आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के कारण तेल की कीमतों में उछाल आया , उपभोक्ताओं में घबराहट

Oil prices surge as supply chain pressures spark panic among consumers

अशोक भाटिया

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। ईरान से जुड़े युद्ध के बीच भले ही सरकार ने तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही है, लेकिन देश के कई हिस्सों में एलपीजी की कमी से लोगों की परेशानी बढ़ रही है। हॉस्पिटैलिटी बॉडी AHAR (Indian Hotel and Restaurant Association) के मुताबिक आर्थिक राजधानी मुंबई में एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति घटने के कारण करीब 20 प्रतिशत रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं और यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है ।संगठन का कहना है कि यदि यही स्थिति जारी रहती है तो अगले दो-तीन दिनों में लगभग 50 प्रतिशत तक खाने-पीने की दुकानें बंद हो सकती हैं। रेस्टोरेंट मालिकों का कहना है कि पिछले दो दिनों से कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर प्राप्त करने में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

इसी तरह की समस्या बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी सामने आ रही है। संगठन का कहना है कि यदि गैस की आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं होती है तो यहां भी स्थिति गंभीर हो सकती है। बेंगलुरु में होटल मालिकों ने संकेत दिए हैं कि कॉमर्शियल एलपीजी की सप्लाई बाधित होने पर उन्हें अपने संचालन अस्थायी रूप से बंद करने पड़ सकते हैं, क्योंकि उनका काम पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर है।

चंडीगढ़ में भी एलपीजी सप्लाई को लेकर हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। Indane गैस एजेंसी के गोदाम में बड़ी संख्या में कमर्शियल गैस सिलेंडर जमा पड़े हैं। कर्मचारियों के मुताबिक पिछले चार दिनों से कमर्शियल सिलेंडर की नियमित सप्लाई नहीं मिल रही है, जिसकी वजह से जो सीमित सिलेंडर आ रहे हैं, वे गोदाम में ही इकट्ठा हो रहे हैं।

गोदाम में काम करने वाले कर्मचारी सोनू के अनुसार होटल और रेस्तरां संचालक लगातार सिलेंडर के बारे में पूछताछ कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल सिलेंडर उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा घरेलू गैस की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है और कर्मचारियों का कहना है कि घरेलू एलपीजी की सप्लाई लगभग आधी रह गई है। इस स्थिति के कारण शहर में होटल, रेस्तरां और खाने-पीने के कारोबार से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि उनका संचालन पूरी तरह गैस सिलेंडर की उपलब्धता पर निर्भर करता है।

भोपाल में भी ईरान से जुड़े युद्ध के बीच गैस की किल्लत का असर साफ दिखाई देने लगा है। यहां कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई रुकने और घरेलू सिलेंडर की बुकिंग के बीच 25 दिन का अंतर अनिवार्य किए जाने से आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है। हालात ऐसे हैं कि गैस एजेंसियों के गोदामों के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगने लगी हैं। कई लोग सिलेंडर की उपलब्धता को लेकर चिंतित हैं।

आम उपभोक्ताओं का कहना है कि सरकार भले ही स्थिति सामान्य होने की बात कर रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर सिलेंडर आसानी से नहीं मिल रहे हैं और कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई अचानक बंद कर दी गई है। लोगों का यह भी आरोप है कि मौजूदा स्थिति का फायदा उठाते हुए कुछ गैस एजेंसियां सिलेंडर की कमी का हवाला देकर उपभोक्ताओं को इंतजार करने के लिए मजबूर कर रही हैं। इससे शहर में गैस सप्लाई को लेकर असमंजस और चिंता का माहौल बन गया है।

दूसरी ओर केंद्र सरकार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और तेल-गैस की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा रही है। सरकार ने तेल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं ताकि आपूर्ति में किसी तरह की कमी न आए। फिलहाल सरकार की प्राथमिकता घरेलू एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखना है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस कदम का उद्देश्य आवश्यक सेवाओं जैसे- रेस्टोरेंट, अस्पताल और फूड सप्लाई चेन को बाधित होने से बचाना है। इसी बीच डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिए हैं कि ईरान से जुड़ा युद्ध जल्द खत्म हो सकता है। साथ ही G7 देशों ने भी रणनीतिक तेल भंडार के इस्तेमाल का फैसला किया है। इन घोषणाओं के बाद वैश्विक बाजार में Crude Oil की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखने लगा है, जिससे कई देश ईंधन की कमी और बढ़ती कीमतों को लेकर चिंतित हैं। संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति में लगातार बाधा आ रही है, ऐसे में कई क्षेत्रों की सरकारें ईंधन की खपत को नियंत्रित करने और सीमित आपूर्ति को संभालने के लिए आपातकालीन कदम उठा रही हैं।

विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य के पास व्यवधान उत्पन्न होने के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है। वैश्विक कच्चे तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाले इस संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। यहां किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर तुरंत पड़ता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे व्यापक ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ गई है।

विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और एलएनजी के कुल परिवहन का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। मौजूदा अस्थिरता के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हो रहे हैं और व्यापारी सतर्क हो रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120-140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

अनिश्चितता ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता पैदा कर दी है। कई देशों के शेयर बाजार ऊर्जा की कीमतों में अचानक हुई वृद्धि और आपूर्ति में व्यवधान की चिंताओं पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।इस संकट का असर दुनिया के कई हिस्सों में महसूस किया जा रहा है। पाकिस्तान, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, पोलैंड, वियतनाम, बांग्लादेश, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों को ईंधन आपूर्ति पर बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है।इन देशों की सरकारें संकट से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपना रही हैं। कुछ ने ईंधन की राशनिंग शुरू की है, जबकि अन्य नागरिकों से ईंधन की खपत कम करने का आग्रह कर रही हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में पाकिस्तान भी शामिल है। हाल के हफ्तों में पेट्रोल काफी महंगा हो गया है, जिससे वहां ईंधन की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है। ईंधन संरक्षण के लिए, अधिकारियों ने स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है और सरकारी कार्यालयों के लिए कार्य सप्ताह को घटाकर चार दिन कर दिया है। दूरस्थ कार्य को भी प्रोत्साहित किया गया है।बांग्लादेश में, घबराहट में खरीदारी ने सरकार को सख्त ईंधन राशनिंग शुरू करने के लिए मजबूर किया है। मोटरसाइकिलों को प्रति दिन केवल दो लीटर ईंधन की अनुमति है, जबकि कारों का सीमित दैनिक कोटा है। जमाखोरी रोकने के लिए अधिकारी पेट्रोल पंपों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।

यूरोप में, ईंधन की बढ़ती कीमतें घरेलू बजट पर दबाव डाल रही हैं। फ्रांस और पोलैंड में, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें बताई गई हैं क्योंकि कीमतें बढ़ने से पहले ड्राइवर अपने टैंक भरने के लिए दौड़ पड़ते हैं।जर्मनी को भी बढ़ती ऊर्जा लागत का सामना करना पड़ रहा है। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने महंगे ईंधन के आर्थिक प्रभाव के बारे में सार्वजनिक चिंताओं को स्वीकार किया है। कई ड्राइवर खर्च कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन की ओर रुख कर रहे हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में ईंधन की कीमतों में भी वृद्धि हुई है। फ्लोरिडा और लुइसियाना जैसे राज्यों में, पेट्रोल की कीमतों में कई सेंट प्रति गैलन की वृद्धि हुई है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला के बारे में उपभोक्ता चिंताएं बढ़ गई हैं।वियतनाम ने नागरिकों से ईंधन का संरक्षण करने के लिए कहा है और सार्वजनिक परिवहन और जैव ईंधन के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। सरकार ने ईंधन की स्थिति पर नजर रखने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का भी गठन किया है।श्रीलंका ने ईंधन की कीमतों में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि की है, लेकिन उसका कहना है कि उसके पास अप्रैल तक चलने के लिए पर्याप्त भंडार है।

इंडोनेशिया कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक समाधान तलाश रहा है। सरकार अपने बी 50 बायोडीजल कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य डीजल ईंधन में पाम तेल आधारित बायोडीजल की हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाना है।अधिकारियों का मानना है कि इससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और घरेलू ईंधन की कीमतों को स्थिर करने में मदद मिल सकती है।

कई देशों के अधिकारी नागरिकों से आग्रह कर रहे हैं कि वे घबराहट में खरीदारी करने से बचें और जिम्मेदारी से ईंधन का उपयोग करें। कुछ सरकारों ने अवैध भंडारण को रोकने के लिए हॉटलाइन और निगरानी प्रणाली शुरू की है।आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले सप्ताह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य पूर्व में प्रमुख ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर स्थिरता कितनी जल्दी लौटती है। तब तक, दुनिया भर के देश ऊर्जा बाजार में लंबे समय तक अनिश्चितता की संभावना की तैयारी कर रहे हैं।