महेन्द्र तिवारी
रक्षाबंधन हर वर्ष केवल एक त्योहार बनकर नहीं आता, बल्कि भारतीय समाज को रिश्तों, विश्वास और सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है। यह वह अवसर है जब एक साधारण सा रक्षा सूत्र भाई और बहन के बीच स्नेह, सुरक्षा और आजीवन साथ निभाने के वचन का प्रतीक बन जाता है। ऐसे त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक या पारिवारिक नहीं होता, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक स्मृति का भी हिस्सा होते हैं। इसी कारण जब किसी बड़े ब्रांड का रक्षाबंधन विज्ञापन चर्चा में आता है, तो उसकी प्रतिक्रिया केवल एक प्रचार अभियान तक सीमित नहीं रहती। इस बार अभिनेत्री कृति सैनन और एक आभूषण ब्रांड के विज्ञापन ने पूरे देश में एक ऐसी बहस को जन्म दिया है जिसमें महिला की स्वतंत्रता, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक संवेदनशीलता तीनों आमने-सामने दिखाई देते हैं।
विज्ञापन में कृति सैनन आधुनिक शैली के परिधान में अपने भाई को राखी बांधती दिखाई देती हैं। इसके बाद वह अपने पालतू कुत्ते को भी राखी बांधती हैं और उसे परिवार का हिस्सा मानने का संदेश देती हैं। यही दृश्य और यही प्रस्तुति सामाजिक माध्यमों पर विवाद का कारण बनी। कुछ लोगों ने इसे आधुनिक परिवार की नई परिभाषा और रचनात्मक सोच बताया, जबकि अनेक लोगों ने कहा कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व को इस तरह प्रस्तुत करना उसकी मूल भावना से मेल नहीं खाता। बढ़ते विरोध के बाद ब्रांड ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था और उसने सम्मानपूर्वक विज्ञापन वापस लेने का निर्णय लिया।
इस पूरे विवाद में सबसे पहली आवश्यकता तथ्यों और भावनाओं को अलग-अलग समझने की है। दुर्भाग्य से सामाजिक माध्यमों पर अक्सर बहस व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है, जबकि असली प्रश्न विचार और प्रस्तुति का होता है। किसी महिला ने क्या पहना, यह उसके व्यक्तिगत अधिकार का विषय है। लेकिन किसी व्यावसायिक विज्ञापन में किसी सांस्कृतिक पर्व को किस रूप में प्रस्तुत किया गया, यह सार्वजनिक विमर्श का विषय बन सकता है। इन दोनों बातों को एक ही तराजू पर तौलना न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतांत्रिक।
कृति सैनन ने भी आलोचनाओं का उत्तर देते हुए कहा कि संस्कृति और परंपराएं किसी महिला के गले के वस्त्र में नहीं, बल्कि उसके हृदय में होती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनके परिवार में बहनें भी एक दूसरे को राखी बांधती हैं और उनके लिए पालतू पशु भी परिवार का हिस्सा हैं। उनका तर्क व्यक्तिगत अनुभव और आधुनिक पारिवारिक जीवन पर आधारित था। यह दृष्टिकोण अनेक लोगों को स्वीकार्य लगा और उन्होंने इसे महिला की स्वतंत्रता तथा बदलते सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति माना।
लेकिन यहीं से दूसरा पक्ष भी उतनी ही मजबूती से सामने आता है। व्यक्तिगत जीवन में किसी परंपरा को अपने तरीके से निभाना और करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले विज्ञापन में उसकी सार्वजनिक प्रस्तुति करना दो अलग परिस्थितियां हैं। एक व्यक्ति अपने घर में अपने रीति रिवाज बना सकता है, लेकिन जब कोई ब्रांड किसी त्योहार का उपयोग अपने उत्पाद के प्रचार के लिए करता है, तब उसकी जिम्मेदारी केवल रचनात्मक होने की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील होने की भी होती है। यही वह बिंदु है जिसे समझे बिना बहस अधूरी रह जाती है।
भारत जैसे विविधताओं वाले देश में त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते। वे स्मृतियों, परिवारों, लोक परंपराओं और भावनात्मक अनुभवों का साझा उत्सव होते हैं। रक्षाबंधन में राखी, तिलक, आरती, मिठाई और परिवार के साथ बैठकर हंसी खुशी के क्षण केवल दृश्य नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे सांस्कृतिक प्रतीक हैं। जब कोई विज्ञापन इन प्रतीकों को बदलता है या नए अर्थ देता है, तब स्वाभाविक रूप से दर्शक प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न पूछना असहिष्णुता नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक भागीदारी का एक स्वस्थ रूप भी हो सकता है।
समस्या तब पैदा होती है जब हर आलोचना को तुरंत महिला विरोधी मानसिकता घोषित कर दिया जाता है। निश्चित रूप से किसी महिला के पहनावे पर अपमानजनक टिप्पणी करना गलत है। किसी अभिनेत्री के चरित्र, संस्कार या सम्मान को उसके वस्त्रों से जोड़ना भी अनुचित है। लेकिन यदि कोई नागरिक यह पूछता है कि रक्षाबंधन जैसे पर्व की प्रस्तुति इस रूप में क्यों की गई, तो उसे भी अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है। आलोचना और अपमान के बीच का अंतर समझना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
दूसरी ओर, यह भी उतना ही जरूरी है कि परंपरा के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश न हो। भारतीय संस्कृति स्वयं समय के साथ बदलती रही है। वस्त्रों की शैली, पारिवारिक भूमिकाएं, सामाजिक संबंध और जीवन शैली निरंतर विकसित हुए हैं। इसलिए यह मान लेना कि केवल एक विशेष प्रकार का परिधान ही संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, ऐतिहासिक रूप से भी सही नहीं है। संस्कृति का सार मूल्य होते हैं, केवल बाहरी रूप नहीं।
विज्ञापन उद्योग की भूमिका यहां विशेष महत्व रखती है। आज त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहे, बल्कि बड़े व्यावसायिक अवसर भी बन चुके हैं। दीपावली से लेकर होली और रक्षाबंधन तक हर पर्व के साथ विशाल विपणन अभियान जुड़े होते हैं। कंपनियां भावनाओं को कहानी में बदलकर अपने उत्पाद बेचती हैं। यही कारण है कि उनसे अपेक्षा भी अधिक होती है। यदि कोई ब्रांड त्योहार की संवेदनशीलता को समझे बिना केवल चर्चा बटोरने के लिए अलग और चौंकाने वाली प्रस्तुति चुनता है, तो उसे सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए भी तैयार रहना चाहिए। रचनात्मक स्वतंत्रता जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकती।
इस विवाद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या हमारी सांस्कृतिक संवेदनशीलता सभी धर्मों और परंपराओं के लिए समान है? यदि किसी दूसरे धर्म के पवित्र अवसर, धार्मिक प्रतीक या परंपरा को भी इसी प्रकार व्यावसायिक फैशन या विवादास्पद रचनात्मक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया जाता, तो क्या वही ब्रांड और मनोरंजन उद्योग उतनी ही सहजता से उसे स्वीकार करते? यह प्रश्न किसी एक धर्म को श्रेष्ठ या पीड़ित सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि समान मानदंड की मांग के लिए है।
उतनी ही ईमानदारी से यह भी स्वीकार करना चाहिए कि बिना प्रमाण के यह कहना कि केवल हिंदू त्योहारों का ही उपहास किया जाता है, उचित नहीं है। किसी भी गंभीर सामाजिक बहस की नींव तथ्यों पर होनी चाहिए, धारणाओं पर नहीं। यदि हम समानता की बात करते हैं तो समान प्रमाण और समान संवेदनशीलता दोनों आवश्यक हैं। चयनात्मक आक्रोश समाज को समाधान नहीं देता, बल्कि विभाजन को गहरा करता है।
सामाजिक माध्यमों ने आज हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है, लेकिन उन्होंने धैर्य और संतुलन की परीक्षा भी कठिन कर दी है। किसी विज्ञापन के आते ही लोग दो शिविरों में बंट जाते हैं। एक पक्ष हर आलोचना को पिछड़ी सोच कहता है, दूसरा हर आधुनिक प्रयोग को संस्कृति विरोधी घोषित कर देता है। जबकि सच्चाई इन दोनों अतियों के बीच कहीं मौजूद होती है। समाज को ऐसे संवाद की आवश्यकता है जिसमें असहमति हो सकती है, लेकिन सम्मान बना रहे।
रक्षाबंधन का मूल संदेश भी यही है कि संबंध अधिकार से नहीं, विश्वास से मजबूत होते हैं। यदि हम इस पर्व की आत्मा को समझें तो पाएंगे कि इसका सबसे बड़ा मूल्य परस्पर सम्मान है। वही सम्मान महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए भी होना चाहिए और वही सम्मान सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी। किसी एक की रक्षा करते हुए दूसरे का अपमान करना संतुलित समाज की पहचान नहीं हो सकता।
इसलिए इस पूरे विवाद का निष्कर्ष व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं है। प्रश्न यह नहीं कि कृति सैनन ने क्या पहना। प्रश्न यह भी नहीं कि आधुनिक परिवार में पालतू पशु को परिवार का सदस्य माना जाए या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब कोई ब्रांड करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़े पर्व को अपने प्रचार का माध्यम बनाता है, तब क्या वह पर्याप्त संवेदनशीलता, संदर्भ और सम्मान के साथ ऐसा करता है।
आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से दूरी बनाना नहीं है और परंपरा का अर्थ परिवर्तन से भय खाना भी नहीं है। एक स्वस्थ समाज वही है जो महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करे, रचनात्मक अभिव्यक्ति का सम्मान करे और साथ ही अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी गरिमा के साथ प्रस्तुत करने की अपेक्षा रखे। रक्षाबंधन की इस बहस ने हमें यही अवसर दिया है कि हम व्यक्ति पर नहीं, विचार पर चर्चा करें और स्वतंत्रता तथा संवेदनशीलता के बीच एक न्यायपूर्ण संतुलन खोजें।





