निर्मल रानी
हमारे देश में पिछले एक दशक से भारत को विश्वगुरु बनाने का ढोल पीटा जा रहा है। इसी विमर्श के समानांतर इस समय देश में शिक्षा को लेकर भी बड़ी बहस छिड़ी हुई है। अतः इसी सन्दर्भ में यह सवाल भी ज़रूरी हो गया है कि क्या शिक्षा के बिना या शिक्षित हुये बिना भी भारत विश्वगुरु बन सकता है ? नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में देशभर में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल या तो पूरी तरह बंद किये जा चुके हैं या उनका अन्य स्कूलों में विलय कर दिया गया है। । UDISE अर्थात यूनिफ़ाइड डिस्ट्रिक्ट इंफ़ोर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन के हालिया आंकड़े व नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, एक साल के भीतर देश भर में 4,791 स्कूल बंद हुए हैं। इसकी वजह से शहरों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी निजी स्कूलों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। परिणामस्वरूप शिक्षा ग़रीबों की पहुँच से दूर हो चुकी है। और जो स्कूल चल भी रहे हैं उनमें से अधिकांश की हालत किसी से छुपी नहीं है। यहाँ अक्टूबर 2022 की गुजरात की उस घटना का ज़िक्र भी प्रासंगिक है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गांधीनगर के अडालज में ‘मिशन स्कूल्स ऑफ़ एक्सीलेंस’ के शुभारंभ के दौरान अस्थाई रूप से बनाये गये एक मॉडल क्लासरूम में बच्चों के साथ बैठे नज़र आये थे। सरकार के अनुसार, इस योजना का उद्देश्य गुजरात के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब और डिजिटल बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण करना बताया गया था। उस समय विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि प्रधानमंत्री जिस क्लासरूम में बैठे थे, वह एक अस्थायी या कृत्रिम क्लासरूम था। संबंधित तस्वीरों का हवाला देते हुए दीवारों और खिड़कियों के पेंटिंग के स्टिकर होने का दावा किया गया था और इसे ‘फ़ोटो शूट’ क़रार दिया था। परन्तु अधिकारियों ने इसके जवाब में यह कहा था कि यह आगामी डिजिटल स्मार्ट स्कूलों का एक मॉडल प्रस्तुतीकरण था जो यह प्रदर्शित करने के लिए था कि भविष्य के क्लास रूम कैसे नज़र आयेंगे। तो सवाल यह है कि गत चार वर्षों में मिशन स्कूल्स ऑफ़ एक्सीलेंस योजना के तहत अब तक उन मॉडल क्लासरूम की तरह देश में कितने आधुनिक क्लासरूम व आधुनिक स्कूल बनाये गये ?
दूसरी ओर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार के दौरान अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रम्प ने 25 फ़रवरी 2020 को नई दिल्ली के मोतीबाग़ स्थित सर्वोदय सह-शिक्षा वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का दौरा किया था। दिल्ली के सरकारी स्कूलों और यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को देखने के लिए कई अन्य विदेशी मेहमान और प्रतिनिधिमंडल भी आ चुके हैं। समय-समय पर विभिन्न देशों के शिक्षाविद, राजनयिक और प्रतिनिधिमंडल दिल्ली के सरकारी स्कूलों की बुनियादी संरचना, कक्षाओं और शैक्षणिक गतिविधियों का निरीक्षण करने दिल्ली आते रहे हैं। क्या इसी तरह के आधुनिक सरकारी स्कूल पूरे देश में संचालित नहीं हो सकते ? क्या वजह है कि देश के अधिकांश राज्यों में अनेकानेक सरकारी स्कूल भवन जर्जर हैं ? कहीं स्कूल में भैंसों के तबेले हैं तो कहीं पेड़ के नीचे व खुले आसमान तले क्लास लगाई जा रही है। कहीं क्लासरूम नहीं। कहीं अध्यापक नहीं तो कहीं बिजली व पीने का पानी नहीं तो कहीं शौचालय नहीं। कहीं बच्चे रोज़ नदी पार कर स्कूल आते जाते हैं तो कहीं कीचड़ और दलदल भरी गड्ढेदार सड़कों से गुज़र कर स्कूल आना जाना होता है। यदि देश की सरकारें शिक्षा के प्रति गंभीर होतीं और उनका भारत को विश्वगुरु बनाने का ढिंढोरा महज़ ढोल पीटना न होता तो आज सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले को महाराष्ट्र में शिक्षा पर घटते बजट और सरकारी मराठी माध्यम के स्कूलों के बंद होने पर गहरी चिंता जताते हुये यह न कहना पड़ता कि “नासिक कुंभ मेले के लिए लगभग ₹32,000 करोड़ का भारी-भरकम बजट तय किया गया है। अगर इस राशि का मात्र 0.1% यानी लगभग ₹32 करोड़ भी शिक्षा पर ख़र्च किया जाता, तो राज्य के 100 से 125 बंद हो रहे मराठी स्कूलों को बचाया जा सकता था”। आख़िर जस्टिस प्रसन्ना को क्यों कहना पड़ा कि “देश में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का बजट बढ़ने के बजाय घट रहा है, जो पिछले कई वर्षों से 13% के आंकड़े को भी नहीं छू सका है” । उन्होंने गढ़चिरौली की एक घटना का उदाहरण भी दिया जहां ज़रूरी सुविधाओं की कमी के कारण फ़र्श पर सोने की वजह से तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत हो गई थी। जस्टिस प्रसन्ना ने यह भी बताया कि उन्होंने स्वयं 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई ज़िला परिषद के मराठी मीडियम स्कूल से की थी, जिसने उनके करियर में कभी बाधा नहीं डाली बल्कि उनके दृष्टिकोण को और व्यापक बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है।
देश में बढ़ती बेरोज़गारी, शिक्षा,शिक्षण संस्थाओं की कमी व दुर्दशा तथा परीक्षा व्यवस्था में होने वाली धांधलियों व पेपर लीक जैसे मुद्दों ने देश के युवाओं को आंदोलन करने पर मजबूर कर दिया है। इससे घबराई सरकार कहीं स्कूल की वीडिओ ग्राफ़ी करने पर रोक लगा रही है तो कहीं शिक्षण संस्थाओं की हक़ीक़त को उजागर करने वालों पर सत्ता समर्थित गुंडों द्वारा हमला किया जा रहा है। और कहीं सोशल मीडिया पर सरकारी स्कूल की अव्यवस्थाएं दिखाने पर लोगों को जेल भेजा जा रहा है। परन्तु इस बीच कुछ जगहों से सकारात्मक ख़बरें भी आनी शुरू हुई हैं। जैसेकि राजस्थान के रामपुरा के उस स्कूल का नवनिर्माण करने का फ़ैसला किया गया है जहाँ कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ सत्ता के समर्थक गुंडों ने मारपीट की थी। यह स्कूल भैंसों के तबेले में चल रहा था। स्कूल की इमारत जर्जर होने के कारण एक स्थानीय ग्रामीण ने अपनी निजी जगह दी हुई है, इसी जगह भैंसों का चारा भी रखा जाता है और बच्चे भी पढ़ते हैं। पंजाब से भी ख़बर है कि सरकार ने स्कूलों के अनेक नए भवन बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इन ग्रीनफ़ील्ड भवनों का निर्माण माैजूदा ज़मीनों से परे अन्य ख़ाली ज़मीनों पर नए सिरे से किया जाएगा। हरियाणा में भी शिक्षा मंत्री द्वारा सरकारी स्कूल्स का औचक निरीक्षण कर विद्यालय की व्यवस्थाओं एवं शैक्षणिक गतिविधियों का जायज़ा लेने व विद्यार्थियों से संवाद करने की ख़बर है। Gen Z और युवा पीढ़ी के आंदोलन से ही सही परन्तु शायद अब सत्ताधीशों को यह बात समझ आने लगी है कि शिक्षित राष्ट्र के बिना ‘विश्व गुरु ‘ की अवधारणा पूरी तरह बेमानी है।





