बीते दिनों कई बार करोल बाग जाना हुआ। एक दौर में करोल बाग दूसरे घर जैसा था। करोल बाग में बहुत कुछ पहले जैसा है, पर कुछ बदलाव साफ नजर भी आते हैं। बेशक, दिल्ली वालों का यह सबसे पसंदीदा बाजार है। करोल बाग के मौजूदा स्वरूप की चर्चा इसके इतिहास के साथ स लेख में। आशा है, आपको लेख ठीक लगेगा।
विवेक शुक्ला
जब आप करोल बाग मेट्रो स्टेशन से उतरकर बाजार की मुख्य सड़क पर कदम रखते हैं, तो पहली नज़र में लगता है कि समय यहां अभी भी 1990 के दशक में अटका हुआ है। चारों तरफ़ चहल-पहल, हॉकर्स की तीखी आवाज़ें, ग्राहकों की भीड़, रंग-बिरंगे कपड़ों की दुकानें और हवा में तला-भुना खाने की महक। लेकिन जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, सूक्ष्म बदलाव आँखों को छूने लगते हैं। पुरानी दिल्ली की इस मशहूर शॉपिंग डेस्टिनेशन का चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा है।
सबसे पहला और सबसे नजर आने वाला बदलाव भाषा का है। साल 2000 के शुरू तक करोल बाग की दुकानों के बोर्डों पर उर्दू का खूबसूरत नक्श-ओ-निगार आम था। दुकानदार उर्दू में लिखे बोर्ड लगाते थे, ग्राहकों से उर्दू-हिंदी के मिश्रण में बात करते थे। अब उर्दू लगभग पूरी तरह गायब हो चुकी है। पंजाबी भी बहुत कम सुनाई देती है।
एक समय था जब करोल बाग पंजाबी संस्कृति का गढ़ माना जाता था। 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों ने यहां बसना शुरू किया। उनकी मातृभाषा पंजाबी थी। दुकानों में पंजाबी बोलने वाले दुकानदार, गलियों में पंजाबी गानों की धुन और घरों से आने वाली पंजाबी व्यंजनों की खुशबू इस इलाके की पहचान थी। आज हिंदी और कुछ हद तक अंग्रेजी ने उस जगह को ले लिया है। यह बदलाव चुपके-चुपके हुआ है, लेकिन गहरे अर्थ रखता है। करोल बाग धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान से दूर होता जा रहा है।
यादगार लम्हों का बाजार फिर भी करोल बाग की अपनी एक अनोखी चमक बरकरार है। अजमल खान रोड की चकाचौंध, गफ्फार मार्केट की धड़कन, संकरी गलियों में जूते, कपड़े, बैग, मेकअप और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान बेचने वालों की गर्मजोशी — ये सब मिलकर इस बाजार को खास बनाते हैं। दिल्ली की शायद ही कोई पीढ़ी ऐसी होगी जिसने यहां शॉपिंग न की हो।
किशोरावस्था में पहली जींस यहीं से खरीदी गई, शादी के लिए पहला सूट यहीं सिला गया, या फिर दोस्तों के साथ घूमते हुए सस्ते लेकिन स्टाइलिश सामान खरीदने का मजा यहीं मिला। करोल बाग सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि दिल्लीवासियों की यादों का संग्रहालय है। यहां की दुकानें पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही हैं। कई दुकानदार आज भी पुराने ग्राहकों को नाम लेकर पुकारते हैं और पुरानी छूट देते हैं।
पार्किंग की समस्या और गिरता व्यापार लेकिन इस रौनक के बीच एक बड़ी समस्या करोल बाग को खाए जा रही है- पार्किंग। सप्ताहांत या फेस्टिवल सीजन में यहां गाड़ी पार्क करना लगभग असंभव हो जाता है। लोग अब ऑनलाइन शॉपिंग या अन्य मॉल्स की ओर रुख कर रहे हैं। नतीजा यह है कि कई पुरानी दुकानों का व्यापार घट रहा है।
शास्त्री पार्क में प्रस्तावित मल्टी-लेवल पार्किंग प्रोजेक्ट दशकों से अटका पड़ा है। अगर 500 से ज्यादा गाड़ियों की क्षमता वाला यह पार्किंग कॉम्प्लेक्स बन जाता, तो करोल बाग की तस्वीर बदल सकती थी। ट्रैफिक जाम, सड़क पर खड़ी गाड़ियां और दुकानदारों की परेशानी रोज़ की बात हो गई है।
इतिहास की गहराई करोल बाग का इतिहास बहुत गहरा और दर्द भरा है। बंटवारे से पहले यह इलाका झाड़ियों और जंगली घास से भरा हुआ था। यहां मुस्लिम आबादी अधिक थी। पाकिस्तानी क्रिकेटर सिकंदर बख्त की फैमिली भी यहीं रहती थी। 1947 के बाद सब बदल गया। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने यहां नई ज़िंदगी शुरू की। मुसलमान परिवार चले गए और उनके मकानों में नए लोग बस गए।
इन्हीं शरणार्थियों में एक नाम था- महाशय धर्मपाल गुलाटी। जो बाद में MDH मसालों के संस्थापक बने। उनकी कहानी करोल बाग की हिम्मत और उद्यमिता का प्रतीक है। छोटी-सी दुकान से शुरू करके उन्होंने साम्राज्य खड़ा कर दिया।
समावेशी संस्कृति का केंद्र करोल बाग कभी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी था। यहां कई साउथ इंडियन रेस्टोरेंट थे, जहां पंजाबी लेखक दक्षिण भारतीय कॉफी के साथ बैठकर घंटों बहस करते थे। अमृता प्रीतम, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ. हरभजन सिंह, करतार सिंह दुग्गल, हरनाम सिंह और महेंद्र कौर गिल जैसे दिग्गज अक्सर यहां मिलते थे।
हरनाम सिंह के साथ गुलज़ार भी करोल बाग में रहे। कहा जाता है कि हरनाम सिंह के सान्निध्य में ही गुलज़ार को कविता लिखने का शौक बढ़ा। खालसा कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. हरमीत सिंह आज भी उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे प्रो. जनार्दन द्विवेदी के साथ वे भी इन साहित्यिक बैठकों का हिस्सा होते थे।
नई शुरुआत का वक्त आज करोल बाग में कई पुरानी दुकानों की जगह बड़े ब्रांड आ चुके हैं। लेकिन यह जगह सिर्फ शॉपिंग डेस्टिनेशन नहीं है। यह विभाजन के दर्द, हिम्मत, समावेशिता और नई शुरुआत की जीती-जागती मिसाल है।
राजेश वाच्छर जैसे पुराने निवासियों ने बुजुर्गों से सुना है कि आर.के. धवन (जो बाद में इंदिरा गांधी के करीबी बने) यहां कंघियां बेचा करते थे। आर्य समाज रोड पर मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ भी अपने समधी के यहां आया करते थे।
अब वक्त आ गया है कि करोल बाग को नई जान फूंकी जाए। बेहतर और पर्याप्त पार्किंग, पुरानी दुकानों और बोर्डों की विरासत का संरक्षण, साफ-सुथरी गलियां, हेरिटेज वॉक का आयोजन और आधुनिक सुविधाएं — ये सब मिलकर इस बाजार
को उसकी खोई रौनक वापस दिला सकते हैं।
करोल बाग सिर्फ एक बाजार नहीं, दिल्ली की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। इसे बचाना और संवारना हमारी जिम्मेदारी है। बेशक, यह जगह अपनी पूरी रौनक वापस पाने के काबिल है।





