नीति गोपेन्द्र भट्ट
श्रावण मास के आगमन के साथ ही देश का एक बड़ा भूभाग शिवभक्ति के रंग में रंग जाता है। गंगोत्री, हरिद्वार, गौमुख, सुल्तानगंज और अन्य पवित्र तीर्थों से गंगाजल लेकर अपने आराध्य भगवान शिव का जलाभिषेक करने निकलने वाले लाखों कांवड़ियों का उत्साह भारतीय धार्मिक परंपरा का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तप, त्याग, आत्मानुशासन और सामूहिक विश्वास का विराट लोकपर्व है। किंतु बदलते समय में कांवड़ यात्रा जितनी भव्य हुई है, उतनी ही उसके स्वरूप और उससे जुड़ी चुनौतियों पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता भी बढ़ी है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में तीर्थयात्राएं आत्मशुद्धि और लोककल्याण का माध्यम रही हैं। कांवड़ यात्रा भी इसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी है। सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा, कठिन मौसम, सीमित संसाधनों में संयमपूर्वक यात्रा और भगवान शिव के प्रति अटूट समर्पण श्रद्धालुओं की आस्था की गहराई को प्रमाणित करता है। मार्ग में जगह-जगह लगने वाले सेवा शिविर भारतीय समाज की सेवा, दान और सहयोग की परंपरा को भी सुदृढ़ करते हैं। यही कारण है कि कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता का भी बड़ा उत्सव बन चुकी है।
पिछले कुछ वर्षों में इस यात्रा का स्वरूप तेजी से बदला है। आधुनिक साज-सज्जा, डीजे, आकर्षक झांकियां, सोशल मीडिया पर प्रदर्शन और बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी ने इसे नया रूप दिया है। उत्साह और ऊर्जा किसी भी धार्मिक आयोजन की पहचान हो सकते हैं, लेकिन जब प्रदर्शन श्रद्धा पर हावी होने लगे, तब मूल उद्देश्य प्रभावित होने लगता है। धर्म का सार विनम्रता, संयम और आत्मनियंत्रण है, न कि शक्ति प्रदर्शन या प्रतिस्पर्धा।
यात्रा के दौरान कभी-कभी सामने आने वाली हिंसा, सड़क जाम, ध्वनि प्रदूषण, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या प्रशासन से टकराव जैसी घटनाएं पूरे आयोजन की छवि को धूमिल कर देती हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे मामलों में शामिल लोगों की संख्या लाखों श्रद्धालुओं की तुलना में अत्यंत कम होती है, फिर भी कुछ घटनाएं पूरे समाज की धारणा को प्रभावित करती हैं। इसलिए धार्मिक संगठनों, स्वयंसेवकों और प्रशासन की संयुक्त जिम्मेदारी है कि असामाजिक तत्वों को अलग रखते हुए यात्रा की गरिमा बनाए रखें।
दूसरी ओर, प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती होती है। लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सुविधाएं, स्वच्छता और कानून-व्यवस्था बनाए रखना आसान कार्य नहीं है। विशेषकर नेपाल सहित पड़ोसी क्षेत्रों में हाल के घटनाक्रमों और बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए बड़े धार्मिक आयोजनों में अतिरिक्त सतर्कता समय की मांग बन गई है। इसी दृष्टि से यदि प्रशासन कुछ प्रतिबंध लागू करता है या सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश जारी करता है, तो उनका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं तथा आम नागरिकों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कांवड़ यात्रा को आस्था और अनुशासन के आदर्श उदाहरण के रूप में स्थापित किया जाए। श्रद्धालु स्वयं यह संकल्प लें कि उनकी भक्ति किसी दूसरे नागरिक के लिए असुविधा का कारण नहीं बनेगी। प्रशासन भी संवाद, संवेदनशीलता और बेहतर व्यवस्थाओं के माध्यम से यात्रा को अधिक सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाए। जब श्रद्धा के साथ जिम्मेदारी जुड़ती है, तभी धार्मिक आयोजन समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं।
कांवड़ियों का जुनून भारतीय संस्कृति की जीवंत शक्ति का प्रतीक है। यह जुनून यदि सेवा, संयम, सद्भाव और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ जाए, तो कांवड़ यात्रा केवल शिवभक्ति का पर्व नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का भी अनुपम उदाहरण बन जाएगी। यही इस महान परंपरा का वास्तविक संदेश है और यही उसकी स्थायी शक्ति भी।





