डॉ. सत्यवान सौरभ
योग एक प्राचीन भारतीय अनुशासन से विकसित होकर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के एक शक्तिशाली साधन के रूप में उभरा है। यह कथन न केवल योग की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित करता है, बल्कि समकालीन वैश्विक परिदृश्य में सांस्कृतिक कूटनीति की भूमिका को भी उजागर करता है, विशेषकर एक तेजी से विभाजित होती दुनिया में जहां वैश्विक विश्वास और सामाजिक एकजुटता की कमी गंभीर चुनौती बन चुकी है। योग की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक अवशेषों से लेकर उपनिषदों और पतंजलि के योगसूत्र तक जाती है, जहां इसे मन, शरीर और आत्मा के समन्वय का विज्ञान माना गया। प्राचीन काल में योग आध्यात्मिक साधना का माध्यम था, लेकिन आधुनिक युग में यह शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवनशैली का अभिन्न अंग बन गया। स्वामी विवेकानंद ने 1893 के शिकागो धर्म संसद में योग को पश्चिमी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया, जिससे इसकी वैश्विक स्वीकार्यता की नींव पड़ी। फिर भी, वास्तविक परिवर्तन तब आया जब 21 जून को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया, जिसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्ताव था। इस निर्णय ने योग को मात्र एक व्यायाम न बनाकर सांस्कृतिक राजदूत का रूप प्रदान किया। आज योग 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है, जो भारत की सॉफ्ट पावर को प्रमाणित करता है। सॉफ्ट पावर, जो जोसेफ नाई ने परिभाषित की, आकर्षण और प्रभाव के माध्यम से प्रभाव डालने की क्षमता है, न कि बल प्रयोग से। भारत के संदर्भ में योग इसकी परिपूर्ण अभिव्यक्ति है, क्योंकि यह बिना किसी विवाद के वैश्विक स्तर पर अपनाया गया। उदाहरणस्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका में योग उद्योग 16 बिलियन डॉलर का है, जबकि यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में यह स्वास्थ्य नीतियों का हिस्सा बन चुका है। यह न केवल आर्थिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि भारत की छवि को शांतिप्रिय, समावेशी और प्राचीन ज्ञान का भंडार के रूप में स्थापित करता है।
सांस्कृतिक कूटनीति सॉफ्ट पावर का मूल आधार है, जो राज्य और समाज के बीच पुल का कार्य करती है। यह कूटनीति पारंपरिक राजनयिक वार्ताओं से परे जाती है और संस्कृति, कला, संगीत, नृत्य तथा जीवन दर्शन के माध्यम से संबंधों को गहरा करती है। एक तेजी से विभाजित दुनिया में, जहां भू-राजनीतिक तनाव जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, मध्य पूर्व की अस्थिरता और घरेलू स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, सांस्कृतिक कूटनीति एकमात्र ऐसा माध्यम है जो वैचारिक सीमाओं को पार कर सकता है। वैश्विक विश्वास का संकट आज चरम पर है। प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वेक्षण बताते हैं कि बहुसंख्यक देशों में अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर भरोसा घटा है, जबकि सोशल मीडिया जनित फेक न्यूज ने विभाजन को और गहरा किया है। ऐसे में सांस्कृतिक कूटनीति साझा मानवीय मूल्यों को पुनर्स्थापित करती है। योग इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के आयोजनों में विविध संस्कृतियों के लोग एक साथ आसन करते हैं, जो सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रमों से लेकर टाइम्स स्क्वायर की सड़कों तक, योग ने विभाजित समाजों को जोड़ा है। भारत ने इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (ICCR) के माध्यम से योग केंद्र स्थापित किए हैं, जो न केवल प्रशिक्षण देते हैं बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करते हैं। नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में योग ने ऐतिहासिक बंधनों को मजबूत किया, जबकि यूरोपीय संघ के देशों में यह तनावग्रस्त जीवनशैली के समाधान के रूप में लोकप्रिय हुआ।
योग की सफलता सांस्कृतिक कूटनीति के तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है: समावेशिता, सार्वभौमिकता और दीर्घकालिक प्रभाव। समावेशिता इसलिए क्योंकि योग किसी धर्म या जाति से बंधा नहीं; यह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी के लिए है। अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी समुदायों ने योग को सामाजिक न्याय आंदोलन से जोड़ा, जबकि मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में इसे इस्लामी ध्यान प्रक्रियाओं के साथ संयोजित किया गया। सार्वभौमिकता योग के दर्शन में निहित है – ‘वसुधैव कुटुंबकम’। यह संदेश कोविड-19 महामारी के दौरान विशेष रूप से प्रासंगिक साबित हुआ, जब भारत ने ‘योग फॉर वेलनेस’ अभियान चलाकर वैश्विक स्वास्थ्य संकट से जूझते देशों को जोड़ा। ऑनलाइन योग सत्रों ने लाखों लोगों को घरों तक पहुंचाया, जो सांस्कृतिक कूटनीति का डिजिटल रूप था। दीर्घकालिक प्रभाव योग के माध्यम से युवा पीढ़ी पर पड़ता है। विश्वविद्यालयों में योग कोर्सेस, स्कूलों में पाठ्यक्रम और कॉर्पोरेट वेलनेस प्रोग्राम्स ने इसे जीवन का हिस्सा बना दिया। फ्रांस में यूनेस्को की मान्यता प्राप्त योग संस्थान और जर्मनी के योग महोत्सव इसका प्रमाण हैं। ये प्रयास न केवल विश्वास निर्माण करते हैं बल्कि सामाजिक एकजुटता को भी बढ़ाते हैं। विभाजित दुनिया में, जहां आर्थिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अलगाव बढ़ रहा है, योग जैसे तत्व सहिष्णुता सिखाते हैं। उदाहरण के लिए, इजरायल-फिलिस्तीन तनाव के बीच तेल अवीव में आयोजित योग सत्रों ने शांति का संदेश दिया। इसी प्रकार, अफ्रीकी देशों में योग ने गरीबी और स्वास्थ्य असमानताओं से निपटने में सहायता की।
भारत की सॉफ्ट पावर रणनीति में योग केंद्रीय है। पिछले दशक में भारत ने सॉफ्ट पावर इंडेक्स में अपनी रैंकिंग सुधारी है, जहां योग, आयुर्वेद और बॉलीवुड प्रमुख घटक हैं। जी-20 शिखर सम्मेलनों में योग सत्रों ने मेजबान देशों को प्रभावित किया। 2023 के दिल्ली जी-20 में अफ्रीकी संघ की सदस्यता के साथ योग ने वैश्विक दक्षिण को एकजुट किया। सांस्कृतिक कूटनीति ने भारत को ‘विश्व गुरु’ के रूप में पुनर्स्थापित किया। ब्रिटिश काउंसिल और गोएथे इंस्टीट्यूट जैसे पश्चिमी मॉडल्स के विपरीत, भारत का मॉडल अधिक समग्र है। मिशन सूर्योदय जैसे कार्यक्रमों ने 100 देशों में सूर्य नमस्कार को प्रोत्साहित किया, जो पर्यावरणीय जागरूकता से जुड़ा। यह प्रयास जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर एकजुटता दिखाते हैं। हालांकि चुनौतियां हैं – वाणिज्यीकरण से योग का आध्यात्मिक स्वरूप कमजोर हो रहा है, पश्चिमी अनुकूलन में मूल तत्व खो रहे हैं। फिर भी, भारत सरकार की नीतियां जैसे आयुष मंत्रालय और मंत्रालय ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स के संयुक्त प्रयास इनका समाधान कर रहे हैं।
तेजी से विभाजित दुनिया में सांस्कृतिक कूटनीति की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद ध्रुवीकरण, यूरोपीय संघ की आंतरिक दरारें और एशिया में सीमा विवादों ने विश्व को खंडित किया है। ऐसे में सांस्कृतिक कूटनीति हार्ड पावर के पूरक के रूप में कार्य करती है। यूनेस्को के अनुसार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान शांति निर्माण का 70% हिस्सा है। योग ने इसे साकार किया। संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी के योग केंद्र ने भारतीय प्रवासियों और स्थानीय अरबों को जोड़ा। चीन में, जहां हिंदू-चीन तनाव है, योग चिकित्सा केंद्र लोकप्रिय हैं। यह वैश्विक विश्वास को पुनर्स्थापित करता है। सामाजिक एकजुटता के लिए योग मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि अवसाद और चिंता वैश्विक महामारी हैं; योग का समाधान वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है। अध्ययनों से पता चलता है कि नियमित योग हार्मोनल संतुलन बनाए रखता है, जो तनावग्रस्त समाजों में एकजुटता लाता है। भारत ने इसे डिप्लोमेसी टूल बनाया – क्वाड देशों में संयुक्त योग कार्यक्रमों ने सामरिक साझेदारी को सॉफ्ट एज प्रदान किया।
अंततः, योग सांस्कृतिक कूटनीति का प्रतीक है जो विभाजित दुनिया को जोड़ता है। यह न केवल भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है बल्कि मानवता को साझा धागे से बांधता है। भविष्य में, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और वर्चुअल रियलिटी के माध्यम से योग की पहुंच और बढ़ेगी। भारत को इसे मूल रूप में संरक्षित रखते हुए वैश्विक एकजुटता का नेतृत्व करना चाहिए। यह यात्रा प्राचीन ऋषियों से शुरू होकर वैश्विक नागरिकों तक पहुंची है, जो सांस्कृतिक कूटनीति की विजय है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)





