दिलीप कुमार पाठक
नेपाल की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ पुरानी पीढ़ी का सूर्यास्त और एक नई, तकनीक-प्रेमी युवा पीढ़ी का उदय साफ देखा जा सकता है। काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह यानी बालेन शाह का जिस तरह से पूरे नेपाल में प्रभाव बढ़ा है, उसने न केवल वहां के पारंपरिक राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है, बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। नेपाल की जनता, विशेषकर युवा वर्ग, अब शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली और प्रचंड जैसे पुराने चेहरों के ‘सिंडिकेट राज’ से ऊब चुका है। बालेन शाह की बढ़ती लोकप्रियता केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह नेपाल की उस व्यवस्था के खिलाफ एक जनाक्रोश है, जो दशकों से भ्रष्टाचार और अस्थिरता की शिकार रही है।
इस बदलाव की पृष्ठभूमि में पिछले कुछ समय से चल रहे जन-आंदोलन और सोशल मीडिया की ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नेपाल का युवा अब रोजगार, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और पारदर्शी प्रशासन चाहता है। बालेन शाह ने मेयर के रूप में जिस तरह से काठमांडू की सड़कों, कचरा प्रबंधन और अतिक्रमण पर काम किया, उसने उन्हें एक ‘मैजिक मैन’ की छवि दे दी है। वे पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं और उनका गवर्नेंस मॉडल जज्बातों से ज्यादा आंकड़ों और समाधान पर आधारित है। यही कारण है कि आज नेपाल के गांव-गांव में उनकी ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ का आधार मजबूत हो रहा है। जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यदि वे देश की कमान संभालते हैं, तो नेपाल की आंतरिक और विदेश नीति में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिलेंगे। बालेन शाह के विजन का एक बड़ा हिस्सा नेपाल को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और खाड़ी देशों में हो रहे युवाओं के भारी पलायन को रोकना है। वे अक्सर अपनी तकरीरों में नेपाल की जल-विद्युत क्षमता और पर्यटन को भारतीय बाजार से जोड़ने की बात करते हैं, लेकिन एक ‘समान साझेदार’ की शर्त पर। भारत के लिए यह एक रणनीतिक चुनौती है कि वह नेपाल की इस नई आर्थिक महत्वाकांक्षा को अपने ‘नेबरहुड फर्स्ट’ विजन में कैसे फिट करता है। यदि बालेन शाह सत्ता के शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो सीमा सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत को एक ऐसा साथी मिल सकता है जो तकनीकी निगरानी और आधुनिक प्रबंधन में विश्वास रखता है। नेपाल का नया नेतृत्व अब केवल ‘सहायता’ नहीं, बल्कि ‘सार्थक निवेश’ और ‘तकनीकी हस्तांतरण’ की मांग कर रहा है, जो भारत के लिए अपनी कूटनीतिक शैली बदलने का संकेत है। भारत के लिए नेपाल का यह नया नेतृत्व एक ‘पहेली’ जैसा है। बालेन शाह की छवि एक प्रखर और कभी-कभी ‘आक्रामक’ राष्ट्रवादी की रही है। उन्होंने मेयर रहते हुए काठमांडू में भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने जैसा कड़ा फैसला लिया था और अपने दफ्तर में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाकर अपनी राजनीतिक लकीर खींच दी थी। उनकी नीति स्पष्ट रूप से ‘नेपाल फर्स्ट’ की है, जिसका मतलब है कि वे किसी भी पड़ोसी देश के प्रभाव में दबकर काम नहीं करेंगे। ऐसे में नई दिल्ली को अब एक ऐसे नेतृत्व से संवाद करना होगा जो पुरानी कूटनीतिक मर्यादाओं के बजाय सीधे और बेबाक फैसलों में यकीन रखता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह बालेन शाह के राष्ट्रवाद को किस तरह एक रचनात्मक सहयोग में बदलता है, हालांकि, इस सिक्के का एक दूसरा और सकारात्मक पहलू भी है। बालेन शाह ने अपनी उच्च शिक्षा भारत से पूरी की है। वे भारतीय समाज की बारीकियों, यहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था और दोनों देशों के बीच के ‘रोटी-बेटी’ के रिश्तों की अहमियत को गहराई से समझते हैं। भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर हो सकता है क्योंकि एक पढ़ा-लिखा और विजनरी नेतृत्व चीन के ‘कर्ज जाल’ और उसकी विस्तारवादी नीतियों के खतरों को बेहतर समझता है। भारत अब नेपाल के साथ जल-विद्युत परियोजनाओं, डिजिटल कनेक्टिविटी और व्यापारिक समझौतों पर अधिक पारदर्शी और तकनीकी धरातल पर बात कर सकता है। बालेन जैसे नेता पुरानी फाइलों के बजाय ‘डिलीवरी’ पर जोर देते हैं, जो भारत के निवेश के लिए एक अच्छा संकेत है।
आने वाले समय में भारत-नेपाल संबंधों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि नई दिल्ली इस बदलाव को कितनी संजीदगी से लेती है। भारत को अब अपनी ‘बिग ब्रदर’ वाली पुरानी छवि को पीछे छोड़कर नेपाल के इस नए और स्वाभिमानी नेतृत्व के साथ एक ‘समान साझेदार’ की तरह पेश आना होगा। खुली सीमा के कारण होने वाली सुरक्षा चुनौतियां और सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, बल्कि ठोस और सम्मानजनक समाधान ढूंढने होंगे। नेपाल की सड़कों पर गूंजता बालेन शाह का नाम दरअसल एक बदलते और आधुनिक नेपाल की पुकार है। भारत के पास मौका है कि वह इस नई ऊर्जा का साथी बने और हिमालयी क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखे





