जयदेव राठी
राम की शरण में राजनीति का भविष्य
हाल के विधानसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक गहरी सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचल को उजागर किया है। “जो राम का नहीं हुआ, उसकी लंका लगना तय है” वाली लोकप्रिय उक्ति इन परिणामों में प्रतीकात्मक रूप से साकार होती दिख रही है। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों में मतदाताओं ने स्पष्ट संकेत दिया है कि विभाजनकारी, नकारात्मक और सनातन संस्कृति पर प्रश्न उठाने वाली राजनीति अब स्वीकार्य नहीं रही। जो नेता या दल राम को प्रतीक मानकर राष्ट्रहित, सांस्कृतिक गौरव और समावेशी विकास की राह पर चले, वे सफल हुए, जबकि विरोध की राह चुनने वालों को करारी हार का सामना करना पड़ा। असम में हेमंत बिस्वा शर्मा की अगुवाई वाली भाजपा-नीत एनडीए गठबंधन ने दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर तीसरी बार सत्ता कायम की। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए शर्मा ने अवैध घुसपैठ नियंत्रण, आर्थिक विकास और स्थानीय हितों की रक्षा पर जोर दिया। उनका व्यक्तिगत प्रदर्शन और पार्टी की सफलता विकास और सांस्कृतिक संतुलन की राजनीति का उदाहरण बन गई। वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की 15 वर्षीय सत्ता का अंत हो गया। भाजपा ने 200 से अधिक सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। ममता बनर्जी अपनी भबानीपुर सीट पर सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। तमिलनाडु में एमके स्टालिन अपनी कोलाथुर सीट पर हारे और उनकी पार्टी डीएमके पिछड़ गई, जबकि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल अपनी न्यू दिल्ली सीट गंवा बैठे और आप की सत्ता चली गई।ये परिणाम संयोग नहीं हैं। इनमें एक स्पष्ट पैटर्न दिखता है। जिन दलों ने राम को काल्पनिक बताने, सनातन धर्म पर हमला करने या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राह अपनाई, जनता ने उन्हें नकार दिया। कांग्रेस लंबे समय से राम मंदिर का विरोध करती रही और राहुल गांधी जैसे नेताओं ने विदेशी मंचों पर राम को पौराणिक आकृति करार दिया। ममता बनर्जी ने ध्रुवीकरण की चरम राजनीति की एक भाषण में “अल्लाह की कसम” और “काफिर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर विभाजन को बढ़ावा दिया। नतीजा यह कि उनकी अपनी सीट चली गई और पार्टी भारी हार का शिकार हुई। स्टालिन परिवार ने सनातन धर्म को “मलेरिया-डेंगू” जैसा बताकर जड़ से उखाड़ने की बात की और हिंदी विरोध को तेज किया। परिणामस्वरूप स्टालिन खुद अपनी सीट हार गए।
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का हाल भी कुछ अलग नहीं। केजरीवाल ने राम मंदिर को ‘वोटबैंक’ कहा और दिल्ली में ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर हिंदू विरोधी नीतियां अपनाईं। विधानसभा चुनाव में आप हारी, और केजरीवाल खुद अपनी ही सीट से हार गए। उनका बयान, “राम काल्पनिक हैं, विकास ही धर्म है,” हिंदू मतदाताओं को भड़काने वाला था। भाजपा ने दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी झाड़ू लगा दी। केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति, जैसे केंद्र सरकार को ‘तानाशाह’ कहना, देशविरोधी साबित हुई, और भ्रष्टाचार के आरोपों, शासन विफलताओं और नकारात्मक छवि ने उन्हें सत्ता से दूर कर दिया। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और पीडीए फॉर्मूले पर अड़ी हुई है। सनातन संस्कृति पर बार-बार सवाल उठाने की रणनीति 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों में जोखिम भरी साबित हो सकती है। इन सभी दलों की एक समानता रही, वे राम और सनातन को या तो नकारते रहे या राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे। जनता ने इसका करारा जवाब दिया है।
क्या यह हिंदू जागरण का संकेत है? आंशिक रूप से हां। राम मंदिर आंदोलन, सांस्कृतिक गौरव और पहचान की राजनीति ने बहुसंख्यक समुदाय को एकजुट किया है। भारत की लगभग 80 प्रतिशत हिंदू आबादी में सांस्कृतिक आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन इसे केवल धार्मिक जागरण तक सीमित करना गलत होगा। विकास, शासन प्रदर्शन, भ्रष्टाचार विरोध और क्षेत्रीय मुद्दे भी निर्णायक रहे। असम में शर्मा की घुसपैठ विरोधी नीतियां, बंगाल में टीएमसी की हिंसा और भ्रष्टाचार की छवि, तमिलनाडु में स्टालिन सरकार की चुनौतियां, ये सब कारक काम कर गए। जनता का संदेश साफ है: नकारात्मक और देश-विरोधी राजनीति अब नहीं चलेगी।
ममता बनर्जी के “काफिर” वाले बयान, उद्धयनिधि स्टालिन का सनातन पर हमला, कांग्रेस का राम मंदिर विरोध और डीएमके की द्रविड़ अलगाववादी विरासत, इन सबने “एंटी-हिंदू” छवि बनाई। जबकि भाजपा ने “सबका साथ, सबका विकास” के साथ सनातन मूल्यों को मुख्यधारा में लाया।
हेमंत बिस्वा शर्मा जैसे नेताओं का कांग्रेस से भाजपा जाना और सफलता इसी का प्रतीक है। फिर भी, भारतीय चुनाव बहुआयामी हैं। आर्थिक मुद्दे जैसे बेरोजगारी और महंगाई विपक्ष को मौका दे सकते हैं। अल्पसंख्यक वोट एक तरफा विपक्ष को जाता रहा, लेकिन हिंदू वोटों का एकीकरण निर्णायक साबित हुआ। विपक्षी गठबंधनों में एकता की कमी और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं भी उनकी कमजोरी बनीं। भाजपा को सत्ता में अहंकार से बचना होगा, अन्यथा असफलता का खतरा है। रामायण की कथा में राम विजयी हुए क्योंकि वे धर्म, न्याय और प्रजा-हित पर अडिग रहे। आज की राजनीति में भी यही सूत्र काम कर रहा दिखता है। जो दल सनातन को शत्रु मानते हैं या राम को नकारते हैं, उन्हें अपनी रणनीति बदलनी होगी। देशहित, सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान और समावेशी विकास ही सफलता की कुंजी है। हाल के चुनावों से जो सबसे स्पष्ट संकेत मिलता है, वह यह है कि जनता अब “नकारात्मक राजनीति” से थक चुकी है। केवल विरोध या विभाजन की राजनीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रहती। जनता उन नेताओं को प्राथमिकता देती है जो स्पष्ट दृष्टि, मजबूत नेतृत्व और ठोस काम दिखा सकें। यह भी सच है कि राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक गर्व और धार्मिक प्रतीक अब राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन अंततः मतदाता यह देखता है कि उसकी जिंदगी में क्या बदलाव आया।
जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि विभाजन की लंका जलनी तय है, जबकि एकता और विकास की अयोध्या फल-फूल रही है। सभी राजनीतिक दलों को इस सबक से सीख लेनी चाहिए—राष्ट्रहित सर्वोपरि, सत्ता उसकी सेवा में मिलती है।
इन चुनाव परिणामों का निष्कर्ष एक ही है, भारत का हिंदू मतदाता अब जागरूक है, संगठित है और दीर्घकालीन स्मृति से संपन्न है। वह उन नेताओं को याद रखता है जिन्होंने उसकी आस्था को तिरस्कृत किया, उसके देवताओं को काल्पनिक कहा, उसके धर्म को रोग की उपमा दी। जनतंत्र में मतपेटी ही अंतिम न्यायालय है और इस न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुना दिया है। अब जो भी राजनीति में सत्ता चाहता है, उसे जनभावनाओं का, राष्ट्रीय अस्मिता का और सनातन संस्कृति का सम्मान करना ही होगा। जो राम का नहीं होगा, उसकी लंका लगना तय है, यह कोई भविष्यवाणी नहीं, यह भारत की जनता का स्पष्ट जनादेश है।





