न तो पूरी तरह डिजिटल है और न ही पूरी तरह पारंपरिक। दोनों का संतुलित मिश्रण ही सबसे प्रभावी मॉडल हो सकता है। उदाहरण के लिए, जटिल वैज्ञानिक प्रयोगों, डेटा विश्लेषण और कोडिंग सीखने में डिजिटल उपकरण बेहद उपयोगी हैं। वहीं साहित्य, इतिहास या भाषा जैसे विषयों में किताबों के माध्यम से पढ़ना अधिक प्रभावी हो सकता है। हाथ से लिखने की आदत बच्चों की सोचने और समझने की क्षमता को मजबूत करती है। वहीं डिजिटल माध्यमों से उन्हें वैश्विक ज्ञान और नई तकनीकों तक पहुंच मिलती है। इसलिए कई देश अब “हाइब्रिड लर्निंग मॉडल” की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें किताब और तकनीक दोनों का संतुलित उपयोग हो।
भारत के लिए सबक
भारत में डिजिटल शिक्षा तेजी से विस्तार कर रही है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, एड-टेक कंपनियां और स्मार्ट क्लासरूम शिक्षा के नए प्रतीक बन चुके हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा ने लाखों छात्रों के लिए पढ़ाई का एकमात्र माध्यम भी प्रदान किया। लेकिन विकसित देशों के अनुभव भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी हैं। अगर डिजिटल माध्यमों को बिना सोचे-समझे अपनाया गया तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां पहले से ही बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है, वहां स्कूलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल वह स्थान होना चाहिए जहां बच्चे किताबों से जुड़ें, लिखने-पढ़ने की बुनियादी आदतें विकसित करें और गहराई से सोचने की क्षमता विकसित करें।
शिक्षा का मूल उद्देश्य
दरअसल, शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करना है। किताब पढ़ना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यह हमें धीमी गति से सोचने और गहराई से समझने के लिए प्रेरित करता है। डिजिटल माध्यम हमें तेज गति से जानकारी तो दे सकते हैं, लेकिन गहरी समझ अक्सर किताबों और शिक्षक के संवाद से ही विकसित होती है।
डिजिटल युग में किताबों की वापसी किसी विफलता की कहानी नहीं है, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक विकास है। पिछले दशक में दुनिया ने शिक्षा में तकनीक का व्यापक प्रयोग किया और उससे जुड़े अनुभव भी प्राप्त किए। अब वही अनुभव नीति निर्माताओं को संतुलित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
भविष्य की कक्षा शायद ऐसी होगी जहां स्मार्ट बोर्ड भी होगा और ब्लैकबोर्ड भी; टैबलेट भी होगा और किताब भी; आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी होगा और शिक्षक का मार्गदर्शन भी। असल सवाल यह नहीं है कि शिक्षा डिजिटल होगी या पारंपरिक। असली सवाल यह है कि हम दोनों के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाएं जिससे बच्चों का दिमाग भी विकसित हो और वे भविष्य की दुनिया के लिए भी तैयार हो सकें…और शायद यही वह संतुलन है, जिसकी तलाश में दुनिया फिर से किताबों की ओर लौट रही है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। )





