सन्दीप तोमर
हर वर्ष जैसे ही बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते हैं, समाज में एक अजीब-सी हलचल शुरू हो जाती है। कहीं मिठाइयाँ बंटती हैं, तो कहीं घरों में सन्नाटा पसरा होता है। इन सबके बीच सबसे ज्यादा दबाव जिस पर होता है, वह है—बच्चा। यह सवाल अब गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या वास्तव में बच्चों का यह तनाव उनकी अपनी क्षमता का परिणाम है, या फिर हमारी—यानी अभिभावकों की—खराब पेरेंटिंग का असर?
आज के समय में यह एक कटु सत्य बन चुका है कि बच्चे अंक (मार्क्स) को लेकर तनाव में जीते हैं। कई बार यह तनाव इतना गहरा हो जाता है कि वे आत्महत्या जैसे भयावह कदम तक उठा लेते हैं। यह स्थिति किसी एक बच्चे या परिवार की नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक मानसिकता की देन है। हमने अनजाने में परीक्षा और अंकों को जीवन का अंतिम सत्य बना दिया है।
व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालना पूरी तरह से टाला जा सकता है। मैंने कभी अपनी बेटियों से परीक्षा देकर आने के बाद उनका प्रश्नपत्र नहीं देखा, न यह पूछा कि कौन-सा उत्तर कैसा लिखा। न ही परिणाम को लेकर कोई जिज्ञासा जताई। मेरा मानना है कि बच्चा जो लिखकर आ चुका है, वह अब बदला नहीं जा सकता। फिर उस पर चर्चा करके उसे क्यों मानसिक तनाव दिया जाए? क्या वह चर्चा केवल हमारे ‘जानने’ के लिए होती है, या वास्तव में बच्चे के भले के लिए?
दरअसल, समस्या केवल बच्चों में नहीं, अभिभावकों की सोच में भी है। हम अपने बच्चों की उपलब्धियों को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं। एक पड़ोसी की बेटी का उदाहरण सामने है—जब मैंने परिणाम जानने के लिए संपर्क किया, तो जवाब मिला कि “देख लिया है।” उस एक वाक्य में एक संकोच, एक छुपाव, और कहीं न कहीं एक सामाजिक भय छिपा था—कि कहीं परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप न हुआ हो, और लोग क्या सोचेंगे! यह प्रवृत्ति बताती है कि परीक्षा परिणाम अब केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक स्टेटस का प्रतीक बन गया है।
यही कारण है कि आज आवश्यकता केवल बच्चों को पढ़ाने की नहीं, बल्कि अभिभावकों को ‘पढ़ाने’ की है। यह विचार अब अतिशयोक्ति नहीं लगता कि अच्छी पेरेंटिंग के लिए भी स्कूल या प्रशिक्षण संस्थान होने चाहिए। समाजशास्त्र जैसे विषयों में पेरेंटिंग पर एक अध्याय शामिल किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी बेहतर अभिभावक बन सके।
शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था पर भी पुनर्विचार आवश्यक है। आज शिक्षा का स्वरूप अत्यधिक अंक-केन्द्रित हो गया है, जबकि वास्तविक आवश्यकता व्यवसायोन्मुखी और जीवनोपयोगी शिक्षा की है। क्या वास्तव में एक परीक्षा यह तय कर सकती है कि कोई बच्चा जीवन में कितना सफल होगा? यदि नहीं, तो फिर ऐसी परीक्षा प्रणाली का औचित्य क्या है, जो छात्रों में भय और तनाव उत्पन्न करे?
जब मैं अपने पुराने शैक्षणिक दस्तावेज देखता हूँ, तो यह प्रश्न मन में आता है कि यदि मेरे अंक और अधिक होते, तो क्या वास्तव में मेरे जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन आ जाता? शायद नहीं। मैं आज भी वही होता—एक शिक्षक, एक लेखक। यह अनुभव यह समझने के लिए पर्याप्त है कि अंक जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं।
अतः समय की मांग है कि हम शिक्षा और पेरेंटिंग—दोनों को नए दृष्टिकोण से देखें। बच्चों को अंक नहीं, आत्मविश्वास दें; तुलना नहीं, समझ दें; और सबसे बढ़कर—उन पर भरोसा करें। क्योंकि एक स्वस्थ और संतुलित बच्चा ही एक स्वस्थ समाज की नींव रख सकता है।





