प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
भारत का जल संकट नदियों में घटते प्रवाह से अधिक, हमारी नीतियों में घटती दूरदृष्टि का संकट है। विडंबना यह है कि जिस देश ने वर्षा को उत्सव, नदी को जीवन और तालाब को गांव की धड़कन माना, वही आज पानी को विशाल परियोजनाओं और टैंकरों के बीच खोज रहा है। स्थिति चिंताजनक है। विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का भार उठाने वाला भारत विश्व के केवल 4 प्रतिशत नवीकरणीय मीठे जल संसाधनों पर निर्भर है। मानसून की अनिश्चितता, भूजल का अंधाधुंध दोहन और अनियोजित शहरी विस्तार इस संकट को और गहरा रहे हैं। ऐसे समय में बहस यह नहीं होनी चाहिए कि समाधान नदियों को जोड़ने में है या वर्षा जल संचयन में। असली प्रश्न यह है कि क्या जल केवल उपभोग की वस्तु बना रहेगा, या हम उसे राष्ट्रीय अस्तित्व का आधार मानकर उसकी हर बूंद का सम्मान करना सीखेंगे।
जल प्रबंधन की सफलता के महत्वपूर्ण पैमानों में नदी जोड़ो परियोजनाएं भी शामिल हैं। ₹44,605 करोड़ की केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली अंतर-बेसिन नदी जोड़ने की पहल है, जो बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए नई उम्मीद बनी है। वर्ष 2026 में इसका निर्माण तेजी से चल रहा है, लेकिन पन्ना और छतरपुर में विस्थापन, पुनर्वास और आदिवासी अधिकारों को लेकर विवाद जारी हैं। यह याद दिलाता है कि विकास केवल इंजीनियरिंग का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी विषय है। केन का जल बेतवा तक पहुंचाने की योजना जितनी आकर्षक है, उतना ही गंभीर प्रश्न नदी के प्राकृतिक प्रवाह, वन्यजीवों और मिट्टी की उर्वरता पर उसके प्रभाव का है। यही चिंता चेनाब-बीस टनल और नर्मदा-सोन लिंक जैसी परियोजनाओं पर भी लागू होती है। यदि ये योजनाएं स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप नहीं बढ़ीं, तो जल संकट का समाधान करते-करते प्रकृति के लिए नया संकट खड़ा कर देंगी।
वर्षा जल संचयन को वर्षों तक सहायक उपाय मानकर उसकी वास्तविक शक्ति को कम आंका गया। जबकि सच यह है कि आसमान से गिरने वाली हर बूंद पूरे समाज की पूंजी है। ‘कैच द रेन’ अभियान के तहत देशभर में हजारों रिचार्ज संरचनाएं बनीं, लेकिन दिल्ली, पुणे और गोवा जैसे शहरों में रखरखाव के अभाव में अनेक प्रणालियां निष्क्रिय हैं। इससे स्पष्ट है कि संकट संसाधनों का नहीं, संरक्षण की जिम्मेदारी का है। यदि हर नया भवन, सड़क, औद्योगिक क्षेत्र और सार्वजनिक परिसर वर्षा जल संचयन से जुड़ जाए, तो भूजल पुनर्भरण में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। यह व्यवस्था बड़े बांधों की तुलना में कम लागत वाली, विकेंद्रीकृत, कम जोखिम वाली, समुदाय आधारित और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल है। भारत की जल सुरक्षा केवल नदियों से नहीं, वर्षा की हर बूंद से भी तय होगी।
समाधान किसी एक विकल्प में नहीं, दोनों के संतुलित समन्वय में है। बड़ी नदी जोड़ो परियोजनियां वहां काम करें, जहां जल का क्षेत्रीय असंतुलन है; वहीं वर्षा जल संचयन हर गांव, हर खेत और हर मोहल्ले को अपनी जलधारा बनाने का आधार बने। राजस्थान के जोहड़, तमिलनाडु की एरी प्रणाली और गुजरात के चेकडैम वर्षों से सिद्ध कर रहे हैं कि स्थानीय परंपरा और आधुनिक तकनीक का मेल ही स्थायी जल प्रबंधन की कुंजी है। इसके साथ फसल चक्र में बदलाव, अधिक पानी मांगने वाली फसलों का पुनर्मूल्यांकन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार तथा भूजल के अंधाधुंध दोहन पर कठोर नियंत्रण भी अनिवार्य है। अब जल प्रबंधन का लक्ष्य केवल आपूर्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि डिमांड मैनेजमेंट होना चाहिए। क्योंकि बचाई गई हर बूंद, नई उपलब्ध कराई गई हर बूंद जितनी ही मूल्यवान होती है।
जल का प्रश्न अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक संतुलन और सामाजिक न्याय का भी विषय है। एक ओर शहरों में पानी की फिजूलखर्ची है, दूसरी ओर गांव जीवन की मूल आवश्यकता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह असमानता स्वीकार्य नहीं हो सकती। इसलिए उद्योगों को वॉटर पॉजिटिव बनना होगा, ताकि वे जितना जल उपयोग करें, उससे अधिक संरक्षण और भूजल पुनर्भरण में योगदान दें। स्कूलों और महाविद्यालयों में कार्यात्मक वर्षा जल संचयन व्यवस्था केवल औपचारिकता नहीं, अनिवार्यता बने। किसानों को इन-सिटू जल संचयन के लिए प्रोत्साहित किया जाए, ताकि खेत ही वर्षा का पहला जलाशय बनें। जल संरक्षण तभी सफल होगा, जब नीति और नागरिक समान जिम्मेदारी निभाएंगे।
जल संकट का स्थायी समाधान नीतियों से पहले सोच बदलने में है। हमने पानी को प्रकृति का उपहार तो माना, पर उसके संरक्षण को अपना दायित्व नहीं समझा। अब यह दृष्टि बदलनी होगी। जल संरक्षण किसी मंत्रालय का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्कार बनना चाहिए। हर नागरिक अपनी छत को जलग्रहण क्षेत्र, अपनी भूमि को पुनर्भरण क्षेत्र और अपनी जीवनशैली को संरक्षण का माध्यम बनाए। सरकारें बांध, नहरें और योजनाएं बना सकती हैं, लेकिन यदि समाज पानी को केवल उपभोग की वस्तु मानता रहा, तो कोई भी परियोजना स्थायी परिणाम नहीं दे सकेगी। जल का भविष्य फाइलों में नहीं, नागरिक चेतना में सुरक्षित होगा।
भारत का जल भविष्य किसी एक महायोजना से सुरक्षित नहीं होगा। नदियों को जोड़ना क्षेत्रीय असंतुलन वाले क्षेत्रों में आवश्यक है, लेकिन वर्षा की हर बूंद को धरती तक पहुँचाना राष्ट्रीय जल नीति की आधारशिला बनना चाहिए, क्योंकि वही सबसे भरोसेमंद और सुलभ जल स्रोत है। इसलिए वर्षा जल संचयन को सहायक उपाय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जल नीति की केंद्रीय रणनीति बनाया जाना चाहिए। बड़े नदी लिंक देश की मुख्य जलधाराएं बनें और वर्षा जल संचयन हर गांव, हर शहर और हर खेत की जीवनरेखा। भारत को यह स्वीकार करना होगा कि जल विकास का साधन नहीं, विकास की सीमा है। यदि आज हमने दूरदृष्टि दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें केवल विशाल परियोजनाओं के लिए नहीं, बल्कि हर बूंद को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी मानने वाले विवेक के लिए याद रखेंगी। तभी “जल है तो कल है” नारा नहीं, भारत की स्थायी राष्ट्रीय नीति बनेगा।





