अशोक भाटिया
किसी भी संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए उसकी आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और राजनीतिक अखंडता सर्वोपरि होती है. जब कोई देश बाहरी ताकतों के दखल के बिना अपनी नीतियां बनाने और शासन चलाने की स्वतंत्रता खो देता है, तो उसका लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है। इतिहास गवाह है कि विकासशील देशों को अस्थिर करने के लिए बंदूकों और मिसाइलों से ज्यादा खतरनाक हथियार ‘अदृश्य धन’ को बनाया जाता है। परोपकार, मानवाधिकार और सामाजिक कल्याण के मुखौटे के पीछे छिपी विदेशी फंडिंग कई बार राष्ट्रों के भीतर गृहयुद्ध, विभाजनकारी आंदोलनों और सांस्कृतिक संकटों को जन्म देती है। भारत ने इस खतरे को न केवल भांपा है, बल्कि समय-समय पर अपने कानूनी सुरक्षा तंत्र को अभेद्य भी बनाया है। इसी सुरक्षा तंत्र का सबसे अचूक और शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र है—विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, जिसे हम FCRA के नाम से जानते हैं.
हाल के दिनों में FCRA संशोधन विधेयक 2026 और संशोधित FCRA नियम 2026 को लेकर देश के भीतर और बाहर एक विशेष लॉबी द्वारा भारी शोर मचाया जा रहा है. खुद को नागरिक समाज का अलंबरदार कहने वाले कुछ संगठन, मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और तथाकथित बौद्धिक वर्ग इस कानून को ‘दमनकारी’ और ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने पर तुले हैं. लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि यदि नियत साफ है, सेवा का संकल्प सच्चा है, और आने वाले पैसे की पाई-पाई वैध है, तो कानून की कड़ाई से इतनी छटपटाहट क्यों? पारदर्शिता के तकाजों से केवल वही बिफर सकते हैं, जिनके बहीखातों में हेरफेर है और जिनकी फंडिंग का असली मकसद जनसेवा नहीं, बल्कि देश के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करना है। यह सम्पादकीय इस बात की गहराई से पड़ताल करता है कि आखिर क्यों भारत का यह संप्रभु अधिकार कुछ खास ‘गलत लोगों’ की आंखों की किरकिरी बन गया है।
FCRA कोई नया कानून नहीं है। इसकी शुरुआत आपातकाल के दौरान 1976 में हुई थी, जब तत्कालीन सरकार को यह महसूस हुआ कि विदेशी ताकतें भारत के चुनावों, राजनीतिक दलों और जनमत को प्रभावित करने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. इसके बाद वर्ष 2010 में इसे पूरी तरह से नया रूप दिया गया, ताकि गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से आने वाले धन की निगरानी की जा सके. समय के साथ अपराधियों और राष्ट्र-विरोधी तत्वों ने कानून की कमियों का फायदा उठाकर ‘फंड डाइवर्जन’ और ‘लेयरिंग’ (पैसे को कई खातों में घुमाना) के नए-नए रास्ते खोज निकाले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इस खतरे को गंभीरता से लिया और 2020 में इसमें क्रांतिकारी संशोधन किए. इन संशोधनों के तहत सभी NGOs के लिए देश के केंद्रीय बैंक के सहयोग से भारतीय स्टेट बैंक (SBI), नई दिल्ली मुख्य शाखा में ही अपना FCRA खाता खोलना अनिवार्य कर दिया गया। इसके अलावा, प्रशासनिक खर्चों की सीमा को 50% से घटाकर 20% कर दिया गया और सबसे महत्वपूर्ण—एक NGO द्वारा दूसरे NGO को विदेशी फंड ट्रांसफर करने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। वर्ष 2026 तक आते-आते गृह मंत्रालय ने इसके नियमों को और अधिक उद्देश्य-आधारित और भौगोलिक रूप से ट्रैक करने योग्य बना दिया है. अब विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं को यह स्पष्ट करना होता है कि वे किस राज्य के किस जिले में, और किस विशिष्ट कार्य के लिए पैसा खर्च कर रही हैं. पांच दशकों की यह विधायी यात्रा दर्शाती है कि भारत ने कभी भी वैध विदेशी चैरिटी को नहीं रोका, बल्कि उसने केवल उस पैसे को रोका है जो लोकतंत्र की जड़ों में दीमक बनकर लग रहा था ।
दरअसल भारत की सांस्कृतिक विविधता और जनसांख्यिकी को बदलने के लिए दशकों से विदेशी धन का एक बड़ा हिस्सा अवैध धार्मिक रूपांतरण के खेल में झोंका जाता रहा है. सेवा के नाम पर दूरदराज के आदिवासी इलाकों, गरीब बस्तियों और वंचित समाजों में अस्पताल या स्कूल खोले जाते हैं, लेकिन उनका छिपा हुआ एजेंडा मतांतरण होता है। FCRA नियम 2026 ने इस पर सबसे करारी चोट की है. नए नियमों में अनुमत धार्मिक गतिविधियों की एक स्पष्ट और सख्त सूची जारी की गई है, जिसमें धार्मिक बुनियादी ढांचे का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा, पारंपरिक संगीत और स्वदेशी विश्वासों का संरक्षण तो शामिल है, लेकिन किसी भी प्रकार का प्रलोभन, लालच या धोखे से कराया जाने वाला धर्मांतरण पूरी तरह प्रतिबंधित है. जो ताकतें भारत की जनसांख्यिकीय संरचना को बदलकर सामाजिक तनाव पैदा करना चाहती थीं, इस नियम के बाद उनकी पूरी फंडिंग चेन ध्वस्त हो गई है। यही कारण है कि धार्मिक मुखौटा ओढ़े कई गिरोह आज इस कानून के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के हनन का रोना रो रहे हैं।
गौरतलब है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। भारत की इस आर्थिक प्रगति से कई वैश्विक ताकतें और उनके प्रतिस्पर्धी देश डरे हुए हैं। भारत को आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए एक नया ट्रेंड शुरू हुआ जिसे ‘इको-वारफेयर’ कहा जाता है। विदेशी संस्थाएं भारत के स्थानीय NGOs को करोड़ों रुपये की फंडिंग करती थीं, जिनका काम केवल भारत के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स—जैसे परमाणु ऊर्जा संयंत्र, मेगा हाईवे, माइनिंग प्रोजेक्ट्स और बंदरगाहों—के खिलाफ स्थानीय लोगों को भड़काना और हिंसक विरोध प्रदर्शन आयोजित करना था। कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और वेदांता के स्टरलाइट प्लांट के मामलों में विदेशी फंडिंग की संदिग्ध भूमिका जगजाहिर हो चुकी है। जनहित के नाम पर विकास को बंधक बनाने वाले इन NGOs का धंधा FCRA की कड़ी निगरानी ने पूरी तरह बंद कर दिया है। अब चूंकि हर प्रोजेक्ट के लिए आने वाले फंड का ‘अंतिम दाता’ और उसकी उपयोगिता सरकार की रडार पर है, इसलिए विकास विरोधी लॉबी पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई है.
सच्ची जनसेवा करने वाले संगठन कभी भी संपत्तियों के साम्राज्य खड़े नहीं करते। लेकिन भारत में कई ऐसे NGOs पनप गए थे, जो विदेशों से समाज कल्याण के नाम पर अरबों रुपये लाते थे और उनसे आलीशान इमारतें, होटल, फार्महाउस और व्यावसायिक संपत्तियां खड़ी कर लेते थे। जब सरकार उनके नियमों के उल्लंघन पर उनका लाइसेंस रद्द करती थी, तो वे उन संपत्तियों को बेचकर या घरेलू ट्रस्टों में ट्रांसफर करके बच निकलते थे। FCRA संशोधन विधेयक 2026 ने इस लूपहोल को हमेशा के लिए बंद कर दिया है. विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी संगठन का लाइसेंस सरकार द्वारा रद्द किया जाता है, या वह खुद सरेंडर करता है, या समय पर रिन्यू नहीं करा पाता तो उस विदेशी पैसे से खड़ी की गई तमाम चल-अचल संपत्तियां एक ‘नामित प्राधिकरण’ के अधीन अनंतिम रूप से निहित हो जाएंगी. यदि संस्था अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाती, तो ये संपत्तियां स्थायी रूप से सरकारी मंत्रालयों या विभागों को जनहित के कार्यों के लिए सौंप दी जाएंगी या उन्हें बेचकर पैसा भारत के संचित कोष में जमा कर दिया जाएगा. अपनी अवैध रूप से कमाई गई जागीर छिन जाने का यह डर ही इन गलत लोगों की बौखलाहट का सबसे बड़ा कारण है।
लोकतंत्र में जनमत का निर्माण स्वतंत्र रूप से होना चाहिए। लेकिन विदेशी एजेंसियां भारत के बुद्धिजीवियों, चुनिंदा पत्रकारों, थिंक-टैंक्स और शैक्षणिक संस्थानों को भारी-भरकम ग्रांट (अनुदान) देकर देश के भीतर एक खास तरह का ‘नैरेटिव वारफेयर’ चलाती रही हैं। इसका उद्देश्य भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करना, देश की न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना और चुनावों को प्रभावित करना होता है। FCRA कानून स्पष्ट रूप से किसी भी राजनीतिक उम्मीदवार, राजनीतिक दल, सांसद, विधायक, न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी और मुख्यधारा के पत्रकारों को विदेशी फंड लेने से प्रतिबंधित करता है. जब २०२० और २०२६ के सख्त नियमों ने इन छद्म बुद्धिजीवियों और एजेंडा-ड्रिवेन पत्रकारों के खातों को फ्रीज करना शुरू किया, तो विदेशी मीडिया में ‘भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे’ के लेख छपने लगे। असल में यह आजादी पर खतरा नहीं, बल्कि विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले नैरेटिव निर्माताओं के एकाधिकार पर खतरा है।
पहले के दौर में विदेशी फंडिंग का एक स्थापित मॉडल था: विदेशों से पैसा दिल्ली या मुंबई के किसी बड़े नामी-गिरामी NGO के खाते में आता था। वह NGO अपनी मर्जी से उस पैसे को देश भर के सैकड़ों छोटे और गैर-पंजीकृत NGOs या सोसायटियों को ‘सब-ग्रांट’ के रूप में बांट देता था। इस प्रक्रिया में मुख्य डोनर का पता लगाना और पैसे के वास्तविक इस्तेमाल को ट्रैक करना नामुमकिन हो जाता था। इस पैसे का इस्तेमाल अक्सर नक्सल प्रभावित इलाकों में बगावत फैलाने या कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पथराव करने वालों को फंडिंग देने के लिए किया जाता था। २०२० के संशोधन ने सब-ग्रांटिंग को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। इसके बाद २०२६ के नियमों ने यह अनिवार्य कर दिया कि यदि कोई विदेशी फंड किसी मध्यस्थ के माध्यम से आ रहा है, तो अंतिम लाभार्थी तक पहुंचने से पहले उसके मूल डोनर की पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। साथ ही, किसी भी प्रोजेक्ट की अगली किस्त तभी जारी होगी जब पिछली किस्त का कम से कम 75% हिस्सा वैध रूप से खर्च हो चुका हो। इस वित्तीय कड़ाई ने फर्जी बिल लगाने वाले और कागजों पर NGO चलाने वाले शातिर अपराधियों की कमर तोड़ दी है।





