अब नाम नहीं, काम चलेगा: कर्नाटक से कांग्रेस का सशक्त संदेश

No more names, just actions: Congress's powerful message from Karnataka

दिलीप कुमार पाठक

कांग्रेस पार्टी आजकल जिस तरह धड़ाधड़ और कड़े फैसले ले रही है, उसकी जरूरत उसे बहुत पहले से थी। राजनीति का एक सीधा नियम है – जो नेता वक्त की चाल को नहीं समझ पाता, वो धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है। हाल के दिनों में कांग्रेस आलाकमान ने जो फैसले लिए हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि अब पार्टी में कोई भी नेता संगठन से बड़ा नहीं है। यह बदलाव कांग्रेस के उन आम कार्यकर्ताओं के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है, जो जमीन पर रहकर दिन-रात मेहनत करते हैं। एक पुराना दौर था जब कांग्रेस में फैसले लेने में बहुत देर लगाई जाती थी। बड़े नेताओं की जिद के आगे आलाकमान को झुकना पड़ता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजस्थान का उदाहरण सबके सामने है, पार्टी कभी अशोक गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसा सबसे बड़ा और सम्मानजनक पद देना चाहती थी। लेकिन उस समय उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का मन नहीं था। उन्होंने वक्त की मांग को नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि समय बदला और आज उन्हें संगठन में एक महासचिव बनने के लिए भी कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। राजनीति का यही दस्तूर है – जो समय की कद्र नहीं करता, समय उसकी कद्र नहीं करता।

अशोक गहलोत और कमलनाथ जैसे पुराने नेताओं के लिए यह संभल जाने का आखिरी मौका है। इन बड़े नेताओं को अब यह बात समझ लेनी चाहिए कि अपनी जिद छोड़कर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाना ही असली समझदारी है। दूसरी तरफ, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या ने पूरे देश के नेताओं के सामने एक बहुत सुंदर मिसाल पेश की है, उन्होंने उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार को को गले लगा कर आशीर्वाद दिया और एलान किया कि अगले मुख्यमंत्री होंगे, ये होता है पार्टी के लिए अनुशासन आज वे सिर्फ अपने राज्य के नहीं, बल्कि पूरे देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के चहेते नेता बन गए हैं। जब भी पार्टी पर कोई मुश्किल आई या आलाकमान ने कोई कड़ा फैसला सुनाया, सिद्धरमैय्या ने हमेशा पार्टी की बात को ऊपर रखा। उन्होंने अपनी निजी इच्छाओं को किनारे रखकर संगठन को मजबूत करने का काम किया। यही वजह है कि आज पूरी पार्टी में उनका मान-सम्मान बहुत बढ़ गया है।

उत्तर भारत के कांग्रेस नेताओं को इस बात से बहुत कुछ सीखना चाहिए। सच कहें तो दक्षिण भारत की राजनीति ने उत्तर के नेताओं को हमेशा एक नया आईना दिखाया है। इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस पार्टी पर कोई बड़ा संकट आया है, दक्षिण भारत ने हमेशा उसे सहारा दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने से लेकर आज के दौर तक, दक्षिण के नेताओं ने पार्टी को मुश्किल दिनों से निकाला है। आज मल्लिकार्जुन खड़गे और सिद्धरमैय्या जैसे नेता जिस तरह सूझबूझ से काम कर रहे हैं, वह उत्तर भारत के बड़े-बड़े क्षत्रपों के लिए एक बड़ा सबक है। कांग्रेस का यह नया रूप बता रहा है कि अब सिर्फ पुरानी साख या बड़े नाम के भरोसे मलाईदार पद मिलने के दिन चले गए हैं। अब पार्टी में उसी को तवज्जो मिलेगी जो जमीन पर पसीना बहाएगा और अनुशासन में रहेगा। यह बदलाव पार्टी के उन लाखों कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक रहा है जो सालों से बिना किसी स्वार्थ के झंडा उठा रहे हैं। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की जोड़ी ने यह साफ संदेश दे दिया है कि अब कड़े फैसले लेने में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। इस बदलते हुए दौर की कांग्रेस में अब भावुकता की जगह काम को देखा जा रहा है। पुरानी वफादारी का सम्मान जरूर है, लेकिन पार्टी को कमजोर करने की छूट अब किसी को नहीं मिलेगी। समय रहते अगर पुराने और वरिष्ठ नेता इस सच्चाई को स्वीकार कर लें, तो इसी में उनका सम्मान बचा रहेगा और इसी में कांग्रेस पार्टी का फायदा भी है।