सियासत के रंग में भगवा क्यों?

Why saffron in the hues of politics?

एडवोकेट, जयदेव राठी

संसद का परिसर केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है। यहाँ देश के भविष्य का निर्माण होता है, कानून बनते हैं और राष्ट्र की दिशा तय होती है। लेकिन, संसद परिसर में जो दृश्य देखने को मिला, उसने न केवल संसदीय मर्यादाओं को तार-तार किया, बल्कि करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के गहरे घाव भी लगाए।

संसद परिसर में शुक्रवार को जो दृश्य देखने को मिला, वह भारतीय राजनीति के गिरते स्तर का एक और प्रमाण बनकर सामने आया है। पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव भगवा वस्त्र पहनकर, साधू का रूप धारण कर, हाथ में दानपेटी लेकर संसद के मकर द्वार के पास बैठ गए और अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी को लेकर एक प्रतीकात्मक नाटक प्रस्तुत किया। इस दौरान राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई अन्य नेताओं ने भी सांकेतिक रूप से चंदा देकर इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया। पप्पू यादव ने दानपेटी में डाले गए पैसे अपनी जेब में रखकर यह दिखाने की कोशिश की कि मंदिर के चढ़ावे में किस तरह चोरी हो रही है, और फिर दानपेटी लेकर भागने का नाटक भी किया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, वह एक राजनीतिक विरोध से कहीं अधिक एक सांस्कृतिक अपमान की श्रेणी में आता है। यह प्रश्न केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की पोल खोलता है जो सनातन धर्म की ‘सहिष्णुता’ को उसकी कमजोरी समझती है। जब एक सांसद भगवा ओढ़कर नकली साधु बनता है, तो वह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि त्याग, तप और आस्था के उस प्रतीक का अपमान करता है जिसने हजारों वर्षों से इस समाज को दिशा दी है। विपक्ष द्वारा इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘चंदा चोरी’ या धार्मिक स्थलों पर होने वाले अवैध वसूली के खिलाफ आवाज उठाना बताया जा रहा है। यदि समाज में भ्रष्टाचार है, यदि कोई कर्मचारी या अधिकारी धार्मिक स्थलों पर धन की हेराफेरी कर रहा है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और संसद में बहस होनी चाहिए। लेकिन, विपक्ष ने यहाँ ‘तथ्य’ को ‘प्रतीक’ से बदल दिया।

जैसा कि आम जनता और पीड़ित पक्ष जानते हैं, ‘चंदा चोरी’ जैसी घटनाओं में अक्सर प्रशासनिक कर्मचारी, अधिकारी या विशिष्ट व्यक्ति शामिल पाए गए हैं, न कि परंपरागत साधु-संत। साधु का भगवा वस्त्र त्याग का प्रतीक है, लोभ का नहीं। जब विपक्ष के नेता भगवा ओढ़कर चोर का नाटक करते हैं, तो वे वास्तविक दोषियों को बचा रहे होते हैं और साधु-संतों की पवित्र छवि को धूमिल कर रहे होते हैं।

यह एक बौद्धिक बेईमानी है। यदि आरोपी ‘टीनू यादव’ या कोई अन्य विशिष्ट व्यक्ति या कर्मचारी है, तो उसका चेहरा दिखाकर या उसका नाम लेकर विरोध किया जाना चाहिए था। लेकिन, सामूहिक रूप से साधुओं के भेष का उपहास करना यह दर्शाता है कि यहाँ मुद्दा ‘भ्रष्टाचार मिटाना’ नहीं, बल्कि ‘सनातन की भावना को आहत करना’ है। जहाँ वास्तविक दुश्मन से लड़ने के बजाय, एक कमजोर और पवित्र प्रतीक को निशाना बनाया जाता है।

इस घटना ने एक बार फिर उस पुराने और कड़वे सत्य को उजागर किया है कि सनातन धर्म की सहिष्णुता का राजनीतिक दलों द्वारा कितना दुरुपयोग किया जा रहा है। सनातन धर्म ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘क्षमा’ का धर्म है। इसकी जड़ें इतनी गहरी और विस्तृत हैं कि यह अपमान को सहकर भी आगे बढ़ जाता है। लेकिन, क्या इस सहिष्णुता को कमजोरी समझा जा सकता है?

यदि किसी अन्य धर्म के प्रतीकों, उनके धर्मगुरुओं या उनके पवित्र ग्रंथों को लेकर संसद में ऐसा कोई ‘ड्रामा’ किया जाए, तो विपक्ष के पास इतनी हिम्मत नहीं होगी। अन्य धर्मों में विरोध का स्तर इतना तीव्र और कड़ा होता है कि कोई भी राजनीतिक दल ऐसा जोखिम नहीं उठाता। लेकिन सनातन धर्म के मामले में, नेतागण यह मानकर चलते हैं कि “इससे कोई बड़ा विद्रोह नहीं होगा, साधु-संत मौन रहेंगे और समाज सहन कर लेगा।”

यह एक खतरनाक खेल है। सहिष्णुता का अर्थ कमजोरी नहीं होता। जब तक सनातन समाज और साधु-संत इस तरह के अपमान पर मौन हैं या केवल ट्वीटर तक सीमित हैं, तब तक राजनीतिक दल इसे अपनी ‘कमजोरी’ समझकर ऐसे हथकंडे अपनाते रहेंगे। कल का ड्रामा इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष को पता है कि सनातन की आस्था को ठेस पहुँचाने की ‘राजनीतिक कीमत’ उन्हें चुकानी नहीं पड़ेगी, या कम से कम वे ऐसा ही मानते हैं।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस तरह के नाटकीय प्रदर्शनों से विपक्ष को राजनीतिक लाभ मिलेगा? उत्तर स्पष्ट है—कतई नहीं।
आज का मतदाता जागरूक है। वह जानता है कि संसद में शोर मचाने से, भेष बदलने से या धार्मिक भावनाओं को आहत करने से सरकार नहीं गिरती। उल्टा, ऐसे कृत्य मतदाताओं को विपक्ष से और अधिक दूर कर रहे हैं। जब एक सांसद संसद जैसी गरिमामयी जगह पर भगवा ओढ़कर ‘चोर’ बनता है, तो वह अपनी और अपने दल की गरिमा को भी गिराता है। जनता यह देख रही है कि विपक्ष के पास न तो कोई ठोस वैकल्पिक एजेंडा है, न ही विकास का कोई रोडमैप, और न ही बहस करने की क्षमता। उनके पास केवल बचा है तो ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ और ‘धार्मिक प्रतीकों का उपहास’।

इतिहास गवाह है कि जब-जब भी सनातन की आस्था का अपमान किया गया है, उसका परिणाम राजनीतिक दलों के लिए विनाशकारी रहा है। समाज जागता है, और वह भी एक ऐसी शक्ति के रूप में जो राजनीतिक गणित को पूरी तरह बदल देती है। विपक्ष के नेताओं को यह समझना होगा कि ‘भगवा’ केवल एक रंग नहीं, बल्कि एक चेतना है। इस चेतना का उपहास करने वाले राजनीतिक दल अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

इस घटना ने संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। संसद का परिसर, जहाँ देश के सबसे बुद्धिजीवी और चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं, वहाँ यदि बहस के स्तर पर गिरावट आएगी और प्रतीकों का अपमान शुरू होगा, तो लोकतंत्र की आत्मा मर जाएगी।

विपक्ष का कर्तव्य है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें उन माध्यमों का चुनाव करना चाहिए जो समाज की मर्यादा का सम्मान करते हों। यदि वास्तव में ‘चंदा चोरी’ का मामला गंभीर है, तो जांच एजेंसियों को सक्रिय किया जाए, सदन में श्वेत पत्र लाया जाए, लेकिन साधुओं के भेष में आकर पूरे सनातन तंत्र को ‘चोर’ करार देना, यह न तो लोकतंत्र है और न ही विरोध। यह केवल ‘हीन भावना’ का प्रदर्शन है।

अंततः, कल की घटना एक चेतावनी है। यह चेतावनी विपक्ष के लिए है कि वे सनातन की सहिष्णुता को उसकी दुर्बलता न समझें। यह चेतावनी समाज के लिए भी है कि वे अपनी आस्था के प्रतीकों की रक्षा के लिए जागरूक रहें।

राजनीति धर्म से ऊपर नहीं हो सकती, और जब राजनीति धर्म का उपहास करने लगे, तो वह पतन के मार्ग पर अग्रसर होती है। पप्पू यादव और अन्य विपक्षी सदस्यों द्वारा किया गया यह ड्रामा न तो किसी भ्रष्टाचारी को सजा दिलाएगा और न ही विपक्ष को सत्ता दिलाएगा। यह केवल इतिहास के पन्नों में एक ‘काले अध्याय’ के रूप में दर्ज होगा, जब राजनीति ने सनातन की पवित्रता को अपने स्वार्थ की बलि की चढ़ा दिया था।

सनातन धर्म सहिष्णु है, लेकिन सहनशील नहीं। समय आ गया है कि राजनीतिक दल यह समझें कि भारत की आस्था उनके वोट बैंक की राजनीति से कहीं अधिक गहरी और शक्तिशाली है। भगवा रंग, श्री राम की मूर्ति और साधु का भेष—ये केवल प्रतीक नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की चेतना हैं। और चेतना का उपहास करने वालों का अंत हमेशा दुखद ही हुआ है।