प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शहरों की असल तस्वीर उनकी ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि बिखरी हुई नागरिक आदतें बयान करती हैं। भागती सुबह में उड़ता कचरा, लाल बत्ती को रौंदती गाड़ियां, फुटपाथों पर जमे वाहन और सार्वजनिक स्थानों के प्रति बेपरवाही—ये सब उस मानसिकता का खुला बयान हैं, जो अधिकार तो चाहती है, पर कर्तव्य से बचती है। घर की चमक और बाहर की गंदगी का यह तीखा विरोध अब हमें झकझोरता नहीं, क्योंकि हमने इसे सामान्य मान लिया है। यहीं सिविक सेंस दम तोड़ता है। हम व्यवस्था से उम्मीदें ऊंची रखते हैं, लेकिन उसे बनाने में अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट लेते हैं। 2026 में भी यही सोच इस समस्या को जिंदा रखे हुए है।
दैनिक जीवन में सिविक सेंस की कमी केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि आंकड़ों में भी साफ दर्ज है। देश के शहरी इलाके हर दिन लगभग 1.62 लाख टन नगरपालिका कचरा पैदा करते हैं, जिसका बड़ा हिस्सा अब भी लैंडफिल या खुले में जा पहुंचता है—यह बताता है कि स्रोत पर अलग करना और सही निस्तारण जैसी बुनियादी आदतें अब भी हाशिए पर हैं। ट्रैफिक के मोर्चे पर स्थिति और भयावह है। 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.77 लाख से अधिक मौतें दर्ज हुईं—यानी औसतन रोज 485 जिंदगियां खत्म। ओवरस्पीडिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट की अनदेखी, गलत पार्किंग जैसी लापरवाहियां इस त्रासदी की मुख्य वजह रहीं। सबसे चिंताजनक वह सोच है, जो इन आंकड़ों के पीछे छिपी है—“दूसरे नहीं मानते, तो मैं क्यों मानूं?” यही मानसिकता सिविक सेंस को भीतर से खोखला कर रही है।
समस्या सतह पर नहीं, हमारी परवरिश और सामाजिक ढांचे में जमी है। स्कूलों में सिविक सेंस सैद्धांतिक रह जाता है, व्यवहारिक अभ्यास लगभग गायब है। बच्चे किताबों में अनुशासन पढ़ते हैं, पर घर और सड़कों पर उसका उल्टा देखते हैं—यहीं से विरोधाभास जन्म लेता है। सफाई को “किसी और का काम” मानना और सार्वजनिक संपत्ति से दूरी इस कमी को और गहरा करते हैं। कानून तो हैं, पर उनका प्रवर्तन न निरंतर है, न सख्त; जुर्माना अपवाद बनकर रह जाता है, आदत नहीं बदलती। विडंबना यह कि विदेश में नियमों का पालन करने वाला नागरिक, अपने देश में लौटते ही वही पुरानी लापरवाही दोहराता है—यही दोहरापन बदलाव की सबसे बड़ी बाधा है।
इसके दुष्परिणाम केवल दृश्य गंदगी तक सीमित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण—तीनों पर भारी पड़ते हैं। कचरे और अस्वच्छता से फैलने वाली बीमारियां लाखों लोगों, खासकर गरीबों और बच्चों को प्रभावित कर रही हैं। सड़क दुर्घटनाएं परिवारों को एक झटके में आर्थिक और भावनात्मक संकट में धकेल देती हैं। पर्यावरणीय नुकसान भी गहरा है—देश की 296 नदियों के खंड प्रदूषित हैं, जिनमें प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट की बड़ी भूमिका है। कई शहरों में हवा खतरनाक स्तर पर बनी हुई है; खुले में कचरा जलाना इसे और विषैला बनाता है, जबकि अव्यवस्थित निपटान भूजल को भी दूषित करता है। इसका असर पर्यटन, निवेश और शहरों की छवि पर साफ दिखता है। जब नागरिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ते हैं, तो विकास की रफ्तार भी थमने लगती है।
सरकारी स्तर पर पहलें कमजोर नहीं रहीं—स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 ने ढांचे को मजबूती दी है और नतीजे भी दिखने लगे हैं। 2025 तक शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रसंस्करण क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई, कई शहरों में डोर-टू-डोर संग्रह 90%+ कवरेज तक पहुंच चुका है और लीगेसी वेस्ट की सफाई ने रफ्तार पकड़ी है। इंदौर लगातार स्वच्छ सर्वेक्षण में नंबर 1 बना हुआ है, जबकि सूरत और नवी मुंबई जैसे शहर व्यवहार और प्रबंधन—दोनों के सफल मॉडल पेश कर रहे हैं। 2026 के नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों ने स्रोत पर 4-स्ट्रीम सेग्रिगेशन को अनिवार्य कर एक स्पष्ट दिशा भी तय कर दी है। फिर भी तस्वीर अधूरी है—उपलब्धियों के बावजूद आम नागरिक के व्यवहार में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता। साफ है, इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, लेकिन निर्णायक बदलाव मानसिकता बदलने से ही आएगा।
वैश्विक अनुभव बताते हैं कि सिविक सेंस कानून से नहीं, संस्कृति से बनता है। जापान में बच्चे स्कूल की सफाई खुद करते हैं—सार्वजनिक जगह गंदा करना वहां अस्वीकार्य है। सिंगापुर ने सख्त प्रवर्तन से ऐसी आदतें विकसित कीं, जो अब स्वाभाविक व्यवहार हैं। भारत में भी इंदौर और सूरत जैसे शहरों ने शिक्षा, सामुदायिक निगरानी और कड़े अमल के संयोजन से उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। अब जरूरी है कि स्कूलों में सिविक सेंस को पाठ्य विषय नहीं, अनिवार्य व्यवहारिक अभ्यास बनाया जाए; युवाओं को नेतृत्व मिले और तकनीक आधारित निगरानी मजबूत हो। वास्तविक, स्थायी बदलाव तभी संभव है जब इसकी शुरुआत परिवार और शिक्षा—दोनों स्तरों से एक साथ हो।
समाधान किसी बड़े सूत्र में नहीं, बल्कि निरंतरता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी की ठोस आदतों में छिपा है। कूड़ा डस्टबिन में डालना, सिग्नल पर रुकना, फुटपाथ खाली रखना और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान—ये छोटे कदम जब सामूहिक व्यवहार बनते हैं, तभी बड़ा बदलाव आकार लेता है। व्यवस्था को भी ढील नहीं, दृढ़ता चाहिए—दोहराए उल्लंघनों पर लाइसेंस निलंबन, अनिवार्य सामुदायिक सेवा जैसे कड़े प्रावधान लागू हों। साथ ही, जिम्मेदार आचरण को पहचान और प्रोत्साहन मिले, ताकि सकारात्मक उदाहरण फैलें। मीडिया, एनजीओ और स्थानीय समुदाय मिलकर लगातार, लक्ष्य-आधारित जागरूकता अभियान चलाएं—तभी बदलाव टिकाऊ बनेगा।
अब मुद्दा “कब” नहीं, “कैसे” का है। साफ सड़कें, अनुशासित ट्रैफिक और जिम्मेदार नागरिकता किसी एक योजना की देन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की पहचान हैं। आंकड़े साफ चेतावनी दे रहे हैं—हर दिन 1.62 लाख टन कचरा, सालाना 1.77 लाख सड़क मौतें, और लगातार प्रदूषित होती नदियां। इसके बावजूद अगर हम बदलाव टालते हैं, तो समस्या ही हमारी आदत बन जाएगी। विकसित भारत का सपना नीतियों से नहीं, हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से साकार होगा। सिविक सेंस कोई विचार भर नहीं, बल्कि हमारी पहचान बनना चाहिए—और इसकी शुरुआत आज, अभी, हमारे हर छोटे जिम्मेदार कदम से होनी चाहिए।





