राम के नाम पर लूट है लूट सके तो लूट, देरी करेगा तो पीछे जाएगा छूट

It is a free-for-all in the name of Ram—loot all you can; hesitate, and you will be left behind

ओ पी उनियाल

राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट, अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट’। संत कबीरदास का यह दोहा सबने सुना ही होगा पढ़े-लिखे लोगों ने पढ़ा भी होगा। वैसे भी दूसरों को सीख और ग्यान देने वालों के मुखारबिंदु से प्रवचन के तौर पर तो कई बार सुनने का अवसर भी मिलता ही होगा। संत कबीरदास ने जिस भाव से यह दोहा रचा था उसका अनुसरण तो न जाने किसने किया होगा, कौन करता होगा, कौन करेगा यह तो कोई नहीं बता पाएगा क्योंकि यह व्यक्तिगत भावना का मामला है।
आज ‘राम के नाम पर लूट है लूट सके तो लूट, देरी करेगा तो पीछे जाएगा छूट’। तात्पर्य तो सभी समझ ही गए होंगे। एक कहावत भी है न ‘समझदार को इशारा काफी’।

राम हिन्दुओं के आराध्य हैं। घर-घर पूजे जाते हैं। उनकी जीवन लीला का मंचन होता है। हमारे आदर्श, प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक एवं पवित्रता के द्योतक हैं फिर उनके मंदिर में चढ़ावे को लेकर आरोप-प्रत्यारोपों की खिचड़ी क्यों पकी? राम के नाम का जो भी चढ़ावा है उनको समर्पित है। उसका सही उपयोग होना चाहिए।

हालांकि, जगह-जगह हरेक देवी-देवताओं के छोटे-बड़े अनगिनत मंदिर हैं। अधिकतर की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। पहले तो उनकी समिति बनती हैं धीरे-धीर चंदे व अन्य चढ़ावे को लेकर आपसी मतभेद उभरने लगते हैं। मंदिर कहीं भी हों जबरन चंदा वसूली का ढर्रा नहीं होना चाहिए। जिसकी जितनी सामर्थ्य या स्वेच्छा हो तद्नुरूप योगदान होना चाहिए। अक्सर समिति बनती है फिर चंदा वसूली होती है और नौबत चंदा विवाद की बन आती है।

ईश्वर एक है, नाम ही तो अलग-अलग हैं। नाम की गरिमा बनाए रखना ही भक्ति का एक मार्ग है।