अशोक भाटिया
भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने में शांतिपूर्ण असहमति, विरोध-प्रदर्शन और अपनी आवाज बुलंद करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत हर नागरिक को प्राप्त है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर दशकों से ऐसे ही अनगिनत नागरिक आंदोलनों, सामाजिक मांगों और असंतोष की अभिव्यक्ति का एक प्रमुख केंद्र रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से अपनी समस्याओं को सरकार और व्यवस्था के समक्ष रखने आने वाले नागरिकों के लिए यह स्थान एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। लोकतंत्र की जीवंतता और उसकी परिपक्वता इसी बात में निहित है कि यहाँ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी अपनी बात रखने का पूरा और समान अवसर मिले।
परंतु, हाल के वर्षों में इस संवेदनशील और ऐतिहासिक स्थल के उपयोग को लेकर कई तरह की प्रशासनिक, विनियामक और व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आई हैं। जब जन-आंदोलनों की आड़ में कतिपय तत्वों द्वारा नियमों की अनदेखी, वित्तीय अपारदर्शिता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने के प्रयास किए जाते हैं, तो यह न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं को धूमिल करता है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों के लिए भी संकट पैदा करता है। ऐसे समय में राज्य और न्यायपालिका के समक्ष यह बड़ी चुनौती होती है कि वह विरोध के मौलिक अधिकार की रक्षा भी करे और जनहित व विधिक व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों पर निष्पक्षता से अंकुश भी लगाए।
यह समझना आवश्यक है कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में कोई भी अधिकार असीमित या निरपेक्ष नहीं है। संविधान निर्माताओं ने देश की संप्रभुता, अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था और आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए मौलिक अधिकारों पर ‘तार्किक प्रतिबंध’ का स्पष्ट प्रावधान किया है। जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में अक्सर अनेक विसंगतियां और चुनौतियां देखने को मिलती हैं, जो इस विमर्श को जन्म देती हैं जैसे वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी: कई बार सार्वजनिक अभियानों, नागरिक प्रदर्शनों या सामाजिक सुधारों के नाम पर बड़े पैमाने पर आम जनता या विभिन्न स्रोतों से धन एकत्र किया जाता है। यदि इस धन के स्रोतों और उसके वास्तविक उपयोग में पारदर्शिता न हो, तो यह संस्थागत धांधली का रूप ले लेती है। जब आंदोलन का वित्तीय आधार ही संदेहास्पद या अपारदर्शी हो जाता है, तो आंदोलन का मूल सामाजिक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा की चुनौती: नई दिल्ली का यह क्षेत्र देश का मुख्य प्रशासनिक और रणनीतिक केंद्र है, जो संसद भवन और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के अत्यंत निकट है। यहाँ निर्धारित संख्या से अधिक भीड़ का अचानक जुटना, यातायात को पूरी तरह ठप कर देना या सुरक्षा घेरे को तोड़ने का प्रयास करना कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न करता है।आम नागरिकों के अधिकारों का हनन: एक वर्ग के विरोध प्रदर्शन के अधिकार के कारण स्थानीय निवासियों, राहगीरों, व्यापारियों और दफ्तर जाने वाले हजारों आम लोगों के मौलिक अधिकारों—जैसे सुगम आवाजाही का अधिकार और शांति से जीने का अधिकार—का लंबे समय तक प्रभावित होना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।जब आंदोलन की आड़ लेकर स्थापित विधिक प्रक्रियाओं, सार्वजनिक नियमों और आम नागरिकों की सुरक्षा की अवहेलना होने लगती है, तो कानून को एक निष्पक्ष मार्गदर्शक और नियंत्रक के रूप में अपनी भूमिका निभानी पड़ती
भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर विरोध प्रदर्शनों की सीमा, स्थान और मर्यादा को लेकर अत्यंत संतुलित मार्गदर्शिकाएँ जारी की हैं। न्यायालय का हमेशा से यह स्पष्ट मत रहा है कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इसके कारण सार्वजनिक व्यवस्था को बंधक बना लिया जाए।
मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) के इस ऐतिहासिक मामले में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत संतुलित निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि प्रदर्शनों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना नागरिक अधिकारों का हनन होगा। न्यायालय ने दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिए कि वे विरोध प्रदर्शनों के लिए एक उचित और सीमित उपयोग की विनियामक नीति तैयार करें, ताकि सुरक्षा, स्थानीय निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन और नागरिक अधिकारों के बीच एक स्वस्थ संतुलन बना रहे।अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर (शाहीन बाग मामला – 2020) के इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने रुख को और स्पष्ट करते हुए कहा कि यद्यपि असहमति और विरोध प्रदर्शन एक संवैधानिक अधिकार हैं, परंतु प्रदर्शनकारी अनिश्चितकाल के लिए सार्वजनिक मार्गों या स्थानों को अवरुद्ध नहीं कर सकते। सार्वजनिक स्थानों का इस तरह घेराव करना स्वीकार्य नहीं है और प्रदर्शन केवल प्रशासन द्वारा ‘चिन्हित या निर्धारित स्थलों’ पर ही किए जाने चाहिए ताकि आम जनता को भारी असुविधा न हो।अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2016) के इस मामले में अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा अत्यधिक या असंगत बल प्रयोग की निंदा की थी और मुआवजे का आदेश दिया था। लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित किया था कि यदि प्रदर्शनकारी हुड़दंग, तोड़फोड़ या हिंसा पर उतारू होते हैं, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की जिम्मेदारी और कठिन हो जाती है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा और सार्वजनिक या निजी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाना है। करदाताओं के पैसे से बनी सार्वजनिक संपत्तियों (जैसे बसें, पुलिस वाहन, बैरिकेड्स या सरकारी इमारतें) को आंदोलन की आड़ में नष्ट करना एक गंभीर विधिक अपराध है।इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘इन री: डिस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टीज (2009)’ मामले में जारी की गई गाइडलाइंस अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी हिंसक आंदोलन या तोड़फोड़ की स्थिति में, उस आंदोलन का आह्वान करने वाले संगठनों और उनके शीर्ष नेताओं को ‘अपेरशन’ या दुष्प्रेरण का दोषी माना जा सकता है।नुकसान का आकलन करने के लिए एक दावा आयुक्त नियुक्त किया जा सकता है, जो जांच के बाद दोषियों या संबंधित संगठनों की संपत्तियों से नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करेगा।इसके अलावा, ‘प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट, 1984’ के तहत ऐसे मामलों में कड़ी आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान है। यह विधिक व्यवस्था यह संदेश देती है कि भीड़ का हिस्सा बनकर या किसी संगठन के झंडे के पीछे छिपकर कानून से बचना अब संभव नहीं है।
21वीं सदी के वर्तमान प्रशासनिक और न्यायिक परिदृश्य में किसी भी प्रकार की वित्तीय, प्रक्रियात्मक या हिंसक अनियमितता करके बच निकलना तकनीकी रूप से लगभग असंभव हो चुका है। समकालीन जांच प्रणालियाँ किसी व्यक्ति विशेष के राजनैतिक या सामाजिक प्रभाव से परे होकर विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर कार्य करती हैं:जैसे तकनीकी निगरानी और दृश्य साक्ष्य : वर्तमान में जंतर-मंतर और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों को हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन कैमरों और पुलिस वीडियोग्राफी से कवर किया जाता है। यह तकनीक दोतरफा सुरक्षा प्रदान करती है—एक तरफ यह किसी भी प्रदर्शनकारी द्वारा की जाने वाली हिंसा या उकसावे की गतिविधि को निष्पक्षता से रिकॉर्ड करती है, तो दूसरी तरफ यह पुलिस द्वारा किए जाने वाले किसी भी संभावित अत्यधिक बल प्रयोग पर भी नजर रखती है। इससे बेगुनाह नागरिकों को सुरक्षा मिलती है और वास्तविक दोषियों की पहचान अकाट्य साक्ष्यों के साथ सुनिश्चित होती है।वित्तीय फॉरेंसिक और मनी ट्रेल चंदे के नाम पर होने वाले वित्तीय घपलों या विदेशी फंडिंग (FCRA विनियमों के उल्लंघन) को रोकने के लिए प्रवर्तन निदेशालय और वित्तीय खुफिया इकाइयाँ बैंकिंग ट्रेल और डिजिटल फॉरेंसिक का सहारा लेती हैं। कानून के समक्ष अब यह अनिवार्य हो चुका है कि सार्वजनिक आंदोलनों के लिए आने वाले हर एक पैसे का ऑडिट हो और उसका वैध हिसाब रखा जाए।विधिक संहिताओं का अनुप्रयोग में भारतीय न्याय संहिता और सुरक्षा से जुड़े अन्य विशेष अधिनियमों के तहत अब प्रक्रियाएं अधिक संरचित और पारदर्शी बनाई गई हैं। कानून का यह कड़ा ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले तत्वों के खिलाफ त्वरित और साक्ष्य-आधारित विधिक प्रक्रिया अपनाई जाए।
गौरतलब है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों के उपभोग का नाम नहीं है, बल्कि यह कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की भी मांग करता है। एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिकता ही किसी भी देश के लोकतंत्र को मजबूत और परिपक्व बनाती है। जब नागरिक और आंदोलनकारी स्वयं आंतरिक अनुशासन का पालन करते हैं, तो विनियामक एजेंसियों को अत्यधिक हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।इसके साथ ही, समकालीन मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में अब किसी भी प्रकार के फर्जीवाड़े, छिपे हुए एजेंडे या पाखंड को लंबे समय तक छुपाना संभव नहीं है। खोजी पत्रकारिता और आम नागरिकों द्वारा बनाई जाने वाली वीडियो क्लिपिंग्स तुरंत सच को सामने ला देती हैं। जनता अब केवल भावुक और उत्तेजक नारों के पीछे नहीं भागती, बल्कि वह दावों के पीछे के छिपे हुए तथ्यों, तर्कों और पारदर्शिता को परखती है।
जंतर-मंतर जैसी ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण जगहों पर होने वाली किसी भी प्रकार की धांधली, प्रक्रियात्मक अराजकता या गैर-कानूनी गतिविधियों के खिलाफ प्रशासनिक और विधिक मुस्तैदी किसी राजनीतिक विद्वेष का परिणाम नहीं, बल्कि कानून के शासन को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य की मजबूत, पारदर्शी और आधुनिक जांच प्रणालियां आज यह सुनिश्चित कर रही हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम जनता के भरोसे का दुरुपयोग करने वाले तत्वों के लिए कानून की पकड़ से बचने का कोई चोर रास्ता या तकनीकी खामी न बचे।एक परिपक्व और विकासशील लोकतंत्र के रूप में भारत को यह निरंतर याद रखना होगा कि अधिकारों और कर्तव्यों के बीच का संतुलन ही समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। शांतिपूर्ण, तर्कसंगत, साक्ष्य-आधारित और पारदर्शी संवाद ही लोकतंत्र के असली आभूषण हैं। कानून का यह सख्त और निष्पक्ष रुख अंततः उन वास्तविक, ईमानदार और शांतिप्रिय आंदोलनकारियों के हितों की भी रक्षा करता है जो पूरी मर्यादा के साथ अपनी जायज मांगें सरकार और राष्ट्र के सामने रखना चाहते हैं। कानून की नजर में धांधली, हिंसा और पारदर्शिता का अभाव तीनों ही पूरी तरह से असहनीय हैं, और यही विधिक सर्वोच्चता अंततः एक स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।





