केवल औपचारिक प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है बल्कि मन की शुद्धि और भगवत स्मरण आवश्यक~ पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट
उदयपुर : उदयपुर के सुप्रसिद्ध जगदीश मंदिर में पुरूषोत्तम मास के बाहरवें दिन व्यास पीठ से श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कन्ध के प्रथम अध्याय का वाचन करते हुए पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने कहा है कि मनुष्य बार-बार पाप करता है और फिर प्रायश्चित्त कर लेता है, लेकिन इसे वास्तविक शुद्धि नहीं कहा जा सकता। वास्तविक प्रायश्चित्त तो आत्मज्ञान,इन्द्रियों पर नियंत्रण,तप,सत्संग और सबसे बढ़कर भगवान की भक्ति में ही निहित है ।
पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने कहा कि केवल बाहरी प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है। यदि मनुष्य का मन और बुद्धि शुद्ध नहीं होती, तो वह फिर पाप की ओर आकर्षित हो जाता है। उन्होंने कहा कि जैसे हाथी स्नान करके फिर धूल में लोट जाता है, वैसे ही केवल औपचारिक प्रायश्चित्त करने वाला व्यक्ति पुनः पाप में पड़ सकता है।
भट्ट ने स्पष्ट किया कि भगवान के नाम का स्मरण सबसे महान प्रायश्चित्त है। भगवान का नाम मनुष्य के हृदय को भीतर से शुद्ध कर देता है। उसमें भी केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति से किया गया नाम-स्मरण ही जीव को पापों से मुक्त कर सकता है।संत और भक्तजन अपने सदाचार, संयम और भक्ति से समाज को सही मार्ग दिखाते हैं। उनके संग से मनुष्य का जीवन बदल सकता है।
पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने बताया कि श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध का प्रथम अध्याय मुख्य रूप से पाप, प्रायश्चित्त और भगवान के नाम की महिमा का वर्णन करता है। इस अध्याय में राजा परीक्षित और श्री शुकदेव जी के बीच संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि मनुष्य अपने पापों से कैसे मुक्त हो सकता है। उन्होंने अजामिल की कथा की भूमिका और उसका वर्णन भी किया , जिसमें भगवान के नाम की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण मिलता है।
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य जीवन में केवल औपचारिक प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है बल्कि मन की शुद्धि आवश्यक है। भगवान के नाम का स्मरण सर्वोच्च प्रायश्चित्त है और भक्ति और सत्संग से जीवन का वास्तविक परिवर्तन संभव है।
उदयपुर के सुप्रसिद्ध जगदीश मंदिर में बारी बारी से व्यास पीठ से इस बार कथा वाचन कर रहें पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने इससे पूर्व भी कई बार श्रीमद्भागवत महापुराण का वाचन किया है। उनकी परमम्परागत ढंग से बहुत ही सरलता और सहजता से और कथा का विस्तार से वर्णन के साथ की जा रही कथा को सुनने बड़ी संख्या में प्रतिदिन महिलाये बुजुर्ग और युवा युवतियां आ रही है ।
केवल औपचारिक प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है बल्कि मन की शुद्धि और भगवत स्मरण आवश्यक~ पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट
उदयपुर ।28 मई 26। उदयपुर के सुप्रसिद्ध जगदीश मंदिर में पुरूषोत्तम मास के बाहरवें दिन व्यास पीठ से श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कन्ध के प्रथम अध्याय का वाचन करते हुए पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने कहा है कि मनुष्य बार-बार पाप करता है और फिर प्रायश्चित्त कर लेता है, लेकिन इसे वास्तविक शुद्धि नहीं कहा जा सकता। वास्तविक प्रायश्चित्त तो आत्मज्ञान,इन्द्रियों पर नियंत्रण,तप,सत्संग और सबसे बढ़कर भगवान की भक्ति में ही निहित है ।
पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने कहा कि केवल बाहरी प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है। यदि मनुष्य का मन और बुद्धि शुद्ध नहीं होती, तो वह फिर पाप की ओर आकर्षित हो जाता है। उन्होंने कहा कि जैसे हाथी स्नान करके फिर धूल में लोट जाता है, वैसे ही केवल औपचारिक प्रायश्चित्त करने वाला व्यक्ति पुनः पाप में पड़ सकता है।
भट्ट ने स्पष्ट किया कि भगवान के नाम का स्मरण सबसे महान प्रायश्चित्त है। भगवान का नाम मनुष्य के हृदय को भीतर से शुद्ध कर देता है। उसमें भी केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति से किया गया नाम-स्मरण ही जीव को पापों से मुक्त कर सकता है।संत और भक्तजन अपने सदाचार, संयम और भक्ति से समाज को सही मार्ग दिखाते हैं। उनके संग से मनुष्य का जीवन बदल सकता है।
पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने बताया कि श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध का प्रथम अध्याय मुख्य रूप से पाप, प्रायश्चित्त और भगवान के नाम की महिमा का वर्णन करता है। इस अध्याय में राजा परीक्षित और श्री शुकदेव जी के बीच संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि मनुष्य अपने पापों से कैसे मुक्त हो सकता है। उन्होंने अजामिल की कथा की भूमिका और उसका वर्णन भी किया , जिसमें भगवान के नाम की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण मिलता है।
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य जीवन में केवल औपचारिक प्रायश्चित्त पर्याप्त नहीं है बल्कि मन की शुद्धि आवश्यक है। भगवान के नाम का स्मरण सर्वोच्च प्रायश्चित्त है और भक्ति और सत्संग से जीवन का वास्तविक परिवर्तन संभव है।
उदयपुर के सुप्रसिद्ध जगदीश मंदिर में बारी बारी से व्यास पीठ से इस बार कथा वाचन कर रहें पण्डित जितेन्द्र मोहन भट्ट ने इससे पूर्व भी कई बार श्रीमद्भागवत महापुराण का वाचन किया है। उनकी परमम्परागत ढंग से बहुत ही सरलता और सहजता से और कथा का विस्तार से वर्णन के साथ की जा रही कथा को सुनने बड़ी संख्या में प्रतिदिन महिलाये बुजुर्ग और युवा युवतियां आ रही है ।





