अजीत जोगी और छत्तीसगढ़ का अधूरा इतिहास
डॉ राजाराम त्रिपाठी
- “राजनीति अपने नींव के पत्थरों को बहुत जल्दी भूल जाती है।”
- “अजीत जोगी पूरी उम्र अपनी प्रतिभा नहीं, अपनी जाति सिद्ध करते रहे।”
- “वे सदियों का काम दशकों में करना चाहते थे।”
- “जोगी पर हुआ राजनीतिक प्रहार, छत्तीसगढ़ की संभावनाओं पर भी प्रहार था।”
- “कंगूरों की चमक में छत्तीसगढ़ का एक नींव का पत्थर दब गया।”
हमारा समाज बड़ा अजब-गजब है। जब किसी भवन का निर्माण शुरू होता है तब उसकी नींव में रखे जाने वाले चार पत्थरों पर हल्दी-कुमकुम लगाया जाता है। मंत्र पढ़े जाते हैं। नारियल फोड़े जाते हैं। भूमि पूजन होता है। उस समय नींव के पत्थरों को लेकर इतनी श्रद्धा उमड़ती है मानो पूरा ब्रह्मांड उन्हीं के भरोसे टिका हो। लेकिन जैसे ही भवन खड़ा हो जाता है, समाज की नजर ऊपर उठ जाती है। फिर चर्चा केवल कंगूरों की होती है। रंग-रोगन की होती है। बालकनी की होती है। वातानुकूलित कमरों की होती है। नीचे दबे उन पत्थरों की चर्चा फिर कभी नहीं होती जिन्होंने अपना अस्तित्व मिटाकर पूरी इमारत को खड़ा किया।
राजनीति इससे भी अधिक निर्मम होती है।
वह अपने नींव के पत्थरों को बहुत जल्दी भूल जाती है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत प्रमोद कुमार जोगी शायद ऐसे ही एक “नींव के पत्थर” थे।
29 अप्रैल 1946 को एक साधारण आदिवासी अंचल में जन्मा वह बालक, जिसने आगे चलकर इंजीनियरिंग की, स्वर्णपदक प्राप्त किया, कॉलेज में अध्यापन किया, फिर आईपीएस बना, फिर आईएएस बना, संसद पहुँचा और अंततः 1 नवंबर 2000 को नवगठित छत्तीसगढ़ का प्रथम मुख्यमंत्री बना, वह कोई साधारण राजनीतिक जीव नहीं था। भारतीय राजनीति में मुख्यमंत्री तो अनेक बने। कई ऐसे भी बने जिनकी योग्यता का प्रमाणपत्र खोजने के लिए इतिहासकारों को माइक्रोस्कोप लगाना पड़ जाए। लोकतंत्र का सौंदर्य भी यही है और त्रासदी भी यही कि कभी-कभी आठवीं पास व्यक्ति भी मुख्यमंत्री बन जाता है और कभी-कभी आईएएस छोड़कर राजनीति में आया असाधारण प्रतिभा वाला व्यक्ति जीवन भर अपनी जाति सिद्ध करता रह जाता है।
अजीत जोगी होने की त्रासदी भी यही थी। काश कोई ऐसा समाज होता इसमें अजीत सिर्फ अजीत होते,, ना जोगी, ना कुछ और। जैसा कि मैं अपने गांव के स्कूल में अपने दोस्तों भक्कूराम,समदू राम,सुकमन के साथ टाटपट्टी पर बैठा राजाराम तब सोचता था जब आदिवासी छात्रों को छात्रवृत्ति विपरीत की जाती थी,, कि राजाराम के पीछे त्रिपाठी क्यों लगा दिया गया? नहीं तो मुझे भी मेरे साथियों की तरह लाल-लाल नए नोट हर महीने स्टाइपेंड के मिलते जिन्हें वे अगले इतवारी बाजार में खर्च करके तरह-तरह की चीजें खरीदते और मैं टुकुर-टुकुर देखता था। इस पक्षपात का कारण तब मुझे समझ में नहीं आता था और अब भी समझ में नहीं आता। शायद अजीत को भी सिर्फ अजीत ना हो पाने का, जौगी होने की उसे विरासत को जो अनजाने में अबोध बालक अजीत के कंधे पर डाल दी गई जिसके साथ ही उन्हें जीना था। और वे जिए भी, और जब तक जिए खूब जिए।
दरअसल छत्तीसगढ़ निर्माण के समय परिस्थितियाँ अत्यंत विषम थीं। राज्य का बंटवारा केवल नक्शे पर लकीर खींच देने का मामला नहीं था। यह संसाधनों, प्रशासनिक ढांचे, संस्थानों, जल, जंगल, जमीन और भविष्य के बंटवारे का प्रश्न था। कहा जाता है कि उस समय राजनीतिक रूप से मध्यप्रदेश की स्थिति कहीं अधिक मजबूत थी। लेने वाला हमेशा कमजोर होता है, देने वाला हमेशा शर्तें तय करता है। फिर भी अजीत जोगी ने अपनी प्रशासनिक समझ, राजनीतिक कूटनीति और असाधारण स्मरण शक्ति के बल पर जितना संभव था उससे कहीं अधिक छत्तीसगढ़ के पक्ष में हासिल करने का प्रयास किया।
अमरकंटक को लेकर दोनों राज्यों के बीच जो तनातनी हुई थी, और जिस तरह से अजीत जोगी अमरकंटक को छत्तीसगढ़ का हिस्सा साबित करने के लिए जिस तरह से बहुआयामी लड़ाई लड़े थे उसे उस दौर के लोग आज भी याद करते हैं। वह केवल पहाड़ का विवाद नहीं था, परंपराओं से जुड़े अस्तित्व तथा अस्मिता का सवाल था। लेकिन राजनीति में इतिहास उतना याद नहीं रखा जाता जितना प्रोपेगेंडा याद रखा जाता है। आज नया रायपुर की चर्चा देश-दुनिया में होती है। चौड़ी सड़कें, हरित क्षेत्र, सुनियोजित सेक्टर, भूमिगत विद्युत व्यवस्था, प्रशासनिक परिसर। लोग उसकी तस्वीरें देखकर वाह-वाह करते हैं, सेल्फी खींची जाती है। पर बहुत कम लोग याद रखते हैं कि उस सपने का पहला वास्तुकार कौन था। नई राजधानी की परिकल्पना किसने की थी। बाद में डॉ. रमन सिंह की सरकार ने उसे आगे बढ़ाया, विस्तार दिया, स्थायित्व दिया। यह सत्य है। पर यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि यदि अजीत जोगी सत्ता में बने रहते तो शायद नई राजधानी को आकार लेने में बीस वर्ष नहीं लगते। उनकी कार्यशैली अलग थी। वे उन लोगों में थे जो समय को पकड़कर दौड़ाना चाहते थे। उन्हें देखकर अक्सर लगता था कि यह आदमी सदियों का काम दशकों में करना चाहता है।
मुझे रायपुर का वह कार्यक्रम आज भी स्मरण है जिसमें वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए मुझे सम्मानित किया जा रहा था। मंच पर अजीत जोगी उपस्थित थे। छत्तीसगढ़ राज्य बने कुछ ही महीने हुए थे। मैंने अपने वक्तव्य में कहा था,,, “राज्य निर्माण कोई रातों-रात होने वाली प्रक्रिया नहीं है। लेकिन अजीत जोगी की कार्यशैली देखकर ऐसा लगता है कि वे सदियों का काम दशकों में करना चाहते हैं।”
सभा में हल्की मुस्कान फैल गई थी। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह टिप्पणी केवल भाषण नहीं थी, एक ऐतिहासिक अवलोकन था। हम बस्तरिया से ज्यादा भला कौन जानता है कि उस दौर में परिवहन व्यवस्था कितनी जर्जर थी। सरकारी बसें स्वयं अपनी मृत्यु का इंतजार करती दिखाई देती थीं। बस्तर की यात्रा किसी दंड यात्रा से कम नहीं होती थी। ऐसे समय में रातों-रात निजी परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहित कर जिस प्रकार आवागमन को गति दी गई, उसने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संपर्क को बदल दिया।
इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने का उनका निर्णय उस समय उपहास का विषय बना। विरोधियों ने कहा कि “डिग्री की दुकानें खुल जाएँगी।” व्यंग्य किए गए। कार्टून बने। लेकिन आज पूरा देश उसी रास्ते पर चल रहा है। गुणवत्ता का प्रश्न अपनी जगह है, परंतु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जोगी समय से पहले भविष्य को पढ़ लेने वाले व्यक्ति थे।
उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता। विदेश नीति पर उनकी पकड़ इतनी गहरी थी कि जब वे कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे तब उनके लेखों और वक्तव्यों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक होती थी। भारतीय कूटनीति पर उनके द्वारा लिखे गए लेख आज भी पढ़े जाएँ तो व्यक्ति चकित रह जाता है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल से निकला यह व्यक्ति विश्व राजनीति की बिसात को कितनी गहराई से समझता था।
लेकिन राजनीति में प्रतिभा हमेशा वरदान नहीं होती। कई बार वह अपराध बन जाती है।
उनके भीतर का प्रशासक कई बार उनके भीतर के राजनेता पर भारी पड़ जाता था। लंबे प्रशासनिक अनुभव के साथ एक प्रकार का परिपक्व पूर्वाग्रह भी विकसित हो जाता है। अधिकारी आदेश देना जानता है, राजनीति मनाना मांगती है। अधिकारी फाइल देखता है, नेता चेहरे पढ़ता है। संभवतः यही कारण था कि उनसे कुछेक राजनीतिक भूलें भी हुईं। संभवतः राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में यह प्रशासक हमेशा उभर आता था और निर्मम दखल देता था। फलत: कुछ ऐसे निर्णय हुए जो बाद में उनके लिए “वाटरलू” सिद्ध हुए। परंतु इन भूलों से उनके योगदान का महत्व कम नहीं हो जाता।
उनका हृदय बेशक चौबीस घंटे केवल छत्तीसगढ़ के लिए धड़कता था।
मुझे उनके साथ उनके मूल गांव जाने का अवसर मिला था, यू कैन उचित होगा कि वह स्वयं आग्रह पूर्वक मुझे वह गांव दिखाने ले गए थे। सफर की घंटे की यात्रा में लगातार वह अपने गांव के अपने बचपन की बात करते और मैं अपने गांव और अपने बचपन की बात करता हम दोनों के पास बात करने के लिए बहुत कुछ था हमारी बचपन की पिटारे में। वह गांव जहां कभी उनके पूर्वज रहते थे। फिर वह स्थान भी जहां बाद में उनका परिवार जाकर बसा। वे गांव निपट आदिवासी परिवेश वाले थे। लगभग मेरे गांव ककनार जैसे। मिट्टी की गंध, जंगल का एकांत, जीवन का संघर्ष ,, सब कुछ वैसा ही। वहां खड़े होकर सहज विश्वास नहीं होता कि इसी परिवेश से निकलकर कोई व्यक्ति इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रोफेसर बने, फिर आईपीएस बने, आईएएस बने और अंततः एक राज्य का निर्माता कहलाए।
यह यात्रा साधारण नहीं थी।
और शायद यही बात अनेक लोगों को भीतर से असहज भी करती थी।
भारत में प्रतिभा से ज्यादा वंशावली पूछी जाती है। व्यक्ति क्या है, इससे ज्यादा पूछा जाता है कि वह है कौन। और यही वह जगह थी जहां अजीत जोगी को जीवन भर अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घेरा गया। उनकी जाति को लेकर जितनी राजनीति हुई, उतनी शायद किसी मुख्यमंत्री के साथ नहीं हुई होगी।
मेरा स्पष्ट मत है कि स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाओं और आदिवासी-अनुसूचित जाति वर्गीकरण में अनेक गंभीर त्रुटियाँ हुईं। बाहरी सर्वेक्षणकर्ताओं ने आदिवासी समाज की परंपराओं, सामाजिक संरचनाओं और सांस्कृतिक विविधताओं को समझे बिना वर्गीकरण कर डाले। परिणामस्वरूप अनेक ऐसे विवाद पैदा हुए जो आज तक समाप्त नहीं हुए।
मैंने स्वयं इस विषय पर सात वर्षों तक शोध किया है और उसी आधार पर मुझे पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त हुई। छत्तीसगढ़ में “गांडा” नाम के अंतर्गत अनुसूचित जाति में वर्गीकृत अनेक समुदायों में ऐसी जातियाँ हैं जो वस्तुतः मूल आदिवासी परंपरा के अधिकाधिक निकट हैं, पर विवेकहीन त्रुटिपूर्ण प्रशासनिक वर्गीकरण ने उन्हें अलग खानों में डाल दिया। यही कारण है कि पहचान का संघर्ष आज भी जारी है।
अजीत जोगी को लेकर खड़ा किया गया जातीय विवाद केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक क्षति नहीं थी। उससे कहीं अधिक नुकसान छत्तीसगढ़ की संभावनाओं का हुआ। उनकी ऊर्जा, जो राज्य निर्माण में लगनी चाहिए थी, उसका बड़ा हिस्सा स्वयं को सिद्ध करने में खर्च हो गया। वे अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घुसे जरूर, पर उससे कभी बाहर नहीं निकल पाए।
फिर भी वे टूटे नहीं।
उनकी एक और विशेषता थी , पुस्तकों के प्रति उनका जुनून। किताबों को वे केवल पढ़ते नहीं थे, उन्हें जीते थे। पुस्तकों के प्रति हमारा अनुराग भी समान था, मेरी तो किताबों की प्रति दीवानगी रही है, और इससे वे परिचित भी थे। और संभवतः इसी कारण हमारे बीच वैचारिक संवाद हमेशा सहज रहा। उनकी पुस्तक “दृष्टिकोण” संभवतः छत्तीसगढ़ निर्माण से पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी, जिसमें उनके राजनीतिक और सामाजिक चिंतन की स्पष्ट झलक मिलती है।
यदि वे मुख्यमंत्री नहीं भी बने होते, तब भी वे भारतीय राजनीति में अपनी अलग लकीर खींचने वाले व्यक्ति थे।
आज के दौर की राजनीति में मुख्यमंत्री बन जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है। लोकतंत्र का खेल ऐसा है कि कभी-कभी अंगूठाछाप लोग भी सत्ता के सर्वोच्च पदों तक पहुँच जाते हैं। पर इतिहास में लकीर खींच देना बड़ी बात होती है। और अजीत जोगी ने वह लकीर खींची थी।
वे ठेठ छत्तीसगढ़ी में संवाद करते थे। सहजता से। बिना कृत्रिमता के। जनता उन्हें केवल वोट नहीं देती थी, सचमुच प्यार करती थी। यह दुर्लभ गुण है। आज अधिकांश नेता जनता से ऐसे बात करते हैं जैसे बैंक का रिकवरी एजेंट ईएमआई की तारीख बता रहा हो, दर्प घमंड छलकते चलता है।
उनकी दूरदृष्टि का एक और उदाहरण “जोगी डबरी” योजना थी। लोग उसका मजाक उड़ाते रहे। कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार और कमियाँ भी उजागर हुईं। परंतु जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के दृष्टिकोण से वह योजना अपने समय से बहुत आगे की सोच थी। आज पूरी दुनिया छोटे जलस्रोतों के संरक्षण की बात कर रही है। विदेशी विशेषज्ञ भी विकेंद्रीकृत जल संरक्षण मॉडल की सराहना कर रहे हैं। कल उसका नाम कुछ और होगा, स्वरूप कुछ और होगा, लेकिन दिशा वही होगी जिसे जोगी बहुत पहले पहचान चुके थे।
वे स्वयं को “सपनों का सौदागर” कहते थे। सच पूछा जाए तो वे वास्तव में सपनों के सौदागर थे। फर्क केवल इतना था कि वे सपने बेचते नहीं थे, उन्हें जमीन पर उतारने का साहस भी रखते थे।
मुझे वह दिन भी याद है जब दूसरे राज्यों के कृषि विशेषज्ञों से बस्तर में हो रहे कृषि नवाचारों के बारे में सुनकर वे स्वयं मेरे खेत तक पहुँचे थे। उन्होंने केवल औपचारिकता नहीं निभाई। खेत में उतरकर जड़ी-बूटियों को देखा। खुदवाकर परीक्षण किया। प्रश्न पूछे। समझा। फिर पीठ थपथपाई। आज तो स्थिति यह है कि राजधानी में बैठे अनेक अधिकारी और जनप्रतिनिधि सुनी-सुनाई बातों के आधार पर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं। वे आँख और कान के बीच की चार इंच की दूरी भी तय नहीं कर पाते।
राजनीति में विरोध स्वाभाविक है। आलोचना भी आवश्यक है। लेकिन इतिहास का मूल्यांकन पूर्वाग्रह से नहीं होना चाहिए।
अजीत जोगी का मूल्यांकन भी अभी अधूरा है। उन्हें केवल विवादों और आरोपों के आईने में नहीं देखा जा सकता।
29 मई 2020 को जब उनका निधन हुआ तब केवल एक व्यक्ति नहीं गया, छत्तीसगढ़ के आरंभिक स्वप्नों का एक बड़ा अध्याय भी विदा हो गया। लेकिन विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति ने पूरे जीवन छत्तीसगढ़ के लिए संघर्ष किया, उसके जाने के बाद भी राजनीति ने उसे चैन से नहीं छोड़ा। मृत्यु के बाद भी लोग उसकी जाति नापते जांचते रहे, उसकी नीयत तौलते रहे और उसके योगदान को कम करने में लगे रहे।
शायद इसलिए कि नींव के पत्थरों से लोग हमेशा असहज रहते हैं।
वे ऊपर दिखाई नहीं देते, लेकिन पूरी इमारत उन्हीं के भरोसे खड़ी रहती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अजीत जोगी का मूल्यांकन कांग्रेस या भाजपा के चश्मे से नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के इतिहास के चश्मे से किया जाए। राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर किया जाए। क्योंकि कोई भी समाज तब तक परिपक्व नहीं कहलाता जब तक वह अपने मौन शिल्पियों का सम्मान करना न सीख ले।
कंगूरों की चमक में नींव के पत्थरों को भूल जाना सभ्यता की पुरानी बीमारी है। लेकिन इतिहास का न्याय देर से होता है, अंधा नहीं होता।
और मुझे विश्वास है कि छत्तीसगढ़ का इतिहास एक दिन अवश्य स्वीकार करेगा कि इस राज्य की नींव में कहीं बहुत गहराई में एक पत्थर अथवा हीरा ऐसा भी दफन है जिसका नाम अजीत प्रमोद जोगी था।





