संजय सक्सेना
राजनीति में दोहरे मापदंड कोई नई बात नहीं है, लेकिन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पिछले कुछ हफ्तों में जो तस्वीर पेश की है, वह किसी भी संवेदनशील नागरिक को सोचने पर मजबूर कर देती है। एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में चंदे की चोरी का मामला उठाकर वे हिंदू समाज और सनातन धर्म को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गाजियाबाद के खोड़ा में 17 साल के सूर्या चौहान की निर्मम हत्या पर उनके होंठ सिले हुए हैं। यह महज संयोग नहीं, यह सोची-समझी सियासत है। मुरादाबाद में अपने सांसद जावेद अली के उस बयान पर कुछ नहीं बोलते हैं, जिसमें वह बहुसंख्यक समाज को जहरीला बताता है। मुस्लिम युवाओं से हिंदू दोस्तों को कन्वर्ट करने की बात खुलेआम कहता है। हिंदुओं को बांटने के लिए ब्राह्मण नेताओं का सम्मेलन कराते हैं। दरअसल, सात जून को अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके राम मंदिर के दानपात्र में करोड़ों रुपये की हेराफेरी का आरोप लगाया। बात यहीं नहीं रुकी। आगरा में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने पुजारियों की जांच को सनातन का अपमान बताया। अब सवाल यह है कि जब वही पुजारी या मंदिर परिसर के कर्मचारी चोरी के आरोपी हों तो जांच क्यों न हो? लेकिन अखिलेश की राजनीतिक फितरत यह है कि किसी एक घटना को पूरे हिंदू समाज के माथे पर चिपका दो और फिर सियासी रोटी सेंको। दानपात्र से चोरी करने वाले दो लोगों को गिरफ्तार किया गया, उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी भी बना दी, लेकिन अखिलेश को यह कार्रवाई नहीं दिखी क्योंकि दिखती तो उनका नैरेटिव ही ध्वस्त हो जाता।
इसी बीच मुरादाबाद में सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने पीडीए सम्मेलन में जो कहा, वह पूरे प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर झकझोर गया। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज जहरीला हो गया है। फिर उन्होंने मुस्लिम कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि हर मुसलमान कम से कम चार ऐसे हिंदू दोस्त बनाए, जिन पर हिंदू समाज खुद भरोसा करता हो, ताकि उनके जरिए बीजेपी को सत्ता से बाहर किया जा सके। यानी हिंदुओं को ही हिंदुओं के खिलाफ इस्तेमाल करने की खुलेआम रणनीति। यह बयान जितना विवादित है, उतना ही खतरनाक भी। लेकिन अखिलेश यादव? उन्होंने इस बयान पर एक शब्द नहीं बोला। न निंदा, न खंडन, न स्पष्टीकरण। यही उनकी राजनीति का असली चेहरा है। पार्टी के मुस्लिम नेता जो चाहें बोलें, अखिलेश की तरफ से पूरी तरह मौन समर्थन मिलता रहेगा। यही वह दोमुंही सियासत है, जो दशकों से यूपी की राजनीति में जहर घोलती आ रही है। अब जरा खोड़ा की उस गली पर भी नजर डालिए, जहां 28 मई को बकरीद के दिन 11वीं के छात्र सूर्या चौहान को उसके दोस्त असद और उसके साथियों ने चाकू से गोद दिया। इलाज के दौरान सूर्या ने दम तोड़ दिया। मां की आंखों में आंसू थे, भाई का दर्द शब्दों में बयां नहीं हो सकता था। पूरे इलाके में तनाव था। लेकिन समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता अखिलेश यादव के मुंह से न निंदा के दो शब्द निकले, न पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना का एक वाक्य। जैसे घटना हुई ही नहीं। और जब पुलिस ने आरोपी असद का एनकाउंटर किया, तब सपा के प्रवक्ता अमीक जामेई ने एनकाउंटर पर सवाल उठाने की कोशिश की। यानी जब एक हिंदू छात्र की हत्या हुई तब चुप्पी, और जब हत्यारे पर कार्रवाई हुई तब आवाज उठाई। पर्दे के पीछे की बात यह है कि सपा के भीतर इस एनकाउंटर को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बताकर बड़ा मुद्दा बनाने की रणनीति बनी थी, लेकिन सूर्या हत्याकांड का वीडियो सामने आने के बाद पार्टी को बैकफुट पर आना पड़ा।
यह कोई इकलौती घटना नहीं है। यूपी की राजनीति में अखिलेश यादव का यही ढर्रा रहा है। जब भी किसी मुस्लिम नेता ने विवादित बयान दिया, अखिलेश ने मौन साध लिया। जब भी किसी हिंदू के साथ अन्याय हुआ और आरोपी किसी खास वर्ग से रहा, सपा की तरफ से पीड़ित परिवार को ढांढस देने कोई नहीं गया। लेकिन जब भी किसी अपराधी का एनकाउंटर हुआ, जो मुसलमान था, तब एनकाउंटर पर सवाल उठाने की पूरी ताकत लगा दी गई। यह तथाकथित पीडीए यानी पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति का वह असली रूप है, जिसे अखिलेश ने बड़ी चालाकी से गढ़ा है। समाजवादी पार्टी की इस राजनीति को समझने के लिए दो एनकाउंटर की तुलना काफी है। गाजीपुर में विनीत राय हत्याकांड के आरोपी कमलेश बिंद का एनकाउंटर हुआ। तब अखिलेश यादव खुद, उनकी सांसद पत्नी डिंपल यादव, महासचिव शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव तक ने बयान दिया। लेकिन सूर्या के हत्यारे असद के एनकाउंटर पर? सन्नाटा। दोनों एनकाउंटर, दो अलग प्रतिक्रियाएं, एक ही फर्क था कि आरोपी किस धर्म का था। यह वोट बैंक की राजनीति का सबसे नंगा चेहरा है।
अखिलेश यादव की इस दोमुंही सियासत की जड़ें बहुत गहरी हैं। मुलायम सिंह यादव के जमाने से ही सपा की रणनीति रही है कि मुसलमानों को एकजुट रखो और हिंदुओं को जातियों में बांटे रखो। इसी फार्मूले को अखिलेश ने पीडीए के नए आवरण में लपेटकर परोसा है। जावेद अली खान का बयान इसी रणनीति का हिस्सा है, जहां मुस्लिम कार्यकर्ताओं को हिंदुओं के बीच पैठ बनाने के लिए कहा जा रहा है, न सामाजिक सद्भाव के लिए बल्कि बीजेपी को हराने के राजनीतिक लक्ष्य के लिए। उधर, 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं और यूपी की राजनीति में हर पार्टी अपनी जमीन तैयार कर रही है। अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे का मुद्दा उठाकर भाजपा को उसी के हिंदुत्व के मैदान में घेरने की कोशिश की है। लेकिन इस कोशिश में वे यह भूल गए, या जानबूझकर नजरअंदाज किया कि किसी मंदिर में कुछ लोगों की बेईमानी को पूरे हिंदू समाज का दाग नहीं बनाया जा सकता। मंदिर ट्रस्ट और सरकार दोनों ने तत्काल कार्रवाई की, एसआईटी बनाई, गिरफ्तारियां हुईं। यही तो होना चाहिए था। लेकिन अखिलेश चाहते हैं कि यह मुद्दा सुलगता रहे, क्योंकि इसी सुलगन से उनकी सियासी रोटी सिकती है।
आज राम मंदिर के दानपात्र से चोरी की घटना से अखिलेश जितना आहत दिखाई दे रहे हैं, उससे अधिक दर्द समाजवादी पार्टी ने 1990 में तब दिया था, जब मुलायम सरकार ने 16 निहत्थे कारसेवकों को गोली से भून दिया था। बाद में मुलायम ने यहां तक कहा कि हमें 16 की जगह 40 मारने पड़ते तो भी हम हिचकते नहीं। कारसेवकों की हत्या के बाद मुलायम मुसलमानों से कहते थे कि इससे अधिक हम आपके लिए क्या कर सकते हैं। बहरहाल, यूपी की जनता अब समझदार हो चुकी है। वह देख रही है कि कौन कब बोलता है और कौन कब चुप रहता है। सूर्या की मां का दर्द और अखिलेश यादव की चुप्पी, दोनों एक साथ दर्ज हो चुकी हैं इतिहास के पन्नों पर। जावेद अली खान का बयान और अखिलेश का मौन समर्थन, यह भी दर्ज है। राम मंदिर पर उनकी सक्रियता और खोड़ा में एक हिंदू छात्र की हत्या पर उनकी निष्क्रियता, यह दोहरा चरित्र ही समाजवादी पार्टी की असली पहचान बन चुका है। 2027 में जनता इस पहचान का जवाब जरूर देगी।





