अशोक भाटिया
भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीति, समाज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गोवंश हमेशा से एक केंद्रीय बिंदु रहा है। हाल ही में राज्य की योगी सरकार द्वारा ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने का जो पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, उसने नीतिगत गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है। बुलंदशहर जिले के 15 गांवों से शुरू हुई यह पहल प्रथम दृष्ट्या केवल एक पारंपरिक या धार्मिक एजेंडे का हिस्सा दिखाई दे सकती है, लेकिन जब हम इसके अंतर्निहित आर्थिक ढांचे, सप्लाई चेन और ग्रामीण रोजगार के मॉडल का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो यह पारंपरिक पशुपालन को एक आधुनिक औद्योगिक मूल्य श्रृंखला से जोड़ने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास नजर आता है। किसी भी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसका विचार कितना लोक-लुभावन है, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि उसके पीछे कितना व्यावहारिक ‘दम’ है और उसे जमीन पर उतारने के लिए ‘कितनी तैयारी’ की गई है। यह संपादकीय इसी यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने का एक गंभीर प्रयास है।
इस योजना के वास्तविक ‘दम’ को समझने के लिए हमें ग्रामीण भारत के वर्तमान संकट, विशेषकर लावारिस गोवंश की समस्या और खेती की बढ़ती लागत को समझना होगा। अब तक भारत में पशुपालन का पूरा अर्थशास्त्र केवल दुग्ध उत्पादन पर टिका रहा है। जैसे ही कोई गाय दूध देना बंद कर देती है, वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक आर्थिक बोझ बन जाती है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में लावारिस और अनुत्पादक पशुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिससे न केवल फसलें बर्बाद हो रही हैं बल्कि सामाजिक और कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी तनाव पैदा हो रहा है। सरकार का यह नया मॉडल इसी संकट को एक अवसर में बदलने का दावा करता है। यदि एक किसान को दूध न देने वाली गाय से भी प्रतिदिन चार से पांच लीटर गोमूत्र प्राप्त होता है, तो ₹10 प्रति लीटर की दर से वह प्रतिदिन ₹40 से ₹50 की अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है। भविष्य में इस खरीद दर को ₹20 प्रति लीटर तक ले जाने का जो प्रस्ताव है, वह इस आय को दोगुना कर सकता है। यह सीधे तौर पर अनुत्पादक गोवंश को ‘आर्थिक रूप से उत्पादक’ बनाने का गणित है, जो किसानों को अपने मवेशियों को खुला छोड़ने से रोकेगा।
इस योजना का दूसरा सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ जैविक और प्राकृतिक खेती को मिलने वाला प्रोत्साहन है। वर्तमान में रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर सरकारी सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है, और इसके साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी क्षीण हो रही है। एकत्र किए गए गोमूत्र का उपयोग विभिन्न स्थानीय जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाले नीमस्त्र, ब्रह्मास्त्र और जीवामृत जैसे जैविक कीटनाशक और फसल संवर्धक बनाने में किया जाना तय हुआ है। यह कृषि की लागत को कम करने का एक विकेंद्रीकृत मॉडल है। यदि ग्रामीण स्तर पर ही कीटनाशकों का निर्माण होने लगे, तो किसानों को महंगे कॉपोरेट रसायनों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे अंततः ग्रामीण धन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भीतर ही घूमता रहेगा।
कोई भी नीति कितनी भी दूरदर्शी क्यों न हो, यदि उसकी प्रशासनिक और ढांचागत तैयारी कमजोर है, तो वह दम तोड़ देती है। इस मामले में, उत्तर प्रदेश सरकार ने सीधे तौर पर सरकारी मशीनरी पर निर्भर रहने के बजाय किसान उत्पादक संगठनों और महिला स्वयं सहायता समूहों को इस व्यवस्था की रीढ़ बनाया है, जो एक समझदारी भरा कदम है। बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव से संचालित हो रहा पायलट प्रोजेक्ट इसका जीवंत उदाहरण है। इस मॉडल में ग्रामीण महिलाओं को एफपीओ का शेयरहोल्डर बनाया गया है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हुई है।
तैयारी के स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक लक्ष्यित गांव में 200 लीटर की क्षमता वाले विशेष संग्रहण टैंक स्थापित किए जा रहे हैं। यह कदम इसलिए आवश्यक है क्योंकि गोमूत्र जैसी तरल और जल्दी खराब होने वाली वस्तु के लिए तत्काल भंडारण की व्यवस्था होना अनिवार्य है। इससे भी अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण यह है कि गोमूत्र का संग्रह करने वाली ग्रामीण महिलाओं को ₹2 प्रति लीटर का सीधा कमीशन दिया जा रहा है। यह व्यवस्था दोतरफा काम करती है—एक तरफ तो यह महिलाओं के लिए गांव के भीतर ही एक नियमित और सम्मानजनक रोजगार की गारंटी देती है, वहीं दूसरी तरफ यह सप्लाई चेन में शुद्धता और समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत प्रोत्साहन का काम करती है। वर्तमान में इन 15 गांवों से प्रतिदिन लगभग 500 लीटर गोमूत्र का संग्रह होना यह साबित करता है कि शुरुआती स्तर पर लॉजिस्टिक्स and सप्लाई चेन का ढांचा काम कर रहा है।
बुलंदशहर के शुरुआती आंकड़े भले ही उत्साहजनक हों, लेकिन जब हम इस मॉडल को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों और हजारों गांवों में लागू करने की बात करते हैं, तो चुनौतियों का एक विशाल पहाड़ सामने खड़ा दिखाई देता है। सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता नियंत्रण की है। आयुर्वेद और जैविक कृषि के सिद्धांतों के अनुसार, केवल स्वस्थ और विशेषकर देसी नस्ल के गोवंश का गोमूत्र ही दवाओं और प्रभावी कीटनाशकों के लिए उपयुक्त माना जाता है। बड़े पैमाने पर संग्रहण के दौरान इस बात की निगरानी कैसे की जाएगी कि एकत्र किया जा रहा तरल शुद्ध है और उसमें पानी या अन्य मिलावट नहीं है? इसके लिए ग्रामीण स्तर पर त्वरित और सस्ती टेस्टिंग किट विकसित करनी होगी, अन्यथा घटिया गुणवत्ता का कमी का कच्चा माल पूरे प्रसंस्करण उद्योग को ठप कर सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती बाजार लिंकेज की है। गोमूत्र का संग्रह करना और उससे कीटनाशक बनाना प्रक्रिया का केवल आधा हिस्सा है। असली परीक्षा तब होगी जब इन जैविक उत्पादों को बाजार में स्थापित ब्रांडों के मुकाबले बेचा जाएगा। क्या भारतीय किसान, जो लंबे समय से रासायनिक खादों के त्वरित परिणामों के आदी हो चुके हैं, इन जैविक कीटनाशकों को उतनी ही सहजता से अपनाएंगे? इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्रों और विस्तार कार्यकर्ताओं के माध्यम से व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता होगी। यदि अंतिम उत्पाद की बिक्री सुचारू रूप से नहीं हुई, तो एफपीओ के पास स्टॉक जमा हो जाएगा और वे किसानों को ₹10 प्रति लीटर का भुगतान करने में असमर्थ हो जाएंगे, जिससे पूरी व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है। इसके अतिरिक्त, छत्तीसगढ़ की ‘गोधन न्याय योजना’ के अनुभवों से उत्तर प्रदेश को सीखना होगा, जहां गोबर खरीद के दौरान वित्तीय प्रबंधन और भंडारण की गंभीर समस्याएं सामने आई थीं।
इस प्रकार के गो-आधारित आर्थिक प्रयोगों पर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं काफी तीखी और आलोचनात्मक रही हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने पूर्व में सरकार की प्राथमिकताओं पर तंज कसते हुए कहा था कि सत्तारूढ़ दल को विकास के आधुनिक मॉडलों (जैसे इत्र पार्क) के मुकाबले केवल गौशालाओं की राजनीति पसंद है, और उन्होंने आरोप लगाया कि सांडों को पकड़ने और गोवंश प्रबंधन के नाम पर आने वाले बजट का दुरुपयोग हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस जैसी पार्टियों ने इस दृष्टिकोण की आलोचना की है। हाल ही में संसद के भीतर एक बहस के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सरकारी पैनलों में पारंपरिक मान्यताओं को थोपने का विरोध करते हुए तंज भरे लहजे में ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जिसके बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
विपक्षी खेमे का मुख्य तर्क यह है कि ऐसी योजनाएं ग्रामीण संकटों, जैसे बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई से जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास मात्र हैं। इसके अलावा, वैज्ञानिक समुदाय के एक वर्ग और तर्कवादियों का भी सहारा लेकर विपक्ष इसे जनहित के पैसों को बिना किसी ठोस आधुनिक वैज्ञानिक प्रामाणिकता के ‘आस्था आधारित छद्म विज्ञान’ पर खर्च करने की नीति करार देता है। उनका मानना है कि गोमूत्र खरीद जैसे लोक-लुभावन कदमों के बजाय बुनियादी ग्रामीण बुनियादी ढांचे और किसानों की मुख्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को मजबूत करने पर सरकारी धन खर्च होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में गोमूत्र खरीद का यह पायलट प्रोजेक्ट ग्रामीण विकास की दिशा में एक लीक से हटकर उठाया गया कदम है। इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने, रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को कम करने और लावारिस पशुओं की समस्या का मानवीय व आर्थिक समाधान खोजने का पूरा ‘दम’ मौजूद है। बुलंदशहर की ढांचागत तैयारी यह दर्शाती है कि सरकार इस बार केवल कागजी घोषणाओं के भरोसे नहीं है, बल्कि उसने विकेंद्रीकृत भंडारण और महिला-केंद्रित प्रोत्साहन मॉडल के रूप में एक व्यावहारिक शुरुआत की है।
हालांकि, इसे एक दीर्घकालिक और आत्मनिर्भर आर्थिक क्रांति में बदलने के लिए सरकार को इसे केवल एक सरकारी योजना के रूप में देखने के बजाय एक ‘बिजनेस स्टार्टअप’ की तरह प्रबंधित करना होगा। राज्यव्यापी विस्तार से पहले कॉर्पोरेट जगत के सहयोग से इसके विपणन को मजबूत करना होगा और प्रसंस्करण इकाइयों की तकनीक को अपग्रेड करना होगा। यदि उत्तर प्रदेश सरकार इन ढांचागत और व्यावहारिक चुनौतियों को पार करने में सफल रहती है, तो यह मॉडल न केवल यूपी के ग्रामीण परिदृश्य को बदल देगा, बल्कि पूरे देश के सामने गाय, किसान और भूमि के अंतर्संबंधों को पुनर्जीवित करने का एक अनूठा ‘गोधन अर्थशास्त्र’ प्रस्तुत करेगा।





