अशोक भाटिया
‘योगी की जय कन्हैया व टेंशन में है अखिलेश भैया’—यह महज उत्तर प्रदेश की राजनीति में उपजा एक नया नारा या तात्कालिक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है। असल में, यह आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की पिच तैयार करने, राज्य की राजनीति को एक बड़े वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाने और विपक्ष की सामाजिक घेराबंदी करने का एक बेहद दूरगामी और सुनियोजित खाका है। हाथरस की जनसभा से लेकर संभल, बुलंदशहर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम मंचों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव को जिस प्रकार ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ और ब्रज संस्कृति के मुद्दे पर घेरा है, उसने सपा के रणनीतिकारों और थिंक-टैंक को एक बेहद गहरी ‘टेंशन’, कशमकश और राजनीतिक असमंजस में डाल दिया है।
यह नारा इस समय के पूरे सियासी घमासान के ऐतिहासिक संदर्भों, चुनावी गणित, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार, समाजवादी पार्टी के सामने खड़ी अस्मितावादी दुविधा और भारतीय लोकतंत्र पर इसके पड़ने वाले व्यापक प्रभावों का एक अत्यंत निष्पक्ष, गंभीर और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
हमें उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए देश के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास को समझना अनिवार्य है। भारतीय राजनीति में पिछले चार दशकों से ‘अयोध्या, काशी और मथुरा’ की तिकड़ी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथी विमर्श के केंद्र में रही है। जनवरी 2024 में अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे में स्वाभाविक रूप से अगला सबसे बड़ा पड़ाव मथुरा की ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ है।
यह ताजा राजनीतिक विवाद तब और अधिक गर्मा गया जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या में हुए राम मंदिर के चढ़ावे में कथित ‘चोरी, वित्तीय अनियमितताओं और भूमि घोटालों’ का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बयान दिया कि यदि भविष्य में प्रदेश में उनकी सरकार आती है, तो वे अयोध्या को एक आदर्श ‘धार्मिक नगरी’ के रूप में और बेहतर ढंग से विकसित करेंगे ताकि वहां के स्थानीय निवासियों को असुविधा न हो।अखिलेश यादव के इसी आक्रामक दांव पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेहद तीखा और रणनीतिक पलटवार किया। योगी ने जनसभाओं से सीधे तौर पर अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए कहा:”अखिलेश जी, आप अयोध्या की चिंता छोड़िए, पहले अपने अतीत के फैसलों पर पश्चाताप करिए और एक बार प्रभु श्रीरामलला के चरणों में जाकर दर्शन कर आइए, जिससे आपको सद्बुद्धि आए। अगर आप वास्तव में खुद को धार्मिक और सनातनी साबित करना चाहते हैं, तो मथुरा-वृंदावन और श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए खुलकर अपना स्टैंड साफ करिए।”योगी आदित्यनाथ का यह तीखा बयान सपा को उसी की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ‘यदुवंशी’ (यादव) पहचान की पिच पर घेरने की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस रणनीतिक घेराबंदी के पीछे कई ऐसे बिंदु हैं जो सीधे तौर पर बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को छूते हैं। योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में लगातार जनता को यह याद दिलाया कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के थानों, चौकियों और जेलों में पारंपरिक रूप से होने वाले ‘कृष्ण जन्माष्टमी’ के भव्य आयोजनों पर अघोषित या लिखित रूप से रोक लगा दी गई थी। उन्होंने कांवड़ यात्राओं पर लगे पूर्ववर्ती प्रतिबंधों और लाठीचार्ज का भी जिक्र किया। इसके जरिए वे बहुसंख्यक हिंदू समाज के मन में यह संदेश गहरा करना चाहते हैं कि सपा का मूल चरित्र हमेशा से ‘तुष्टिकरण’ से प्रेरित रहा है और सत्ता में आते ही वे बहुसंख्यक धार्मिक आस्थाओं को दबाने का प्रयास करते हैं।
भाजपा ने विकास के आर्थिक मॉडल को धार्मिक आस्था और अस्मिता से जोड़कर एक नया नैरेटिव तैयार किया है। योगी आदित्यनाथ अक्सर अपने मंचों से कहते हैं कि 2017 से पहले जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा ‘कब्रिस्तानों की बाउंड्री वॉल’ बनाने और विशेष त्योहारों के बिजली प्रबंधन में खर्च होता था, जबकि वर्तमान भाजपा सरकार उसी पैसे को अयोध्या, काशी, मथुरा, नैमिषारण्य और चित्रकूट के सौंदर्यीकरण तथा श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं पर खर्च कर रही है। यह सीधा तुलनात्मक विमर्श आम जनता के बीच गहरी छाप छोड़ता है।
ब्रज क्षेत्र और देश भर के प्रमुख संत समाज, जिसमें अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद भी शामिल है, ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति और शाही ईदगाह मस्जिद के स्थान पर भव्य मंदिर के निर्माण के लिए आगामी 9 अगस्त 2026 को सांकेतिक रूप से ‘कार सेवा’ करने का एक बड़ा और ऐतिहासिक ऐलान किया है। संतों ने सार्वजनिक रूप से अखिलेश यादव से सीधे तीखे सवाल किए हैं। संतों का कहना है कि यदि अखिलेश खुद को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज (यदुवंशी) मानते हैं, तो उन्हें इस पवित्र अभियान का खुलकर समर्थन करना चाहिए और कार सेवा के लिए ‘पहला पत्थर’ उठाने के लिए खुद आगे आना चाहिए।
दरअसल अखिलेश यादव इस समय एक ऐसी त्रिशंकु स्थिति में फंस गए हैं जहां उनका हर एक कदम एक नया राजनीतिक जोखिम लेकर आ रहा है। इस ‘टेंशन’ के तीन मुख्य पहलू हैं: 1: ‘एम-वाई’ (M-Y) समीकरण के बिखरने का सीधा खतरा -समाजवादी पार्टी की मुख्य ताकत और चुनावी आधार पारंपरिक रूप से मुस्लिम (M) और यादव (Y) मतदाताओं के मजबूत और अटूट गठजोड़ पर टिका रहा है। योगी आदित्यनाथ ने मथुरा का मुद्दा उठाकर इसी गठजोड़ की सबसे कमजोर नस पर हाथ रख दिया है:यदि अखिलेश मथुरा आंदोलन का समर्थन करते हैं तो उनका सबसे वफादार और एकजुट ‘मुस्लिम’ वोटबैंक उनसे पूरी तरह से नाराज और ठगा हुआ महसूस कर सकता है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय शाही ईदगाह मस्जिद के कानूनी और धार्मिक वजूद को बचाने के पक्ष में है। उन्हें लगेगा कि सपा भी भाजपा के ‘बहुसंख्यकवाद’ के आगे नतमस्तक हो गई है।यदि अखिलेश मथुरा आंदोलन का विरोध करते हैं: तो भाजपा और संत समाज उन्हें तुरंत ‘सनातन विरोधी’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा पैरोकार’ घोषित कर देंगे। इससे यादव समुदाय और अन्य पिछड़ी जातियों का वह बड़ा हिस्सा, जो अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर अत्यधिक भावुक और सजग है, सपा से छिटक कर भाजपा के पाले में जा सकता है।अखिलेश यादव अक्सर रैलियों में और भगवान कृष्ण की मूर्तियां स्थापित करवाकर यह गर्व से कहते आए हैं कि “भगवान कृष्ण मेरे भी सपने में आते हैं और हम उनके सच्चे वंशज हैं।” लेकिन जब बात कानूनी विवादों, शाही ईदगाह मस्जिद के सर्वे और मंदिर निर्माण के लिए सड़क पर उतरने की आती है, तो उन्हें अपनी पार्टी की वाम-प्रगतिशील और ‘धर्मनिरपेक्ष’ छवि को भी अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बनाए रखना होता है। यह वैचारिक अंतर्विरोध उनकी राजनीतिक शैली को कमजोर, रक्षात्मक और अस्पष्ट दिखाता है।
पहलू 3: राजनीतिक पिच पर भाजपा की रणनीतिक बढ़त -लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, कानून-व्यवस्था, और सांडों की समस्या जैसे बुनियादी धरातलीय मुद्दों पर सरकार को लगातार घेर रहे थे और उन्हें इसमें सफलता भी मिल रही थी। लेकिन जैसे ही ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि’ और ‘कार सेवा’ का मुद्दा विमर्श के केंद्र में आया, पूरी राजनीतिक बहस का रुख एक बार फिर से ‘धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान’ पर केंद्रित हो गया। भाजपा हमेशा से इस ‘धार्मिक पिच’ पर खेलने में माहिर रही है, जिससे विपक्ष द्वारा उठाए गए बुनियादी और आर्थिक मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं।
इस चौतरफा वैचारिक हमले और तनाव के बीच अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पूरी तरह से हथियार डालकर नहीं बैठी है। वे भाजपा के इस भारी-भरकम धार्मिक राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिए अपनी एक अलग और मूक रणनीति पर काम कर रहे हैं:’असली बनाम नकली’ सनातन की बहस: अखिलेश यादव और उनके प्रखर प्रवक्ता टीवी चैनलों और रैलियों में यह तर्क दे रहे हैं कि वे भी सच्चे सनातनी हैं और भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण की पूजा करते हैं, लेकिन वे धर्म का उपयोग ‘नफ़रत फैलाने’, समाज को बांटने या ‘वोट बटोरने’ के लिए नहीं करते। वे अक्सर भाजपा पर ‘धर्म के व्यवसायीकरण’ और धार्मिक स्थलों पर स्थानीय दुकानदारों व पंडा-पुजारियों के उत्पीड़न का आरोप लगाते हैं।इस समय सपा का पूरा प्रयास यह है कि वे खुद को भाजपा द्वारा बुने गए इस धार्मिक विवाद के जाल में पूरी तरह से फंसने न दें। वे लगातार युवाओं की बेकारी, उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती पेपर लीक, किसानों की फसलों के दाम, और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का मुद्दा उठाकर जनता का ध्यान उनकी बुनियादी और दैनिक जरूरतों की ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं।न्यायालय की ढाल और विधिक प्रक्रिया का सहारा: मथुरा और काशी के संवेदनशील मुद्दों पर सपा का आधिकारिक रुख हमेशा यह रहता है कि यह मामला चूंकि देश की माननीय अदालतों (हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) के विचाराधीन है, इसलिए सभी पक्षों को कानून और अदालती फैसले का सम्मान करना चाहिए। इसके जरिए वे किसी भी समुदाय को नाराज किए बिना सीधे विरोध या समर्थन करने की स्थिति से साफ बच निकलते हैं।
‘योगी की जय कन्हैया व टेंशन में है अखिलेश भैया’ का यह पूरा राजनीतिक प्रकरण यह साफ तौर पर दर्शाता है कि 21वीं सदी के भारत और विशेषकर देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश में, राजनीति केवल आर्थिक पैमानों, बुनियादी विकास के दावों या पुराने जातिगत गठबंधनों के सहारे नहीं जीती जा सकती। यहाँ ‘सांस्कृतिक अस्मिता’, ‘धार्मिक चेतना’ और ‘ऐतिहासिक गौरव’ मतदाताओं के व्यवहार और उनकी प्राथमिकताओं को प्रभावित करने वाले सबसे शक्तिशाली और निर्णायक कारक बन चुके हैं।





