करवाचौथ पर्व का बदलता स्वरूप

The Evolving Nature of the Karwa Chauth Festival

डॉ वंदना शर्मा

भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल तिथि-त्योहार नहीं होते, वे हमारे रिश्तों की डोर को और मजबूत करने का अवसर होते हैं। ऐसा ही एक पवित्र और प्रेम से भरा पर्व है करवाचौथ। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन सभी सुहागिन नारियां अपने पति की लम्बी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं। सुबह से लेकर चांद निकलने तक निर्जला या जलाहार व्रत रखकर, नई दुल्हन की तरह सोलह श्रृंगार करके सजती-संवरती हैं। रात को विभिन्न तरह के पकवान बनाए जाते हैं और अंत में चांद को अर्घ्य देकर, पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का परायण किया जाता है।

समय एक सा नहीं रहता और समय के साथ-साथ किसी भी त्योहार को मनाने का तरीका, उसका स्वरूप और उसकी भावना भी बदलती रहती है। इस बदलाव को मैंने अपने ही घर में बहुत करीब से देखा है।

मेरी माँ का करवाचौथ – सादगी और समर्पण की मिसाल

जब मैं छोटी थी, मेरी मम्मी यह पावन व्रत बहुत ही साधारण और सादगी भरे तरीके से रखती थीं। उनकी तबीयत अक्सर ठीक नहीं रहती थी, इसलिए वे कभी निर्जल व्रत नहीं रख पाती थीं। दिन में प्यास लगने पर पानी पी लेती थीं। उन्हें खांसी का धसका इतना तेज लगता था, जैसे फेफड़े बाहर आ जाएंगे और आंखों से लगातार पानी आने लगता था। ऐसी हालत में पानी पीना उनके लिए जरूरी हो जाता था, पर श्रद्धा में कभी कोई कमी नहीं आती थी।

मेरी मम्मी सच में सादगी की मूरत हैं। सरल, सहज स्वभाव वाली, दिखावे और आडंबर से कोसों दूर। उन्हें सजने-संवरने का अधिक शौक कभी नहीं रहा। वे कभी मेकअप नहीं करतीं। मुझे आज भी याद है, उनकी शादी के समय का पाउडर का डिब्बा मुझे बीस साल बाद अलमारी में वैसे का वैसा रखा मिला। उन्होंने कभी प्रयोग ही नहीं किया था। मेकअप के नाम पर वे सिर्फ एक छोटी सी बिंदी, हल्की सी लिपिस्टिक और मांग में सिंदूर लगाती थीं। कभी नेलपेंट नहीं लगाया, उन्हें पसंद ही नहीं था। हां, हाथों में मेहंदी लगाने का शौक उन्हें आज भी बहुत है। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ हमेशा से मेरी मम्मी के जीवन का आधार रहा है।

पति को परमेश्वर मानने वाली मेरी मम्मी आज भी पति के चरणों में ही अपनी मुक्ति चाहती हैं। आज के जमाने में इतनी समर्पित और पतिव्रता नारी ढूंढना सच में असंभव है।

करवाचौथ के दिन मम्मी सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई करके सामान्य, साफ-सुथरे वस्त्र पहनतीं। पूरे दिन व्रत रखकर भी वे शाम को हम सबके लिए खाना बनातीं। अपने लिए नहीं, परिवार के लिए। फिर शाम को शिव-परिवार का पूजन करने के लिए नई साड़ी पहनतीं। जब चांद निकल आता तो छत पर जाकर उसे अर्घ्य देकर और पति का चेहरा देखकर व्रत का परायण करतीं।

अब मम्मी सत्तर साल की हो गई हैं। अब भी वे पूरी श्रद्धा से व्रत रखती हैं, लेकिन अब नई साड़ी पहनना अनिवार्य नहीं रह गया है। अब कोई भी धुली हुई पुरानी साड़ी पहनकर ही पूजन कर लेती हैं। शायद यह सच है कि स्त्री की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, उसके सजने-संवरने का शौक धीरे-धीरे कम होता जाता है और वह बाहरी श्रृंगार से ज्यादा आंतरिक शांति में सुख ढूंढने लगती है।

आज का करवाचौथ – एक भव्य उत्सव

अब बात करते हैं वर्तमान समय के करवाचौथ की। आज के समय में यह पर्व एक पारिवारिक व्रत से निकलकर एक राष्ट्रीय त्योहार और शायद सबसे महंगा त्योहार बन गया है।

वर्तमान समय में नवविवाहिताएं हर वर्ष इस पर्व पर नई साड़ी, नई पायल, नई चूड़ी, नई बिंदी, नया पर्स, सब सामान नया खरीदती हैं। कई दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। सुबह से ही सज-संवरकर तैयार होकर फोटो सेशन करती हैं उन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर डालने के लिए उत्सुकता दिखती है। कुछ तो ब्यूटी पार्लर में ही जाकर पूरी तरह तैयार होकर आती हैं। बाजारों में इस दिन इतनी भीड़ होती है कि पैर रखने की जगह नहीं होती।

मुझे लगता है नब्बे के दशक में आई फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ने इस पर्व को और भी अधिक लोकप्रिय और भव्य बना दिया। उस फिल्म के एक सीन ने पूरे देश की महिलाओं के मन में इस व्रत के प्रति एक नया आकर्षण पैदा कर दिया। इस भव्यता और चकाचौंध का प्रभाव सबसे अधिक पति की जेब पर ही पड़ता है, पर आजकल के पति भी बहुत अच्छे और समझदार हैं। वे अपनी पत्नी का सम्मान करने वाले हैं और इस दिन को अपनी पत्नी के लिए खास बनाना चाहते हैं। जितनी तारीफ करूं उतनी कम है।

प्रेम का नया रूप

वर्तमान में इस पर्व का सबसे सुंदर बदलाव यह है कि अब कुछ पति भी अपनी पत्नी के लिए निर्जल व्रत रखते हैं। यह समानता और सच्चे प्रेम की बहुत ही खूबसूरत मिसाल है। दोनों पूरे दिन साथ में गुणवत्तापूर्ण समय बिताते हैं, एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं और शाम को साथ ही व्रत का परायण करते हैं।

महिलाएं छलनी में पहले चांद को देखती हैं, फिर उसी छलनी से अपने पति को देखती हैं। फिर पति खुद अपने हाथ से पत्नी को पानी पिलाकर व्रत खुलवाता है और पत्नी भी बड़े प्यार से पति को पानी पिलाती है। दोनों बहुत सारी फोटो लेते हैं, वीडियो बनाते हैं और इस पल को हमेशा के लिए कैद कर लेते हैं। कुछ अमीर दंपति तो इस दिन भोजन करने भी बाहर किसी अच्छे होटल या रेस्टोरेंट में जाते हैं। मतलब इस दिन पत्नी के रोज के गृहकार्यों की पूरी छुट्टी। आज यह पर्व हमारे देश में सच में प्रेम और विश्वास का उत्सव बन गया है।

समय के साथ आते बदलाव

आज भी यह देखने को मिलता है कि शादी के शुरुआती सालों में जो जोश, उत्साह और प्रेम होता है, वह शादी के दस साल बाद थोड़ा कम हो जाता है। वर्तमान में भी कुछ जोड़े ऐसे हैं, जिनकी शादी को लम्बा समय हो गया है, दस साल बाद पत्नी का सजना-संवरना थोड़ा कम हो जाता है। क्यों होता है ऐसा, मुझे ज्ञात नहीं। शायद जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, या शायद प्रेम दिखावे से निकलकर आदत और सुकून में बदल जाता है। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैंने सामाजिक व्यवस्था में जो परिवर्तन देखा, वही लिख रही हूं।

वहीं दूसरी ओर, कुछ आधुनिक और अमीर घरों की पत्नियां तो व्रत ही नहीं रखतीं। उन्हें यह सब एक पुराना ढकोसला लगता है। कुछ नारीवाद का समर्थन करने वाली महिलाएं इस त्योहार का विरोध भी करती हैं। वे सजती-संवरती तो हैं, इस दिन का उत्सव मनाती हैं, लेकिन व्रत नहीं रखतीं।

अंत में यही कहूंगी कि हर व्यक्ति की अपनी सोच है और सबकी अपनी-अपनी आस्था है। कोई व्रत रखकर प्रेम दिखाता है, कोई व्रत न रखकर भी उतना ही प्रेम करता है। लेकिन करवाचौथ का मूल भाव तो आज भी वही है – दो लोगों के बीच अटूट विश्वास, प्रेम और एक-दूसरे के लिए लंबी उम्र की कामना। चाहे रूप सादा हो या भव्य, भावना पवित्र होनी चाहिए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली