रेलवे का दोहरा मापदंड: राजस्व की रीढ़ तोड़ने पर आमादा प्रशासन, अवैध वेंडिंग के नाम पर वैध संचालकों का उत्पीड़न

Railways' double standards: Administration intent on breaking the revenue backbone, harassing legitimate operators in the name of illegal vending

पंकज शर्मा

हाथरस: भारतीय रेलवे को माल ढुलाई के बाद अगर सबसे ज्यादा राजस्व किसी क्षेत्र से मिलता है, तो वह है स्टेशनों पर स्थित कैंटीन और पार्किंग। विडंबना यह है कि जिनसे रेलवे की तिजोरी भरती है, आज वही प्रशासन की तानाशाही और उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। हाथरस जंक्शन पर हाल ही में हुई कार्रवाई ने रेलवे के उस दोहरे चेहरे को उजागर कर दिया है, जहाँ मानक पूरे होने के बावजूद केवल ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए वैध संचालकों को निशाना बनाया जा रहा है।

नया आई-कार्ड न होना क्या ‘अवैध’ की श्रेणी में आता है?
हाथरस जंक्शन पर हुई ताज़ा कार्रवाई केवल खानापूर्ति प्रतीत होती है। यहाँ काम करने वाले वेंडरों के पास सभी मानक और दस्तावेज पूरे थे, लेकिन केवल ‘नया आई-कार्ड’ उपलब्ध न होने की छोटी सी तकनीकी कमी को आधार बनाकर उन्हें ‘अवैध’ घोषित कर दिया गया और भारी-भरकम चालान काट दिए गए। सवाल यह उठता है कि क्या एक विभागीय प्रक्रिया में देरी किसी वैध कामगार को अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर देती है?

गरीब वेंडर और संचालक पर दोहरी मार
रेलवे मशीनरी द्वारा किए गए इन चालानों का आर्थिक बोझ सीधे तौर पर कैंटीन संचालकों पर पड़ता है। एक गरीब वेंडर इस भारी जुर्माने को भरने में सक्षम नहीं होता, जिसके चलते अंततः संचालक को ही यह हर्जाना भुगतना पड़ता है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ उन संचालकों के साथ हो रहा है जो रेलवे को नियमित राजस्व देते हैं, जबकि असल ‘अवैध वेंडर’ प्रशासन की नाक के नीचे बेखौफ घूम रहे हैं।

रात के अंधेरे में ‘लूट’, दिन के उजाले में ‘दिखावा’
रेलवे की चेकिंग का सबसे अजीब पहलू इसकी टाइमिंग है। जिम्मेदार अधिकारियों की टीमें केवल दिन के उजाले में सक्रिय दिखती हैं। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक, जब यात्री सबसे ज्यादा असहाय होता है, तब ट्रेनों और प्लेटफॉर्मों पर अवैध वेंडरों का राज होता है।

  • रात के समय रेल का ‘चोला’ ओढ़कर यात्रियों से पानी और खाने के नाम पर खुलेआम लूट की जाती है।
  • उस समय न तो कोई चेकिंग होती है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी की नींद टूटती है।
  • आखिर इन अवैध वेंडरों को किसका संरक्षण प्राप्त है कि इनके खिलाफ कभी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होती?

सुविधा शून्य, मानक अनिवार्य
रेलवे प्रशासन पार्किंग और कैंटीन संचालकों से राजस्व तो पूरा वसूलता है, लेकिन उन्हें मिलने वाली सुविधाएं न के बराबर हैं। संचालकों की कमाई चाहे राजस्व के मुकाबले कम ही क्यों न हो, प्रशासन को केवल अपने मानकों की चिंता रहती है। कभी ‘रेलवे प्रोडक्ट’ के नाम पर तो कभी छोटे तकनीकी कारणों से वैध वेंडरों का चालान काटकर केवल कागजी टारगेट पूरे किए जा रहे हैं।

हाथरस जंक्शन की घटना यह साफ दर्शाती है कि रेलवे प्रशासन असली गुनहगारों और अवैध सिंडिकेट पर लगाम कसने के बजाय उन लोगों का गला घोंट रहा है जो नियम-कायदों के भीतर रहकर काम कर रहे हैं। यदि यही रवैया रहा, तो स्टेशनों पर खान-पान की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी और यात्री केवल अवैध वेंडरों के भरोसे रह जाएंगे।