लखनऊ में संत-सियासत का संगम, अखिलेश के नकली संत बयान से नया विवाद

A confluence of saints and politics in Lucknow, Akhilesh's fake saint statement sparks new controversy

अजय कुमार

लखनऊ की सियासत में गुरुवार को एक मुलाकात ने अचानक हलचल बढ़ा दी। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मिलने पहुंचे। करीब एक घंटे तक चली यह मुलाकात औपचारिक जरूर थी, लेकिन बाहर निकलते ही दिया गया बयान चर्चा का विषय बन गया। अखिलेश यादव ने कहा कि असली संतों का आशीर्वाद मिलने से नकली संतों का अंत होता है। इस टिप्पणी ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।दरअसल यह मुलाकात ऐसे समय में हुई जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद चर्चा के केंद्र में हैं। उन्होंने हाल ही में गो-संरक्षण को लेकर ‘गो प्रतिष्ठार्थ धर्मयुद्ध’ अभियान चलाया था। यह यात्रा वाराणसी से शुरू होकर कई जिलों से गुजरते हुए लखनऊ पहुंची और कांशीराम स्मृति उपवन में इसका समापन कार्यक्रम आयोजित किया गया। आयोजन को लेकर पहले से ही काफी चर्चा थी और संत समाज के बड़े जुटान का दावा किया जा रहा था।कार्यक्रम के लिए बड़े पंडाल और व्यापक व्यवस्था की गई थी, लेकिन जब तस्वीरें सामने आईं तो कई कुर्सियां खाली दिखाई दीं। उम्मीद से कम भीड़ पहुंचने की बात राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई। इसके बावजूद मंच से आंदोलन को आगे बढ़ाने का ऐलान किया गया और गो-संरक्षण को लेकर संत समाज की नई रणनीति सामने रखी गई।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कार्यक्रम में कहा कि अब संत समाज गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेगा। इसके लिए ‘चतुरंगिणी व्यवस्था’ बनाई जाएगी। इस व्यवस्था में सन्यासी, वैरागी, उदासीन और आम अनुयायी शामिल होंगे। उनका कहना था कि यह समूह समाज में जाकर लोगों को बताएगा कि गाय और संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को किस तरह खड़ा होना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को तथ्य और धर्म की दृष्टि से जागरूक करने का प्रयास है।समापन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने आगे की योजना भी बताई। उनके अनुसार अब 52 दिनों तक ‘ज्ञान यज्ञ’ का आयोजन होगा, जिसमें संत समाज गांव-गांव जाकर धर्म और संस्कृति से जुड़े विषयों पर संवाद करेगा। इसके बाद 3 मई से 81 दिन की ‘गविष्ठि परिक्रमा’ यात्रा शुरू होगी, जो गोरखपुर से शुरू होकर 23 जुलाई को वहीं समाप्त होगी। इस यात्रा के बाद 24 जुलाई को सभी संत और अनुयायी फिर से लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में एकत्र होंगे।इसी बीच गुरुवार को अखिलेश यादव का शंकराचार्य से मिलने पहुंचना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा रही है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले साधु-संतों का आशीर्वाद लिया जाता है। उन्होंने शंकराचार्य से मुलाकात को सम्मान की बात बताते हुए कहा कि संत समाज समाज को सही दिशा दिखाने का काम करता है।

लेकिन इसी दौरान उन्होंने जो टिप्पणी की, वही विवाद की वजह बन गई। अखिलेश यादव ने कहा कि असली संतों से मिलने से नकली संतों का अंत होता है। उनके इस बयान को लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगे हैं। कुछ लोग इसे सीधे तौर पर किसी व्यक्ति या विचारधारा पर तंज मान रहे हैं, जबकि समर्थक इसे सामान्य धार्मिक टिप्पणी बता रहे हैं।अखिलेश यादव यहीं नहीं रुके। उन्होंने राज्य सरकार पर भी तीखा हमला बोला। उनका कहना था कि प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर होती जा रही है और कई घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सरकार ठीक से नहीं चल रही है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि जिलाधिकारी की बैठकों में राजनीतिक पदाधिकारी बैठेंगे तो बेहतर होगा कि जिलाधिकारी की नेम प्लेट हटाकर भाजपा जिलाध्यक्ष की नेम प्लेट लगा दी जाए।उन्होंने गैस आपूर्ति का मुद्दा भी उठाया। अखिलेश यादव ने कहा कि एलपीजी को लेकर देश में संकट की स्थिति बन रही है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। उनका आरोप था कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है और भ्रम फैलाने का काम कर रही है। उन्होंने मांग की कि गैस की आपूर्ति समय सीमा के भीतर सुनिश्चित की जानी चाहिए और यदि किसी अधिकारी ने गलत आदेश जारी किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

मुलाकात के दौरान अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब गायों के संरक्षण और सेवा के लिए कई फैसले लिए गए थे। कन्नौज में केवल गाय के दूध से बनने वाले डेयरी उत्पादों के लिए प्लांट लगाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय गौ-संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यदि उनकी पार्टी को मौका मिलता है तो इस दिशा में और बेहतर काम किया जाएगा।दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी अपने संबोधन में सरकार पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि गौ-संरक्षण के लिए बजट बढ़ाने की घोषणाएं तो की जाती हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती। उन्होंने कहा कि संत समाज का काम राजनीति करना नहीं है, लेकिन जब शासक गलत दिशा में जाता है तो उसे सही रास्ता दिखाना संतों का कर्तव्य होता है।इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि कार्यक्रम में कई राजनीतिक दलों के नेता पहुंचे। इनमें कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, पूर्व एमएलसी दीपक सिंह, सपा नेता रविदास मेहरोत्रा और पूजा शुक्ला समेत कई नेता शामिल थे। इससे यह संकेत भी मिला कि गौ-संरक्षण के मुद्दे पर संत समाज के मंच पर विभिन्न दलों के नेता एक साथ दिखाई दे रहे हैं।

अब लखनऊ की यह मुलाकात केवल एक धार्मिक शिष्टाचार भेंट भर नहीं मानी जा रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में संत-समाज का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और ऐसे समय में जब चुनावी माहौल धीरे-धीरे बन रहा है, इस तरह की मुलाकातें अपने साथ कई राजनीतिक संदेश भी लेकर आती हैं। फिलहाल अखिलेश यादव के ‘नकली संत’ वाले बयान ने इस मुलाकात को और ज्यादा चर्चित बना दिया है। आने वाले दिनों में इस बयान को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म और राजनीति का यह संगम कोई नया नहीं है, लेकिन हर बार यह नए सवाल और नई बहसें जरूर पैदा कर देता है। इस बार भी लखनऊ की इस मुलाकात ने वही काम किया है।