अजय कुमार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की गरमा गरमी के बीच भारतीय जनता पार्टी ने पूर्वांचल में संगठन मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने आलाकमान से विचार-विमर्श के बाद पूर्वांचल के पांच जिलों अंबेडकरनगर, वाराणसी, चंदौली, गोरखपुर महानगर और देवरिया के नए जिलाध्यक्षों की घोषणा कर दी है। इस घोषणा में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को पूरी तरह ध्यान में रखा गया है। दो जिलों में ओबीसी, एक में दलित, एक में वैश्य और एक में क्षत्रिय चेहरे को जिम्मेदारी सौंपकर भाजपा ने सामाजिक संतुलन साधने का स्पष्ट संदेश दिया है। नये जिलाध्यक्षों का बारीकी से आकलन किया जाये तो बीजेपी की 2027 के विधान सभा चुनाव के लिये रणनीति साफ नजर आती है। समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की काट के लिये बीजेपी पीडीवी(पिछड़ा-दलित-वैश्य) वाला वोट बैेंक तैयार कर रही है।
अंबेडकरनगर में भाजपा ने दिलीप देव पटेल को नया जिलाध्यक्ष बनाया है। पहले यहां त्रयंबक त्रिपाठी जिलाध्यक्ष थे। दिलीप देव पटेल को संगठन में लंबे अनुभव और ओबीसी समाज में मजबूत पकड़ के चलते जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी इसे सामाजिक संतुलन और संगठन विस्तार के लिहाज से अहम मान रही है। गोरखपुर महानगर में रमेश कुमार गुप्ता को जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी गई है। देवेश श्रीवास्तव के निधन के बाद यह पद खाली चल रहा था। पूर्व महानगर अध्यक्ष राजेश गुप्ता महानगर संयोजक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। रमेश कुमार गुप्ता को जिम्मेदारी देकर भाजपा ने वैश्य समाज को साधने का स्पष्ट संदेश दिया है। गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, इसलिए यहां संगठन की कमान मजबूत और अनुभवी चेहरे को सौंपना पार्टी की रणनीति का हिस्सा है।
देवरिया में भाजपा ने काली प्रसाद को नया जिलाध्यक्ष बनाया है। इससे पहले यह जिम्मेदारी भूपेन्द्र सिंह के पास थी। पार्टी ने दलित समाज से आने वाले चेहरे पर भरोसा जताकर सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश की है। संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण काली प्रसाद को जमीनी कार्यकर्ता के रूप में पहचान मिली हुई है। वाराणसी में राम सकल पटेल को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जिन्होंने हंसराज विश्वकर्मा की जगह ली है। हंसराज विश्वकर्मा के योगी सरकार में मंत्री बनने के बाद यह पद खाली हो गया था। राम सकल पटेल लंबे समय से वाराणसी में संगठन के कार्यों से जुड़े रहे हैं और उनकी जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। चंदौली में काशीनाथ सिंह को दोबारा जिलाध्यक्ष बनाए रखा गया है। वे संगठन के पुराने और सक्रिय नेताओं में गिने जाते हैं और पार्टी नेतृत्व ने उनके अनुभव और संगठन क्षमता को देखते हुए निरंतरता बनाए रखने का फैसला किया है। नये जिलाध्यक्षों का जातीय आधार पर विश्लेषण किया जाये तो साफ लगता है कि भाजपा के नेतृत्व द्वारा नई टीम समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) गठबंधन की सीधी काट के रूप में तैयार की जा रही है। भाजपा ने जानबूझकर ओबीसी, दलित और वैश्य समाज के चेहरों को मजबूत पदों पर लाने से सपा का पीडीए वोट-बैंक कमजोर कर दिया है। अब ये समुदाय भाजपा को अपनी ओर खींचने वाले अपने चेहरे देख रहे हैं, जिससे सपा की पकड़ ढीली होगी। समाजवादी पार्टी को इस फैसले से तीन स्तर पर गहरा नुकसान हो सकता है। पहला, अंबेडकरनगर जैसे जातीय रूप से संवेदनशील जिले में ओबीसी कुर्मी चेहरा दिलीप देव पटेल आने से सपा का पिछड़ा वोट-बैंक दरक सकता है। यहाँ पहले ब्राह्मण नेता त्रयंबक त्रिपाठी जिलाध्यक्ष थे, लेकिन अब ओबीसी चेहरा आने से पिछड़े वर्ग का समर्थन भाजपा की ओर मुड़ सकता है। दूसरा, गोरखपुर महानगर जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ है,में वैश्य समाज के रमेश कुमार गुप्ता को जिम्मेदारी मिलने से सपा का व्यापारी-वैश्य वर्ग भाजपा की ओर झुक सकता है। देवेश श्रीवास्तव के निधन के बाद खाली पद पर वैश्य चेहरा लाना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। तीसरा, देवरिया में दलित चेहरे काली प्रसाद को लाने से सपा और बसपा का दलित वोट-बैंक कमजोर होगा, क्योंकि भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ता के रूप में पहचान वाले दलित नेता को चुनकर सामाजिक समीकरण मजबूत किया है।
भाजपा की यह रणनीति सपा के पीडीए गठबंधन को सीधे तौर पर चुनौती देती है। अब भाजपा ने पिछड़े, दलित और वैश्य समुदायों को अलग-अलग जिलों में नेतृत्व देकर समाजवादी पार्टी को सीमित वोट बैंक वाली पार्टी बना दिया है, जबकि भाजपा अब सामाजिक संतुलन वाला चेहरा दिखा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में अनुभवी और संगठन से जुड़े चेहरों पर भरोसा जताना भी भाजपा की मजबूत रणनीति है। वर्तमान में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिलों और महानगरों में से 83 जिलों के जिलाध्यक्षों की घोषणा कर दी है। मार्च 2025 में 68 जिलों, फरवरी 2026 में 11 जिलों और मई 2026 में अब 5 जिलों के नाम ऐलान हो चुके हैं। इसका मतलब है कि अब केवल 15 जिलों के जिलाध्यक्ष बनना बाकी हैं। इन 15 बाकी जिलों में अयोध्या, सहारनपुर, अमरोहा, शामली, बागपत, मथुरा जिला, मथुरा महानगर, और पूर्वांचल व ब्रज क्षेत्र के कुछ जिले शामिल हैं।
भाजपा की यह तैयारी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए है। पार्टी जानती है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता बनाए रखने के लिए सामाजिक गठबंधन मजबूत करना जरूरी है। ओबीसी, दलित और वैश्य समाज को अलग-अलग जिलों में नेतृत्व देकर भाजपा ने यह संदेश दे दिया है कि वे सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह रणनीति ैच् के पीडीए गठबंधन को तोड़ने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है।समाजवादी पार्टी अब इस चुनौती का सामना कैसे करती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। सपा को अपने पीडीए गठबंधन को और मजबूत करना होगा और यह साबित करना होगा कि वे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज की असली आवाज हैं। लेकिन भाजपा ने जमीनी स्तर पर जिला अध्यक्षों की नियुक्ति करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वे संगठन विस्तार और सामाजिक संतुलन पर जोर दे रहे हैं।
गौरतलब हो, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब भाजपा की पिछड़ा-दलित वाली रणनीति का प्रभाव दिखेगा। चुनावी माहौल गरम होने से पहले ही भाजपा ने संगठन मजबूत करके सपा को चुनौती दे दी है। 15 बाकी जिलों में जिलाध्यक्षों की घोषणा होने पर यह और साफ होगा कि भाजपा कहां कितनी मजबूत हो रही है। सभी 98 जिलों और महानगरों में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति पूरी होने के बाद भाजपा का संगठन 2027 चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगा। भाजपा की यह रणनीति सपा के लिए गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि भाजपा ने जानबूझकर ऐसे जिलों में चेहरे चुने हैं जहां सपा का पारंपरिक वोट बैंक है। अब सपा को यह साबित करना होगा कि वे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज की असली आवाज हैं और भाजपा की यह नियुक्ति केवल चालाकी है। लेकिन जमीनी स्तर पर ओबीसी, दलित और वैश्य नेताओं को जिम्मेदारी मिलने से सामान्य कार्यकर्ता और वोटर्स पर भाजपा का असर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 तक समय है, लेकिन भाजपा ने पहले ही अपने संगठन को मजबूत करना शुरू कर दिया है। यह रणनीति सपा के पीडीए गठबंधन को तोड़ने और अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। 15 बाकी जिलों में जिलाध्यक्षों की घोषणा होने के बाद भाजपा का संगठन पूरी तरह तैयार हो जाएगा और चुनावी मैदान में उतरने के लिए बिल्कुल तैयार हो जाएगा।





