सरेंडर की मांग से भड़का संघर्ष: क्या यह युद्ध लंबा और विनाशकारी होगा?

Conflict fueled by demands for surrender: Will this war be long and destructive?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

मध्य पूर्व अचानक संघर्ष की भयंकर आग में झुलस रहा है। 6 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से “पूर्ण और बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग की — कोई सौदा नहीं, कोई मध्यस्थता नहीं, सिर्फ पूरी तरह जीत। यह अल्टीमेटम युद्ध के सातवें दिन आया, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हजारों लक्षित हमले किए। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि केवल आत्मसमर्पण के बाद ही ईरान में नया “महान और स्वीकार्य नेता” चुना जाएगा और देश का पुनर्निर्माण होगा। इस मांग ने कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह बंद कर दिया है। वैश्विक मीडिया इसे “मैक्सिमलिस्ट वॉर ऐम्स” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिससे साफ है कि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रह सकता है। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोज़तबा खामेनेई ने इसे केवल एक “सपना” करार देते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया, जिससे तनाव और भी गहरा गया है।

खामेनेई के कड़े शब्दों ने अमेरिका के लिए सीधे चुनौती खड़ी कर दी। ईरान ने ट्रंप का अल्टीमेटम ठुकराते हुए कहा, “हम अंत तक लड़ेंगे।” इसके तुरंत बाद, ईरानी मल्टी-वारहेड मिसाइलों ने इज़राइल और गल्फ क्षेत्रों को विनाश की आग में ढक दिया। 10 मार्च तक, युद्ध के 11वें दिन, 140 से अधिक अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं, जिनमें 8 की स्थिति गंभीर है। पेंटागन चुप्प है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ इसे “साइलेंट किलर” मोड कहते हैं। ईरान ने क्षेत्रीय सहयोगियों को सक्रिय किया, जिससे लेबनान में 10 लाख लोग विस्थापित हुए। यह संघर्ष अब एट्रिशन वार की ओर बढ़ रहा है, जहां कोई स्पष्ट विजेता दिखाई नहीं देता। ट्रंप का दावा कि ईरान की मिसाइल क्षमता 80% कम हो गई है, हकीकत से मेल नहीं खाता, क्योंकि जवाबी हमले लगातार जारी हैं। रूस के साथ ईरान की बातचीत अमेरिकी आर्थिक दबाव को और गहरा रही है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट की कगार पर खड़ी है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे “मेजर ह्यूमैनिटेरियन इमरजेंसी” घोषित किया। अब तक 1000 से अधिक नागरिक स्थल तबाह हो चुके हैं। मध्य पूर्व में अस्थिरता फैल रही है, बेरूत से तेहरान तक बमबारी जारी है। तेल की कीमतें 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं और होर्मुज स्ट्रेट में खतरे के कारण और बढ़ सकती हैं। जर्मन चांसलर ने चेतावनी दी कि बिना ठोस एग्जिट प्लान के युद्ध अनंत तक खिंच सकता है। चीन ने ईरान को स्पष्ट संदेश दिया कि अमेरिका और इजराइल को चुनौती न दें, जबकि रूस का समर्थन ईरान को जारी है। ट्रंप बार-बार “विजय नजदीक” बता रहे हैं, लेकिन मिसाइल हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। दुनिया की निगाहें थम गई हैं, क्योंकि किसी भी क्षण परमाणु खतरे का भय मंडरा रहा है।

भारत की ऊर्जा व्यवस्था संकट के सबसे गंभीर मोड़ पर है। देश का लगभग 50-60% तेल होर्मुज स्ट्रेट से आता है, जो किसी भी समय पूरी तरह बंद हो सकता है और आपूर्ति ठप्प कर सकता है। पेट्रोल और डीजल 200 रुपये पार कर सकते हैं, जबकि एलपीजी की कमी घरेलू अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही है। हवाई यात्रा ठप हो गई, फ्लाइट्स 14 घंटे तक फंसीं और लाखों लोग प्रभावित हुए। फरवरी 2026 में आयातित तेल की मात्रा देश की कुल जरूरत का 53% थी, और अब वैकल्पिक स्रोतों की ओर नजरें गड़ाई गई हैं—रूस, अमेरिका और वेस्ट अफ्रीका ही संभावित विकल्प बन रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय तनाव चरम पर पहुंच चुका है। दबाव और शांति के बीच संतुलन साधना अब सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। बैकचैनल्स के जरिए शांति के संकेत भेजे जा रहे हैं, लेकिन अल्टीमेटम से पीछे हटना लगभग असंभव है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना रिजीम चेंज के कोई “जादुई जीत” संभव नहीं। ईरान ने सरेंडर नहीं किया; उसका नेतृत्व और भी रेडिकल हो गया है। अमेरिकी बलों ने अब तक 5000 से अधिक टारगेट्स हिट किए, लेकिन ईरानी मिसाइलें लगातार जारी हैं। पेंटागन की चुप्पी वैश्विक स्तर पर सवाल खड़े कर रही है और यह अल्टीमेटम युद्ध को लंबा खींच सकता है, जिससे आर्थिक भार अमेरिका पर भारी पड़ेगा।

ईरान पूरी तरह अमेरिका को थकाने और दबाव में रखने की रणनीति पर केंद्रित है। होर्मुज स्ट्रेट और प्रमुख तेल पाइपलाइंस को निशाना बनाकर उसने वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ा दिया है। क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने के लिए विद्रोही समूहों को सक्रिय करना उसकी रणनीति का हिस्सा बन गया है। युद्ध का कोई सुरक्षित ऑफ-रैंप न होने के कारण यह दावा कि यह जल्द खत्म होगा पूरी तरह खोखला लगता है। संघर्ष का प्रभाव अब खेलों और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तक पहुँच गया है—भारतीय महिला फुटबॉल टीम के वीजा अटक गए, जबकि वेस्ट इंडीज के क्रिकेटर हफ्तों तक फंसे रहे, कुछ खिलाड़ी कमर्शियल फ्लाइट्स से 9-10 दिन बाद घर लौट पाए, जिससे खेल जगत गहरे संकट में है।

डिप्लोमेसी अब सबसे अहम जरूरत बन गई है। रूस और ईरान की बातचीत जारी है, जबकि चीन की चेतावनी स्पष्ट और सख्त है। ट्रंप बैकचैनल्स के माध्यम से शांति के संकेत दे रहे हैं, लेकिन “सरेंडर या डाई” अल्टीमेटम इसे रोक रहा है। ईरान न्यूक्लियर रिफाइनमेंट तेज कर सकता है, जो वैश्विक स्तर पर बड़ा खतरा पैदा करता है। अब दुनिया के नेताओं को तुरंत मध्यस्थता करनी होगी, वरना ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस और गहरा जाएगा। यह अल्टीमेटम इतिहास में दर्ज होगा—या तो अमेरिकी “विजय” के रूप में, या गंभीर भूल के रूप में।

भविष्य की अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को गहरी चिंता में डाल दिया है। यदि ईरान पीछे नहीं हटता, तो यह संघर्ष लंबे एट्रिशन युद्ध में बदल सकता है—जहाँ मौतों की संख्या बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा। ऐसी स्थिति में ट्रंप को अपना अल्टीमेटम वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, और घोषित “विक्ट्री” केवल राजनीतिक बयान भर रह जाएगी। दूसरी ओर, ईरान अपने सहयोगियों के साथ अंत तक लड़ने का संकेत दे चुका है। भारत जैसे देश तटस्थ रहते हुए कूटनीति के रास्ते को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। यह अल्टीमेटम शांति की संभावनाओं को कठिन परीक्षा में डाल रहा है। अब आने वाला समय ही तय करेगा कि ट्रंप की दिखावटी ताकत भारी पड़ेगी या ईरान की दृढ़ता पूरी दुनिया को एक नए संकट के दौर में धकेल देगी।