सत्य भूषण शर्मा
6 अगस्त 1945—विश्व इतिहास का वह दिन, जिसने विज्ञान की उपलब्धियों को मानवता के सबसे बड़े प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया। जापान के हिरोशिमा शहर पर गिराए गए परमाणु बम ने केवल एक नगर को नहीं उजाड़ा, बल्कि पूरी सभ्यता के अंतःकरण को झकझोर दिया। कुछ ही क्षणों में हजारों लोग भाप बनकर विलीन हो गए, लाखों लोग विकिरण के दुष्प्रभावों से वर्षों तक तिल-तिल मरते रहे और आने वाली पीढ़ियाँ भी उस त्रासदी का बोझ उठाती रहीं। तीन दिन बाद नागासाकी पर दूसरा परमाणु हमला हुआ और मानव इतिहास ने यह स्वीकार किया कि युद्ध की अंधी दौड़ में नैतिकता सबसे पहले मरती है।
हिरोशिमा दिवस केवल शोक का दिवस नहीं है; यह आत्ममंथन, चेतना और संकल्प का दिवस भी है। यह हमें याद दिलाता है कि तकनीकी श्रेष्ठता यदि मानवीय संवेदनाओं से अलग हो जाए, तो वही विज्ञान सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, क्वांटम तकनीक और जैव-प्रौद्योगिकी के नए युग में प्रवेश कर रही है, तब हिरोशिमा की स्मृति पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।
विज्ञान ने मनुष्य को असंभव प्रतीत होने वाले कार्य संभव करने की शक्ति दी है। इसी विज्ञान ने रोगों का उपचार खोजा, संचार को वैश्विक बनाया, अंतरिक्ष तक पहुँचाया और ऊर्जा के नए स्रोत उपलब्ध कराए। किंतु यही विज्ञान जब युद्ध की राजनीति, सामरिक वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन का उपकरण बन जाता है, तब उसका स्वरूप कल्याणकारी नहीं, विनाशकारी हो जाता है। दोष विज्ञान का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो ज्ञान को प्रभुत्व स्थापित करने का माध्यम मानती है।
आज विश्व फिर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ अनेक क्षेत्रों में युद्ध, सीमा विवाद, सामरिक प्रतिस्पर्धा और परमाणु शक्ति का प्रदर्शन बढ़ता दिखाई देता है। महाशक्तियाँ आधुनिकतम परमाणु हथियार विकसित कर रही हैं। अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें, हाइपरसोनिक तकनीक, सामरिक परमाणु हथियार और स्वचालित युद्ध प्रणालियाँ मानव सभ्यता के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही हैं। यदि कभी ऐसी परिस्थितियों में परमाणु संघर्ष हुआ तो उसका प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पर्यावरण, जलवायु, कृषि, स्वास्थ्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका विनाशकारी प्रभाव पूरी मानवता को झेलना पड़ेगा।
हिरोशिमा हमें यह भी सिखाता है कि सुरक्षा केवल हथियारों के भंडार से नहीं आती। वास्तविक सुरक्षा विश्वास, संवाद और सहयोग से जन्म लेती है। शस्त्रों की होड़ कभी स्थायी शांति नहीं ला सकती। इतिहास गवाह है कि जितने अधिक हथियार बने, उतनी ही अधिक आशंकाएँ और अविश्वास भी बढ़े। इसलिए विश्व समुदाय को हथियारों की प्रतिस्पर्धा से अधिक मानव विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और गरीबी उन्मूलन पर निवेश करना चाहिए। यदि अरबों डॉलर युद्ध की तैयारी के बजाय मानव कल्याण पर व्यय हों, तो विश्व का स्वरूप ही बदल सकता है।
भारत की सांस्कृतिक चेतना सदैव शांति, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की पक्षधर रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने वाली जीवन-दृष्टि है। भगवान बुद्ध का करुणा का संदेश, भगवान महावीर का अहिंसा सिद्धांत और महात्मा गांधी का सत्याग्रह आज भी विश्व को दिशा देने की क्षमता रखते हैं। भारत ने समय-समय पर वैश्विक शांति, परमाणु निरस्त्रीकरण और संवाद आधारित समाधान की वकालत की है। यही दृष्टिकोण आज के अशांत विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हिरोशिमा की त्रासदी का सबसे बड़ा सबक यह है कि युद्ध में कोई वास्तविक विजेता नहीं होता। विजेता भी अंततः भय, अविश्वास और असुरक्षा के वातावरण में जीता है। युद्ध केवल शहरों को नहीं, मनुष्यता की आत्मा को भी घायल करता है। युद्ध के बाद पुनर्निर्माण संभव है, लेकिन खोई हुई जिंदगियाँ, बिखरे हुए परिवार और पीढ़ियों तक चलने वाला मानसिक आघात कभी वापस नहीं लौटता।
आज आवश्यकता केवल परमाणु हथियारों को सीमित करने की नहीं, बल्कि हिंसक मानसिकता को बदलने की है। जब तक मनुष्य के भीतर घृणा, वर्चस्व और प्रतिशोध की भावना जीवित रहेगी, तब तक किसी भी संधि की सफलता अधूरी रहेगी। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में शांति, सहिष्णुता, वैज्ञानिक नैतिकता और वैश्विक नागरिकता जैसे मूल्यों को विशेष स्थान देना होगा। नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि विज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य जीवन की रक्षा है, उसका विनाश नहीं।
एक भौतिकी शिक्षक होने के नाते मैं यह अनुभव करता हूँ कि विज्ञान का प्रत्येक सिद्धांत मानव जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है। परमाणु ऊर्जा भी चिकित्सा, कृषि, उद्योग और ऊर्जा उत्पादन में वरदान बन सकती है, यदि उसका उपयोग मानव हित में किया जाए। किंतु वही ऊर्जा यदि युद्ध का हथियार बन जाए तो उसका परिणाम हिरोशिमा और नागासाकी जैसी त्रासदियों के रूप में सामने आता है। इसलिए वैज्ञानिक प्रगति के साथ नैतिक शिक्षा का समन्वय अनिवार्य है।
संयुक्त राष्ट्र और विश्व समुदाय को परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में अधिक प्रभावी, पारदर्शी और बाध्यकारी प्रयास करने होंगे। केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं। विश्व के शक्तिशाली देशों को उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यदि वे स्वयं हथियारों का भंडार बढ़ाते रहेंगे और दूसरों को संयम का उपदेश देंगे, तो वैश्विक विश्वास स्थापित नहीं हो सकेगा।
हिरोशिमा दिवस हमें यह भी सोचने के लिए विवश करता है कि क्या विकास का अर्थ केवल सैन्य शक्ति है? क्या किसी राष्ट्र की महानता उसके परमाणु शस्त्रागार से तय होगी या उसके नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से? यदि उत्तर दूसरा है, तो हमें विकास की अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा।
आज आवश्यकता है कि विश्व “शक्ति के संतुलन” की राजनीति से आगे बढ़कर “विश्वास के संतुलन” की राजनीति अपनाए। सीमाएँ सुरक्षित रहें, यह आवश्यक है; किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि मानवता सुरक्षित रहे। शांति कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी सामूहिक शक्ति है।
हिरोशिमा की राख से उठती हुई मौन पुकार आज भी समूची मानवता को चेतावनी देती है—यदि इतिहास से सबक नहीं लिया गया, तो इतिहास स्वयं को दोहराने में देर नहीं लगाएगा। आइए, इस हिरोशिमा दिवस पर हम संकल्प लें कि विज्ञान को विनाश नहीं, विकास का माध्यम बनाएँगे; शक्ति को दमन नहीं, संरक्षण का साधन बनाएँगे; और विश्व को भय नहीं, विश्वास की दिशा में आगे बढ़ाएँगे। यही उन लाखों निर्दोष लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने मानवता की सबसे भयावह त्रासदी का दर्द सहा।





