प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
भारत की परीक्षा-व्यवस्था एक बार फिर उस मोड़ पर है जहाँ प्रश्न केवल नकल या लीक का नहीं, बल्कि भरोसे की बुनियाद के दरकने का है। नीट-यूजी री-एग्जाम से ठीक पहले टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। यह कदम नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की सिफारिश पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत उठाया गया है। इसके तहत 22 जून तक टेलीग्राम की एक्सेस बंद रहेगी और मैसेज एडिटिंग फीचर 30 जून तक निष्क्रिय रहेगा। एक ओर इसे परीक्षा सुरक्षा की तात्कालिक ढाल माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे डिजिटल स्वतंत्रता पर असंतुलित हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह अस्थायी बैन परीक्षा सुधार की दिशा में एक ठोस जीत है या फिर जड़ों को छोड़कर पत्तियों को काटने की पुरानी आदत?
नीट-यूजी परीक्षा लीक का दर्द नया नहीं है। मई 2026 में नीट-यूजी परीक्षा (3 मई को आयोजित) रद्द करनी पड़ी क्योंकि राजस्थान (विशेषकर सीकर-जयपुर क्षेत्र) में गेस पेपर सर्कुलेशन और कथित पेपर लिक के आरोपों ने परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए थे। इससे लगभग 22-23 लाख छात्र प्रभावित हुए। कुछ छात्रों की आत्महत्याओं ने इस त्रासदी को प्रशासनिक विफलता से आगे बढ़ाकर मानवीय संकट में बदल दिया। सरकार और एनटीए का तर्क इस कदम को आपातकालीन सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत करता है। उनका कहना है कि टेलीग्राम पर सक्रिय चैनल न केवल फर्जी पेपर बेच रहे थे, बल्कि संदेशों को एडिट कर बाद में उन्हें “प्रमाण” की तरह पेश कर रहे थे।
यही तकनीकी लचीलापन धोखाधड़ी का नया हथियार बन गया। री-एग्जाम की अत्यंत संवेदनशील अवधि में ऐसे नेटवर्क को प्रभावी रूप से रोकने के लिए अस्थायी प्रतिबंध को आवश्यक एवं तात्कालिक कदम माना गया। यह किसी स्थायी सेंसरशिप की शुरुआत नहीं, बल्कि सीमित समय के लिए डिजिटल दरारों को बंद करने की कोशिश है। पर सवाल यह है कि क्या व्यवस्था की यह ‘तात्कालिक मरम्मत’ दीर्घकालिक सुरक्षा की गारंटी दे सकती है, या यह केवल एक अस्थायी पट्टी है जो गहरे घाव को छुपा देती है?
फिर भी, इस कदम की आलोचना जायज है। टेलीग्राम पर करोड़ों भारतीय निर्भर हैं – छात्र सामग्री शेयर करते हैं, छोटे व्यापारी काम चलाते हैं, पत्रकार सूचना इकट्ठा करते हैं। एक पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना वीपीएन के दौर में कितना प्रभावी होगा, यह बहस का विषय है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन जैसी संस्थाएं इसे अतिरंजित और असंवैधानिक बता रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन जब वह लाखों ईमानदार छात्रों के हक में बाधक बन जाए तो क्या सरकार को हाथ पर हाथ रखकर बैठना चाहिए? संतुलन जरूरी है। बैन अस्थायी है, लक्षित है, लेकिन लंबे समय में यह समाधान नहीं।
पर समस्या केवल डिजिटल मंचों की नहीं, बल्कि उस पूरी संरचना की है जो लीक को जन्म देती है। परीक्षा प्रणाली की कमजोर कड़ियाँ—प्रिंटिंग प्रेस की सुरक्षा, परिवहन की निगरानी, केंद्रों की जवाबदेही और भ्रष्टाचार की छायाएँ—सब मिलकर इस संकट की जमीन तैयार करती हैं। टेलीग्राम या कोई अन्य प्लेटफॉर्म केवल माध्यम है, अपराध का मूल स्रोत नहीं। यदि संरचना ही छिद्रपूर्ण रहेगी, तो अपराधी हर नए माध्यम को अपने हित में ढाल लेंगे। इसलिए केवल डिजिटल नियंत्रण से समाधान की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे दीवारों पर रंग कर भवन की नींव को मजबूत मान लेना।
अब समय आ गया है कि परीक्षा व्यवस्था को तकनीकी और संरचनात्मक दोनों स्तरों पर पुनर्परिभाषित किया जाए। कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग (सीबीटी) का व्यापक उपयोग केवल आधुनिकता नहीं, बल्कि सुरक्षा की आवश्यकता है। एआई आधारित प्रॉक्टरिंग, बायोमेट्रिक सत्यापन और एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र वितरण प्रणाली लीक की संभावना को काफी हद तक कम कर सकते हैं। ब्लॉकचेन जैसी तकनीक प्रश्नपत्र की ट्रेसबिलिटी और पारदर्शिता को नई मजबूती दे सकती है। यदि तकनीक को केवल सहायक नहीं, बल्कि प्रणाली का केंद्र बनाया जाए, तो भरोसे की नींव पुनः स्थापित की जा सकती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म रेगुलेशन का प्रश्न अब टालने योग्य नहीं है। धारा 69A आवश्यक है, पर इसका उपयोग संतुलित और पारदर्शी होना चाहिए। टेलीग्राम समाधान नहीं, यह केवल आपातकालीन कदम है जो तत्काल धोखाधड़ी रोक सकता है। सरकार को टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर प्रभावी रिपोर्टिंग मैकेनिज्म विकसित करना चाहिए, ताकि संदिग्ध चैनल तुरंत ब्लॉक हो सकें। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और एनटीए के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी आधारित निगरानी तंत्र विकसित होना चाहिए, जहाँ संदिग्ध गतिविधियों की तेज पहचान और निष्कासन हो सके। नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। एनटीए का दावा है कि इससे फ्रॉड पर अंकुश लगेगा, लेकिन असली सफलता तभी होगी जब छात्रों को बार-बार री-एग्जाम न देना पड़े और उनकी मेहनत सुरक्षित रहे, वरना लगातार विवाद उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करते रहेंगे।
परीक्षाओं की पवित्रता राष्ट्र के भविष्य से जुड़ी है। टेलीग्राम पर यह अस्थायी प्रतिबंध न तो विजय का शंखनाद है और न ही लोकतांत्रिक अधिकारों पर स्थायी चोट। यह एक आपातकालीन प्रतिक्रिया है—एक ऐसे तंत्र की जो बार-बार दरकता है और हर बार अस्थायी सहारे से खड़ा किया जाता है। असली प्रश्न यह है कि क्या हम हर संकट पर प्लेटफॉर्म बदलते रहेंगे या उस व्यवस्था को ही बदलेंगे जो संकट को जन्म देती है। परीक्षा की शुचिता कोई प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की रीढ़ है। यदि यह रीढ़ टूटती रही, तो न केवल परीक्षाएँ, बल्कि पूरा शिक्षा-तंत्र अविश्वास की धूल में बदल जाएगा। अब समय है कि हम सतह पर नहीं, जड़ों पर वार करें—और एक ऐसी व्यवस्था गढ़ें जहाँ ‘लीक’ असंभव नहीं तो कम से कम असहज अवश्य हो। तभी छात्रों का विश्वास लौटेगा और सपनों का हत्यारा माफिया बेकार हो जाएगा।





