पिछली कड़वी यादों को भुला अखिलेश की पश्चिमी यूपी में बड़ी चुनावी रैली की तैयारी

Forgetting bitter memories of the past, Akhilesh is preparing for a big election rally in western UP

अजय कुमार

समाजवादी पार्टी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी औपचारिक रूप से शुरू कर दी है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव 29 मार्च को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी में समानता भाईचारा रैली के जरिए अपना चुनावी अभियान शुरू करेंगे। यह महज एक रैली नहीं है, बल्कि यह उस बड़ी राजनीतिक योजना की शुरुआत है जिसके जरिए अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की जमीन को नए सिरे से तैयार करना चाहते हैं। दादरी का चुनाव भी रणनीतिक है क्योंकि यह इलाका जाट, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों की मिली-जुली आबादी वाला क्षेत्र है और यहीं से पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति को धार देने की कोशिश की जाएगी। 2022 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन समाजवादी पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक रहा था। पश्चिमी यूपी में कुल मिलाकर करीब 136 विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, हापुड़ और आसपास के जिले शामिल हैं। 2022 में इस पूरे इलाके में समाजवादी पार्टी को केवल 35 से 38 के आसपास सीटें मिली थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी ने यहां करीब 80 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की थी। वोट प्रतिशत की बात करें तो पश्चिमी यूपी में भाजपा को करीब 44 से 46 फीसदी वोट मिले थे जबकि सपा 30 से 33 फीसदी के आसपास सिमट गई थी। राष्ट्रीय लोकदल उस वक्त सपा के साथ गठबंधन में था और उसने जाट बहुल इलाकों में कुछ सीटें जिताई थीं, लेकिन इसके बावजूद गठबंधन का समग्र प्रदर्शन भाजपा के मुकाबले कमजोर ही रहा।

पश्चिमी यूपी में सपा की कमजोरी की जड़ें बहुत गहरी हैं। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद इस इलाके में जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच जो दरार पैदा हुई थी, उसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। जाट मतदाता जो परंपरागत रूप से कभी कांग्रेस तो कभी लोकदल के साथ रहते थे, 2014 के बाद से भाजपा की तरफ मजबूती से झुक गए। 2022 में भी यह झुकाव बड़े पैमाने पर बना रहा। हालांकि राकेश टिकैत के नेतृत्व में किसान आंदोलन के बाद यह उम्मीद जगी थी कि जाट वापस भाजपा से नाराज होंगे, लेकिन वोटिंग के वक्त बड़े पैमाने पर यह नाराजगी सपा के पक्ष में नहीं बदल पाई।अब 2023 में राष्ट्रीय लोकदल ने सपा का साथ छोड़कर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया है। जयंत चौधरी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि 2027 में सपा के पास पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं तक पहुंचने का वह पुराना पुल नहीं रहेगा। पश्चिमी यूपी की करीब 40 से 45 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां जाट मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इन सीटों पर रालोद के भाजपा के साथ जाने से सपा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।ऐसे में अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति ही वह हथियार है जिससे वे इस गणित को पलटना चाहते हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए का यह फार्मूला 2024 के लोकसभा चुनाव में काफी हद तक काम भी किया। 2024 में सपा ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतीं जो पार्टी के इतिहास में लोकसभा का सबसे बेहतर प्रदर्शन था। पश्चिमी यूपी में भी 2024 में सपा ने कुछ अप्रत्याशित जीतें दर्ज कीं। मुरादाबाद, रामपुर, संभल, अमरोहा और बिजनौर जैसे क्षेत्रों में सपा और उसके सहयोगी दलों ने बेहतर प्रदर्शन किया। इससे अखिलेश को भरोसा मिला कि पीडीए का फार्मूला अगर सही तरीके से जमीन पर उतारा जाए तो पश्चिमी यूपी में भी बड़ा बदलाव संभव है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जातीय संरचना पर गौर करें तो यहां मुस्लिम आबादी कई जिलों में 30 से 40 फीसदी तक है।

मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, संभल, अमरोहा, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं और वे परंपरागत रूप से सपा के साथ रहे हैं। इसके अलावा दलित मतदाता जो अनुसूचित जाति के हैं, पश्चिमी यूपी में करीब 20 से 22 फीसदी हैं। पिछड़े वर्ग जिनमें यादव, कुर्मी, सैनी, प्रजापति, गुर्जर और अन्य जातियां शामिल हैं, उनकी भी पश्चिमी यूपी में ठीकठाक मौजूदगी है। अगर ये तीनों तबके एकजुट होकर सपा को वोट दें तो कम से कम 50 से 55 फीसदी वोट का आधार बन सकता है जो किसी भी सीट पर जीत के लिए पर्याप्त है।लेकिन असली चुनौती इन्हें एकजुट करना है। दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बहुजन समाज पार्टी की तरफ देखता है। हालांकि मायावती की पार्टी 2022 और 2024 दोनों चुनावों में बुरी तरह पिटी है और उनका वोट बैंक बिखर रहा है। अखिलेश की कोशिश है कि इस बिखरे हुए दलित वोट को अपनी तरफ खींचा जाए। दादरी की रैली में समानता और भाईचारे का संदेश इसीलिए दिया जाएगा ताकि दलित समुदाय को यह भरोसा दिलाया जा सके कि सपा उनकी पार्टी है।

पश्चिमी यूपी में सपा के सामने एक और बड़ी समस्या संगठन की है। इस इलाके में सपा का जमीनी ढांचा बहुत मजबूत नहीं है। पूर्वी यूपी के मुकाबले जहां यादव बाहुल्य क्षेत्र हैं और पार्टी की गहरी जड़ें हैं, पश्चिमी यूपी में सपा को हर बूथ तक अपनी पहुंच बनाने के लिए नए सिरे से काम करना होगा। अखिलेश ने इसके लिए रैलियों और जनसंपर्क अभियानों की एक लंबी श्रृंखला तैयार की है जो दादरी से शुरू होकर पूरे पश्चिमी यूपी को कवर करेगी।भाजपा के लिए भी यह लड़ाई आसान नहीं होगी। किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे जनता के मन में हैं। पश्चिमी यूपी के गन्ना किसानों का बकाया और सरकारी योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन बड़े सवाल हैं। सपा इन्हीं मुद्दों को हवा देकर अपना रास्ता बनाना चाहती है।2027 में पश्चिमी यूपी की लड़ाई तय करेगी कि उत्तर प्रदेश में सत्ता का रुख किस तरफ जाएगा। इस इलाके की 136 के करीब सीटें किसी भी दल को सरकार बनाने या रोकने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। अखिलेश यादव जानते हैं कि अगर पश्चिमी यूपी नहीं जीता तो लखनऊ की राह बंद है। दादरी की रैली इसी लंबे सफर का पहला कदम है।