निर्मल रानी
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक सेमिनार के दौरान कहा था कि “मैं कह सकता हूं कि नब्बे प्रतिशत भारतीय बेवक़ूफ़ होते हैं। उनके सिर में दिमाग़ नहीं होता। उन्हें आसानी से बेवक़ूफ़ बनाया जा सकता है, उन्हें धर्म के नाम पर शरारती तत्वों द्वारा आसानी से गुमराह किया जा सकता है”। परन्तु अपने इस कथन के 12 वर्षों बाद यानी 2024 में जस्टिस काटजू ने मूर्खों के प्रतिशत में और इज़ाफ़ा करते हुये कहा कि अब वे 95 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख कहते हैं क्योंकि भारत अब “वास्तविक हिंदू राज्य” बन गया है। जस्टिस काटजू के इस कथन को परखने के लिये यदि हम धर्म व अध्यात्म की ध्वजा बुलंद करने वालों की हक़ीक़त को देखें तो यह हमें केवल मूर्ख या महामूर्ख ही नहीं लगते बल्कि अत्यंत निम्न स्तरीय सोच रखने वाले तथा सनातन धर्म,भारतीय समाज व पूरे देश को बदनाम करने वाले भी नज़र आते हैं। मिसाल के तौर पर बलात्कारियों का सम्मान होते,उनका महिमामंडन होते व उनकी शोभा यात्रा निकलते कहीं नहीं देखा गया होगा। यह अद्भुत दृश्य केवल विश्वगुरु भारत के ही ‘अद्भुत समाज’ में देखने को मिलेगा।
आज देश में कई स्वयंभू साधू संत बलात्कार व हत्या जैसे जुर्म में जेल में सज़ायें भुगतते देखे जा सकते हैं। देश की अदालतों ने गवाहों के बयान व साक्ष्यों के आधार पर ऐसे अलग अलग बलात्कारी बाबाओं को सज़ा सुनाने का साहस कर क़ानून की रक्षा करने का काम क्या है। परन्तु आश्चर्य है कि ऐसे धर्माचार्यों व स्वयंभू अध्यात्मवादियों की काली करतूतें जानने के बावजूद उनके भक्तजनों में उनके प्रति अभी भी मोह कम नहीं हुआ है। ऐसे लोग यही कहते नज़र आएंगे कि ‘हमारे गुरु जी को ग़लत फंसाया गया है। ‘ मर्द भक्तों की तो छोड़िये महिलाएं भी ऐसे बलात्कारी बाबाओं की भक्ति व उनके महिमामंडन में सबसे आगे नज़र आती हैं। और अब तो संभवतः ऐसे बलात्कारी बाबाओं के महिमामंडन से ही प्रेरणा लेकर धार्मिकता का चोला पहने या धार्मिक संगठनों एवं धर्म के नाम पर अन्य रसूख़दार बलात्कारियों की भी ‘शोभा यात्रा ‘ निकाली जाने लगी है। बलात्कार की शिकार लड़की का धर्म देखकर बलात्कारियों की पैरवी की जाने लगी है। क्या ऐसा कर अपराधियों को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है?
3 मार्च 2002 की गुजरात अहमदाबाद के नज़दीक रणधीकपुर गाँव में की वह भयानक घटना कौन भूल सकता है जिसमें मुस्लिम समाज की 21 वर्षीय युवती बिल्क़ीस बानो जोकि उस समय 5 महीने की गर्भवती भी थीं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था ? बिलक़ीस बानो के परिवार के 14 सदस्यों की हत्या भी कर दी गई थी जिसमें बिलक़ीस की 3 वर्ष की मासूम बेटी भी शामिल थी । इस मामले में मुंबई में सीबीआई की विशेष अदालत ने 11 आरोपियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्यारों बलात्कारियों की दोषसिद्धि को बरक़रार रखा था । परन्तु गुजरात सरकार ने अपनी क्षमा नीति के तहत 11 दोषियों की रिहाई की मंज़ूरी दे दी और 15 अगस्त 2022 को ही दोषियों को रिहा कर दिया। अफ़सोस की बात यह कि इनकी रिहाई के बाद दोषियों का जेल के बाहर ही इनके समर्थकों द्वारा मिठाई खिलाकर स्वागत किया गया । जगह जगह मिठाई बांटी गयी व उनके जयकारे लगाकर उनका स्वागत किया गया । गुजरात के दाहोद ज़िले में तो वहां के लोगों ने दोषियों की ‘शोभा यात्रा ‘ निकाली और बलात्कारियों हत्यारों का खुला समर्थन किया । आख़िरकार 7 जनवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के दोषियों की समय पूर्व रिहाई के फ़ैसले को पलट दिया और उन्हें जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया । गोया हत्यारों बलात्कारियों के साथ हमदर्दी जताने के चलते सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुजरात सरकार को नीचा देखना पड़ा।
इसी तरह कश्मीर के कठुआ में जनवरी 2018 में एक 8 वर्षीय मुस्लिम लड़की आसिफ़ा बानो के साथ एक मंदिर के कमरे में पुजारी व उसके कई साथियों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया था और उसकी हत्या कर लाश जंगलों में फेंक दी गयी थी। उस समय भी इन अपराधियों के समर्थन में हिंदूवादियों द्वारा तिरंगा यात्रा निकाली गई थी और भाजपा के दो मंत्रियों ने आरोपियों का समर्थन किया था और बलात्कारियों के समर्थन में होने वाले धरना प्रदर्शनों व रैलियों में हिस्सा लिया था जिससे उस समय बड़ा राजनैतिक बवाल खड़ा हुआ था। इस घटना ने पूरे देश को भावुक कर दिया था। आम आदमी से लेकर बॉलीवुड स्टार तक बच्ची को इंसाफ़ दिलाने के लिए सामने आए थे। बाद में अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुये इन्हीं 5 आरोपियों को दोषी ठहराते हुये जेल भेजा था। इसी तरह कई मामलों में जब किसी दलित लड़की के साथ किसी कथित उच्च जाति के लोगों द्वारा बलात्कार किया गया तो बलात्कारियों के पक्ष में उसके ‘कथित ‘उच्च समाज के लोग खड़े देखे गये। 14 सितंबर 2020 को हाथरस में एक दलित युवती के साथ हुआ सामूहिक दुष्कर्म एवं हत्याकाण्ड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस समय यह घटना भी एक अत्यंत संवेदनशील और देशव्यापी चर्चा का विषय बन गयी थी।
और अब यही दुष्प्रवृति धर्म जाति से मुक्त होकर शायद आम बन चुकी है। ग़ाज़ियाबाद के मुरादनगर में हिंदू युवा वाहिनी के निवर्तमान नगर अध्यक्ष सुशील प्रजापति जिसपर अगस्त 2025 में एक क़ानून की पढ़ाई पढ़ने वाली हिन्दू छात्रा के साथ रेप का आरोप था,जब लगभग 9 महीने जेल में रहने के बाद 17 मई 2026 को ज़मानत पर छूटा तो जेल से छूटते ही उसके समर्थकों ने बाक़ायदा उसकी शान में गाड़ियों से विजय जुलूस निकाला। और उसके समर्थन में नरेबाज़ियाँ कीं। समर्थकों ने उसे माला पहनाई और फूल बरसाए। उसे कंधे पर बैठा लिया गया। उसके समर्थक “वी” साइन दिखाते और घटनाक्रम को मोबाइल में रिकॉर्ड करते नज़र आए। बाद में इस शर्मनाक घटना की सर्वस्व निंदा होने पर पुलिस ने जुलूस निकालने पर आरोपी और उसके समर्थकों पर मामला दर्ज किया। इस घटना ने भी उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर राज्य में भाजपा का सहयोगी सत्तासीन संगठन हिंदू युवा वाहिनी की नैतिकता और “बहनों की सुरक्षा” के दावे पर सवाल उठे थे। ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण में पूरे देश के लिये ख़ासकर देश की मां बहनों के लिये यह सोचना अनिवार्य हो गया है कि हत्यारों व बलात्कारियों के बहिष्कार करने के बजाये आख़िर इन का सम्मान करने वाला हम कैसा ‘अद्भुत समाज’ तैयार कर रहे हैं।





