कैसे मिले देश को सच्चे आईएएस-आईपीएस अफसर

How did the country get true IAS-IPS officers?

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अंतिम परिणाम बीती 6 मार्च 2026 को घोषित हुए हैं। सफल अभ्यर्थी अब जल्द ही आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में शामिल होंगे। इनके सामने जगमोहन, के. सुब्रमण्यम (विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पिता), ए.के. दामोदरन, टी.एन. शेषन, जे.एन. दीक्षित, वेद मारवाह, किरण बेदी जैसे अनेक अफसरों के उदाहरण मौजूद हैं, जिन्होंने अपने को अपने काम और ईमानदारी से साबित किया। क्या देश को आने वाले समय में ईमानदार और कर्तव्य निष्ठ अफसर मिलेंगे?

विवेक शुक्ला, पूर्व सलाहकार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र

विवेक शुक्ल

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अंतिम परिणाम बीती 6 मार्च 2026 को घोषित हुए हैं। सफल अभ्यर्थी अब जल्द ही आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में शामिल होंगे और देश की प्रगति, कानून-व्यवस्था तथा विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योगदान देंगे। यह क्षण न केवल व्यक्तिगत सफलता का है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नई शुरुआत का भी है। इनके सामने जगमोहन, के. सुब्रमण्यम (विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पिता), ए.के. दामोदरन, टी.एन. शेषन, जे.एन. दीक्षित, वेद मारवाह, किरण बेदी जैसे अनेक अफसरों के उदाहरण मौजूद हैं, जिन्होंने अपने को अपने काम और ईमानदारी से साबित किया। ये नाम आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं।

नए सफल अभ्यर्थियों को बधाइयां मिल रही हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब वे ट्रेनिंग पूरी कर जिलों, विभागों या फील्ड पोस्टिंग में तैनात होते हैं। ब्रिटिश काल में आईसीएस अधिकारियों को ब्रिटिश शासन को मजबूत करने के लिए तैयार किया जाता था। इसलिए अधिकांश पदों पर गोरे अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाता था। वे जिले की हर छोटी-बड़ी जानकारी रखते थे—कृषि भूमि के प्रकार, उपजाऊपन, सिंचाई व्यवस्था, गांवों की आबादी, सामाजिक-आर्थिक संरचना, नदियां, वर्षा का औसत आदि। आज कितने अधिकारी अपने जिले या शहर के मोहल्लों तक की सही जानकारी रखते हैं?

ट्रांसफर और उत्पीड़न

एक महत्वपूर्ण सत्य यह है—यदि हम अधिकारियों से बेखौफ होकर काम करने की अपेक्षा करते हैं, तो उन्हें सुरक्षित माहौल और संरक्षण देना भी हमारा कर्तव्य है। ईमानदार अधिकारी अक्सर बड़े अवरोधों का सामना करते हैं। उन्हें प्रमोशन से वंचित किया जाता है, बार-बार ट्रांसफर किए जाते हैं। हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने अपनी ईमानदारी की भारी कीमत चुकाई। 34 वर्ष की सेवा में उन्हें 57 बार ट्रांसफर किया गया—यह संख्या भारतीय नौकरशाही में सबसे अधिक में से एक है। ऐसे कई अधिकारी हैं जिन्हें कड़वी सच्चाई बोलने के लिए समाज और सिस्टम दोनों से सजा मिलती है। ठीक कहा गया है—कड़वी दवा और कड़क ईमानदार अधिकारी कम लोगों को पसंद आते हैं। ज्यादातर लोग ऐसे ‘बिकने वाले’ बाबुओं को तरजीह देते हैं जो उनके इशारे पर काम करें।

चुनाव सुधारों का योद्धा

ईमानदार अफसरों की बात होगी तो टी.एन. शेषन की याद कैसे नहीं आएगी? यह मानना होगा कि यदि टी.एन. शेषन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त न बनते, तो देश में चुनावों के नाम पर धोखाधड़ी और धांधली का सिलसिला जारी रहता। 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने चुनाव सुधारों को सख्ती से लागू करने का अभियान चलाया। शेषन ने गुंडा तत्वों, धनबल और बाहुबल पर ऐसी चाबुक चलाई कि धन-बल से सियासत करने वाले जमीन पर उतर आए। उन्होंने अपने साथियों में यह विश्वास जगाया कि चुनाव प्रक्रिया को पूरी ईमानदारी से अंजाम देना चाहिए। उनसे पहले कुछ चुनाव आयुक्तों पर आरोप लगते थे कि वे सरकार के इशारों पर चुनाव करवाते हैं। शेषन ने साबित किया कि सिस्टम में रहते हुए भी बहुत कुछ सकारात्मक किया जा सकता है। वे सिर्फ दफ्तर में बैठकर काम करने वाले अफसर नहीं थे—वे चुनाव सुधारों से लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते थे। उन्होंने कठिन राह चुनी और विश्व भर में नाम कमाया। 1994 से 1996 के बीच उन्होंने देश भर में सैकड़ों जनसभाओं को संबोधित कर देश को जगाया।

शहीद हुए सत्यनिष्ठ अफसर

क्या हम सत्येंद्र दुबे और शनमुगम मंजूनाथ की कहानियां भूल गए? सत्येंद्र दुबे ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सीलबंद पत्र लिखा। उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। लेकिन इस पत्र के कारण ही 27 नवंबर 2003 को उनकी हत्या कर दी गई।

इसी तरह, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के अधिकारी शनमुगम मंजूनाथ ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में एक पेट्रोल पंप पर मिलावटी ईंधन बेचने की गड़बड़ी पकड़ी। 13 सितंबर 2005 को उन्होंने पंप सील किया। 19 नवंबर 2005 को दोबारा निरीक्षण के दौरान पंप मालिक के बेटे और उसके साथियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है—अक्सर अपनी जान गंवानी पड़ती है।

मेटकाफ हाउस से सरदार पटेल का संदेश आज भी प्रासंगिक

दिल्ली के सिविल लाइंस में स्थित मेटकाफ हाउस भारत की शीर्ष नौकरशाही का प्रतीक है। यहीं 21 अप्रैल 1947 को सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत के पहले बैच के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को संबोधित किया था। उन्होंने कहा था कि अधिकारी जनता के हित में काम करें और किसी भी तरह की कोताही न बरतें। इसी दिन को लोक सेवक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1947 से पहले यहीं आईसीएस परीक्षाएं होती थीं और 1958 तक ट्रेनिंग भी। बाद में ट्रेनिंग मसूरी में शुरू हुई।

क्या आज सभी अधिकारी सरदार पटेल के बताए मार्ग पर चल रहे हैं? दुर्भाग्य से कई अधिकारी जिलों में तैनात होने पर जनता से दूर हो जाते हैं। वे महलनुमा बंगलों में रहते हैं और आम जनता से उनका कोई सरोकार नहीं रहता।

सरकार को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो जो अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करते। भ्रष्टाचार सिद्ध होने पर कठोर दंड दिया जाए। कई अधिकारी जीवन भर ‘मलाईदार’ पोस्टिंग के चक्कर में नेताओं-मंत्रियों के आगे सिर झुकाते हैं। यह सब बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। तभी सच्चे लोक सेवक अपने कर्तव्य निभा पाएंगे, ईमानदार अफसर सुरक्षित महसूस करेंगे और देश सही दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगा।

नए अफसरों से अपेक्षा है कि वे पटेल के सपने को साकार करें—न कि सिस्टम की कमजोरियों का शिकार बनें। देश को ऐसे अफसर चाहिए जो निडर हों, निष्पक्ष हों और जनता के सच्चे सेवक बनें।